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3 साल में एक बार क्यों पड़ता है अधिकमास, जानिए सरल भाषा में पूरा विज्ञान

अधिकमास हिंदू पंचांग का एक विशेष महीना है, जिसे अतिरिक्त या “लीप महीने” के रूप में भी समझा जा सकता है। यह लगभग हर 32 से 33 महीनों में एक बार आता है, यानी करीब तीन साल में एक बार। इसका उद्देश्य चंद्र और सौर गणना के बीच होने वाले अंतर को संतुलित करना है।

अधिकमास क्या होता है

हिंदू पंचांग मुख्य रूप से चंद्रमा की गति पर आधारित होता है। एक चंद्र मास अमावस्या से अमावस्या या पूर्णिमा से पूर्णिमा तक माना जाता है। 12 चंद्र मास मिलकर लगभग 354 दिन बनाते हैं। दूसरी ओर, सौर वर्ष लगभग 365 दिन 6 घंटे का होता है। यानी दोनों के बीच हर वर्ष लगभग 11 दिनों का अंतर रह जाता है।

हर साल 11 दिनों का अंतर क्यों होता है

चंद्र वर्ष: लगभग 354 दिन
सौर वर्ष: लगभग 365.24 दिन
कुल अंतर: लगभग 11 दिन

यह अंतर यदि लगातार बढ़ता रहे तो त्योहार और ऋतुएं धीरे-धीरे अपने निर्धारित मौसम से हटने लगेंगी।

तीन साल में कैसे बनता है एक अतिरिक्त महीना

हर वर्ष लगभग 11 दिनों का अंतर जमा होता है।

1 वर्ष में अंतर: लगभग 11 दिन
2 वर्ष में अंतर: लगभग 22 दिन
3 वर्ष में अंतर: लगभग 33 दिन

जब यह अंतर लगभग एक चंद्र मास (करीब 29.5 दिन) के बराबर हो जाता है, तब पंचांग में एक अतिरिक्त महीना जोड़ दिया जाता है। इसी अतिरिक्त महीने को अधिकमास कहा जाता है।

अधिकमास तय कैसे होता है

Lunar calendar और Solar year के समन्वय से अधिकमास निर्धारित होता है। जब किसी चंद्र मास के दौरान सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश नहीं करता (अर्थात संक्रांति नहीं होती), तो उस चंद्र मास को अधिकमास घोषित किया जाता है।

अधिकमास में क्या किया जाता है
मंत्र जाप और पूजा-पाठ, धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन, दान और सेवा,व्रत और संयम ।

अधिकमास हिंदू पंचांग की अत्यंत वैज्ञानिक और संतुलित व्यवस्था का उदाहरण है। चंद्र वर्ष और सौर वर्ष के बीच हर वर्ष बनने वाले लगभग 11 दिनों के अंतर को समायोजित करने के लिए करीब तीन साल में एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है। यही कारण है कि अधिकमास समय-समय पर आता है और धार्मिक दृष्टि से भी विशेष महत्व रखता है।

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