राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने अयोध्या में बने राम मंदिर को देश के नेतृत्व की दृढ़ इच्छाशक्ति और जनसहयोग का परिणाम बताया। उन्होंने यह भी कहा कि भारत को अलग से हिंदू राष्ट्र घोषित करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उनकी दृष्टि में देश की मूल पहचान पहले से ही हिंदू राष्ट्र की है।
नागपुर में कार्यक्रम के दौरान दिया बयान
आरएसएस की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, भागवत नागपुर के रेशिमबाग स्थित डॉ. हेडगेवार स्मारक समिति के एक कार्यक्रम में संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर उन लोगों को सम्मानित किया गया, जिन्होंने राम मंदिर निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। कार्यक्रम विशेष रूप से इन्हीं व्यक्तियों के सम्मान के लिए आयोजित किया गया था।
‘भगवान की इच्छा से संभव हुआ निर्माण’
अपने भाषण में भागवत ने कहा कि राम मंदिर का निर्माण भगवान राम की इच्छा से ही संभव हो सका। उन्होंने भगवान कृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत उठाने की कथा का उदाहरण देते हुए कहा कि ऐसे बड़े कार्य तभी पूरे होते हैं, जब समाज के सभी वर्ग एकजुट होकर योगदान देते हैं।
2014 के चुनावों का भी किया जिक्र
इस दौरान उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनावों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बनी सरकार के शपथ ग्रहण के दिन ब्रिटेन के एक अखबार ने टिप्पणी की थी कि उस दिन भारत ने सही मायनों में ब्रिटिश शासन से मुक्ति पाई।
हिंदू राष्ट्र के मुद्दे पर बदली सोच
भागवत ने कहा कि पहले ‘हिंदू राष्ट्र’ की बात करने पर लोगों द्वारा मजाक उड़ाया जाता था, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। उनके मुताबिक, अब लोग इस विचार को समझने लगे हैं कि भारत की सांस्कृतिक पहचान हिंदू परंपराओं से जुड़ी हुई है।
‘घोषणा की जरूरत नहीं’
अपने संबोधन के अंत में उन्होंने कहा कि कुछ लोग आरएसएस से भारत को औपचारिक रूप से हिंदू राष्ट्र घोषित करने की मांग करते हैं, लेकिन संघ का मानना है कि जो पहले से ही वास्तविकता है, उसे घोषित करने की आवश्यकता नहीं है।
कार्यक्रम में कई प्रमुख हस्तियां रहीं मौजूद
कार्यक्रम की शुरुआत भारत माता की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर की गई। इस दौरान मोहन भागवत के साथ गोविंददेव गिरी महाराज, समिति अध्यक्ष सुरेश भैयाजी जोशी और उपाध्यक्ष श्रीधर गाडगे सहित कई अन्य प्रमुख लोग उपस्थित रहे।
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