Justice Yashwant Verma : इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ संसद में महाभियोग की कार्यवाही शुरू हो गई है. उन पर अपने आवास पर बेहिसाब नकदी मिलने के बाद कदाचार के गंभीर आरोप लगे हैं. जिसके बाद संसद के मानसून सत्र में उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था.स्वतंत्र भारत में पहली बार किसी कार्यरत उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के महाभियोग की जांच अब संविधान के अनुच्छेद 124, 217 और 218 के तहत संसद द्वारा की जाएगी।
207 सांसदों का समर्थन
संसद के मानसून सत्र के पहले दिन सोमवार को लोकसभा के 145 सांसदों और राज्यसभा के 54 सांसदों ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव का समर्थन करते हुए हस्ताक्षर किए. इससे पहले सांसदों द्वारा लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को हस्ताक्षरित ज्ञापन सौंपा गया था.
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औपचारिक प्रक्रिया शुरू
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और राज्यसभा सभापति जगदीप धनखड़ को सांसदों द्वारा हस्ताक्षरित ज्ञापन सौंपे गए हैं. इसके बाद जस्टिस वर्मा को पद से हटाने के लिए महाभियोग की औपचारिक प्रक्रिया शुरू हो गई है.
कैस कांड के खिलाफ जांच
सूत्रों के अनुसार जस्टिस वर्मा के आवास पर भारी मात्रा में नकदी बरामद होने के बाद उनके खिलाफ जांच तेज हो गई थी. इस मामले ने न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं,जिसके बाद सांसदों ने यह कदम उठाया. महाभियोग प्रस्ताव पर आगे की कार्यवाही संसद की प्रक्रिया और संवैधानिक नियमों के तहत होगी.
महाभियोग क्या है?
यह किसी कार्यरत न्यायाधीश विशेष रूप से सर्वोच्च न्यायालय या राज्य उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को उसके पद से हटाने का एक संवैधानिक तंत्र है। एक बार नियुक्त होने के बाद न्यायाधीशों को राष्ट्रपति के आदेश के बिना पद से नहीं हटाया जा सकता,जिसके लिए संसद की सहमति आवश्यक होती है।
संविधान में वास्तव में ‘महाभियोग’ शब्द का उल्लेख नहीं है, लेकिन न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया न्यायाधीश जांच अधिनियम, 1968 में उल्लिखित है तथा दो संवैधानिक प्रावधानों अनुच्छेद 124 (सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के लिए) और अनुच्छेद 218 (उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के लिए) में इसका उल्लेख है।
महाभियोग कैसे लगाया जाता है?
महाभियोग प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है। प्रस्ताव पर आगे बढ़ने के लिए कम से कम 50 राज्यसभा सांसदों और लोकसभा में 100 सांसदों के हस्ताक्षर ज़रूरी होती है.

