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मेडिकल की पढ़ाई के लिए भारतियों की पसंद बन रहा एशिया का यह देश, जानें क्या है बड़ा कारण

Medical Education : भारत में मेडिकल सीटों की भारी कमी और बढ़ती प्रतिस्पर्धा के चलते अब भारतीय छात्र जापान को मेडिकल पढ़ाई के लिए एक नए और मजबूत विकल्प के रूप में देख रहे हैं। जहां पहले पूर्वी यूरोप, रूस और पश्चिम एशिया जैसे देश भारतीय मेडिकल छात्रों की पहली पसंद हुआ करते थे, वहीं अब जापान अपनी बेहतरीन शैक्षणिक गुणवत्ता, वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त मेडिकल प्रोग्राम और हेल्थ सेक्टर में मजबूत करियर संभावनाओं के चलते तेजी से उभर रहा है।

वीजा और प्रवेश प्रक्रिया

जापान में मेडिकल पढ़ाई के लिए आवेदन करने से पहले छात्रों को उस यूनिवर्सिटी से पात्रता प्रमाणपत्र (COE) प्राप्त करना होता है, जहां उन्हें प्रवेश मिला है। इसके बाद, छात्र जापान के नजदीकी दूतावास में स्टूडेंट वीज़ा के लिए आवेदन कर सकते हैं। यह वीज़ा आम तौर पर 1 से 4 साल की अवधि का होता है। वीज़ा प्राप्त करने के लिए छात्रों को यह साबित करना होगा कि वे अपनी पढ़ाई और रहने के खर्चों को वहन करने में सक्षम हैं। जापान पहुंचने पर, रेजिडेंट कार्ड बनवाना और नेशनल हेल्थ इंश्योरेंस में नामांकन अनिवार्य होता है, जो लगभग 70% मेडिकल खर्च कवर करता है।

मेडिकल कोर्स और बढ़ती स्पेशलाइजेशन की मांग

जापान में पारंपरिक 6 वर्षीय MD प्रोग्राम (भारत के MBBS के समकक्ष) के साथ-साथ अब अंग्रेज़ी माध्यम में पढ़ाए जाने वाले कोर्स भी उपलब्ध हैं। ग्लोबल हेल्थ, पब्लिक हेल्थ, बायोमेडिकल साइंस, और डिजिटल हेल्थ जैसे क्षेत्रों में भी रुचि बढ़ रही है। जापान की बुजुर्ग होती जनसंख्या को देखते हुए जेरिएट्रिक केयर और पैलिएटिव मेडिसिन जैसे क्षेत्रों में भी करियर की अपार संभावनाएं हैं।

2026 के छात्रों के लिए आवेदन समय-सीमा

जो छात्र फरवरी या मार्च 2026 में 12वीं की पढ़ाई पूरी करेंगे और जापान में एमबीबीएस करना चाहते हैं, उन्हें सबसे पहले NEET-UG 2026 पास करना आवश्यक होगा। हालांकि जापानी विश्वविद्यालयों में प्रवेश की प्रक्रिया अप्रैल 2027 से शुरू होती है, इसलिए छात्रों के पास लगभग एक वर्ष का अंतर होता है, जिसे वे जापानी या अंग्रेज़ी भाषा में दक्षता प्राप्त करने, आवश्यक दस्तावेज़ तैयार करने और COE जैसे आवेदन प्रॉसेस को पूरा करने में उपयोग कर सकते हैं।

जापान में मेडिकल शिक्षा का खर्च

जापान में मेडिकल शिक्षा की लागत संस्थान और शहर के अनुसार बदलती है। सरकारी विश्वविद्यालयों में वार्षिक ट्यूशन फीस लगभग JPY 535,800 (लगभग ₹3 लाख) होती है, जबकि निजी संस्थानों में यह JPY 1.2 मिलियन से 2 मिलियन (₹7.5 से ₹12.5 लाख) प्रति वर्ष तक पहुंच सकती है। टोक्यो मेडिकल यूनिवर्सिटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में छह साल के प्रोग्राम की कुल लागत करीब JPY 29.4 मिलियन (₹1.8 करोड़) हो सकती है। रहने के खर्च को मिलाकर एक छात्र का वार्षिक कुल खर्च ₹8 से ₹14 लाख तक पहुंच सकता है।

प्लेसमेंट और भविष्य की संभावनाएं

जापान में मेडिकल ग्रेजुएट बनने के बाद, छात्रों को वहां की राष्ट्रीय लाइसेंसिंग परीक्षा उत्तीर्ण करनी होती है, जिसमें उन्नत जापानी भाषा (JLPT N2 या अधिक) अनिवार्य है। जापान में मेडिकल प्रैक्टिस के लिए भारत की FMGE परीक्षा लागू नहीं होती, लेकिन यदि कोई छात्र भारत लौटकर प्रैक्टिस करना चाहता है, तो उसे FMGE पास करना आवश्यक होगा।

नर्सिंग और allied health क्षेत्रों में भी जापान में भारी मांग है। Specified Skilled Worker (SSW) वीज़ा श्रेणी के तहत, जापानी भाषा में दक्ष नर्सों और हेल्थ केयर प्रोफेशनल्स को अच्छी रोजगार संभावनाएं मिल रही हैं।

बढ़ती लोकप्रियता

जापान छात्र सेवा संगठन (JASSO) के आंकड़ों के अनुसार, मई 2024 तक जापान में 3.36 लाख अंतरराष्ट्रीय छात्र पढ़ाई कर रहे थे, जो 2023 की तुलना में 21% अधिक है। इनमें से लगभग 68% छात्र उच्च शिक्षा कार्यक्रमों में नामांकित हैं, जिनमें चिकित्सा, नर्सिंग और संबद्ध स्वास्थ्य कार्यक्रम शामिल हैं।