हाल ही में पश्चिम बंगाल, पुडुचेरी, असम, केरल और तमिलनाडु में विधानसभा के चुनाव के परिणाम आए। चुनाव के दरम्यान देश की बदलती राजनीति, चुनावी नतीजों और जनता की भूमिका पर को लेकर न्यूज़ इंडिया 24×7 के डिजिटल ग्रुप एडिटर डॉ. प्रवीण तिवारी ने लेखक और फिलोसोफर आचार्य प्रशांत के साथ पॉडकास्ट में गहन चर्चा की। पॉडकास्ट में पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों के उदाहरणों के माध्यम से यह समझने की कोशिश की गई है कि राजनीतिक बदलाव वास्तव में कितना “परिवर्तन” है और कितना सिर्फ चेहरों का अदला-बदली। साथ ही यह भी सवाल उठता है कि क्या लोकतंत्र में चुनाव केवल एक प्रक्रिया है या हमारी चेतना और चयन की वास्तविक परीक्षा।
सवाल: पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु सहित हाल के चुनावों में बड़े राजनीतिक बदलावों को देखते हुए, आप पश्चिम बंगाल की सियासत में हुए इस बदलाव और चुनावी जनादेश का विश्लेषण किस तरह करते हैं?
जवाब: वैसे ही जैसे अभी आपने कहा आम आदमी के जीवन के हर चुनाव का आकलन किया जाता है। कांग्रेस थी। फिर इतने दशकों तक कम्युनिस्ट रहे वहां। फिर 15 साल तक तृणमूल। अब भाजपा इसमें आपको कहीं कोई संगति दिखाई दे रही है। कोई हार्मोनी कोई तारतम्य कोई समरसता दिखाई दे रही है। जब व्यक्ति सुलझा हुआ होता है। जब व्यक्ति का मानस जब जनमानस सुलझा हुआ होता है तो ऐसे विपरीत ध्रुवों पर कूदफान नहीं होती तब किसी एक केंद्र से व्यक्ति अपने जीवन को अपने लोकतंत्र को अपने राज्य और राष्ट्र को आगे बढ़ाता है। पर यहां ये क्या हो रहा है? कम्युनिस्टों और तृणमूल के बीच में क्या साझा था? अब तृणमूल और भाजपा के बीच में क्या साझा है? बात बस इतनी सी है कि हमें पता ही नहीं कि हम कौन है? हमें चाहिए क्या? तो कभी इधर भागते हैं। वहां जाकर बैठे रहते हैं। एक बार एक जगह 30 साल बैठ गए थे। एक जगह 15 साल बैठ गए। अब कहीं और चले गए हैं। वहां बैठ जाएंगे। लेकिन ये सब काम नशे में ही हो रहे हैं। एक से बदलकर दूसरी तरह का जो नशा है वो स्वीकार कर लिया जा रहा है। नशे का मैं उदाहरण दे रहा हूं। उसको आप बीमारी से ही बदल सकते हैं। जब व्यक्ति भीतर से कमजोर होता है, जी तो अलग-अलग मौसम में उसको अलग-अलग तरह की बीमारियां लगती हैं। मौसमी बीमारियां लगती हैं। तो आपको ऐसा लगेगा कि बीमारियां बदल रही हैं और उसको आप कह सकते हो ऐतिहासिक बदलाव। वो बीमारियां नहीं बदल रही हैं। वो बस मौसम बदल रहे हैं। भीतर की कमजोरी यथावत है। मौसम बदले, हवाएं बदली तो नशा बदल गया, बीमारी बदल गई, चयन बदल गया। लेकिन व्यक्ति भीतर से अभी भी उतना ही अज्ञान में है, अंधकार में है, नशे में है, बेहोशी में है। जितना वो कभी भी रहा है। देखिए जब आपको कुछ चुनना नहीं आता। आप नहीं जानते कि अपने लिए व्यापार कैसे चुने। आप नहीं जानते अपने दोस्त यार कैसे चुने आप अपने लिए ठीक से ठीक से खाना चुनना भी नहीं जानते जो सब खा रहे हैं जो परंपरा में चला वही आप खाए जा रहे हो आप अपने लिए ठीक से लड़का लड़की जीवन साथी चुनना नहीं जानते तो आप तो वही इंसान हो ना अब आप बताओ सही से सरकार कैसे चुन लोगे बस आप इतना करते हो कि आप कहीं जाकर वोट डालते हो और आशा करते रहते हो कि अब कुछ बदलाव आएगा जब बदलाव आता नहीं तो कभी 5 साल में कभी 15 साल में आप ऊब जाते हो सिर्फ ऊबे हो आप बदले नहीं हो ऊबे हो आप ऊब जाते हो और विपरीत ध्रुव पर जाकर कूद जाते हो पर विपरीत ध्रुव पर आप भले कूद गए हो आप अभी भी वही हो जिसको चुनना नहीं आता आप फिर से ऊबोगे और फिर कोई नया विकल्प या नई बीमारी आपके सामने खड़ी हो जाएगी आप एक बीमारी से कूद करके दूसरी बीमारी चुन लोगे और याद रखिए मैं पार्टियों को और विचारधारा को बीमार बाद में बोल रहा हूं। मैं मतदाता को बीमार बोल रहा हूं। यह जो आम आदमी है ना यह बीमार है और अपने लिए ये अलग-अलग तरह की बीमारियां चुनता रहता है।
सवाल: यदि नेता भी जनता के बीच से ही निकलता है, तो क्या लोकतंत्र की असली जिम्मेदारी जनता की चेतना और उसके चुनाव पर ही आती है?
जवाब: तो किसी को अगर स्पष्ट ना हुआ हो तो मैं और दोहरा के बोल देता हूं। हां गलती सिर्फ और सिर्फ आपकी ही है। व्यवस्था माने क्या होता है? व्यवस्था स्वयं तो चैतन्य होती नहीं ना। आपने बहुत सुंदर अपने लिए संविधान ग्रहण करा है। बहुत सुंदर संविधान है वो। पर संविधान क्या करेगा? उसके पास अपनी कोई चेतना नहीं है। वो एक व्यवस्था है। वो आपको कुछ याद दिलाने के लिए है। वो आपके अधिकारों की सीमा रोक देता है। और वो आपको कुछ कर्तव्य प्रदान कर देता है। लेकिन जो कुछ भी करता है वो आपके साथ और आपके लिए करता है। आप अगर खुद ही अड़े हुए हो कि अपना नाश ही करना है तो संविधान आपको नहीं बचा पाएगा क्योंकि संविधान के पास ऐसा कुछ नहीं है जो व्यक्ति को जाकर के भीतर से प्रकाशित कर दे। संविधान आपको किसी और के अत्याचार से बचा सकता है। कोई आकर आपके अधिकारों का अतिक्रमण ना कर दे। कोई आपको यूं ही जेल में ना डाल दे। कोई आपका काम धंधा ना बंद करा दे। कोई गलत आधार पर भेदभाव ना कर दे। आपकी नौकरियां छीन दे। यह सब काम तो अधिकार कर सकता है कि दूसरे के शोषण से आपको बचा दे। पर आप यदि खुद ही अपने दुश्मन हो तो इसमें संविधान क्या करेगा? पहले जिसको चुन रखा है वो पहला जिसको आम आदमी चुने हुए ही बैठा है उसको अनचना करना पड़ेगा अनचूज वो ज्यादा जरूरी है और सबसे पहले हमने किसी सरकार को नहीं चुना है। किसी दल को नहीं चुना है। किसी विचारधारा को नहीं चुना है। जानते हो ना सबसे पहले हमने किसको चुना है? सबसे पहले हमने खुद को चुन रखा है। मैं जैसा हूं ठीक हूं। मैंने अपने अहंकार को चुन रखा है। मैंने अपनी मान्यताओं, अपनी धारणाओं, अपने पूर्वाग्रहों को चुन रखा है। और जब तक हमने उसको चुन रखा है तब तक अब उसके बाद चुनाव की कोई संभावना शेष बचती नहीं है। चुनने का काम पूरा हो गया। अब ऐसे समझिए कि संविधान की आप बात कर रहे हो। संविधान एक बड़ी खूबसूरत गाड़ी हो सकता है। गाड़ी है बहुत अच्छी चीज है। पर उसके पास अपनी चेतना नहीं है ना। बहुत अच्छे से बनी हुई डिज़ वेल डिज़ वेल मैन्युफैक्चरर्ड गाड़ी है आपके पास पर अगर भीतर ड्राइवर ही बैठा हुआ है नशा करके तो भिड़ाएगा ही इतने अच्छे प्लेेंस होते हैं। अब हम जानते हैं ज्यादातर जो क्रशेस होते हैं है ना वो ह्यूमन एरर से होते हैं। आप इतना खूबसूरत प्लेन बना लीजिए। वो अभी भी क्रैश कर सकता है। इसी तरीके से आप बहुत अच्छी टेक्नोलॉजी इजाद कर लीजिए। उसका भारी से भारी दुरुपयोग हो सकता है। क्योंकि करने वाले तो हम ही है ना। जब हमें हमारी ही खबर नहीं तो आप हमें अगर ड्राइविंग का अधिकार दे दोगे हम गाड़ी भिड़ा देंगे। आप हमें वोटिंग का अधिकार दे दोगे हम देश डुबो देंगे। क्योंकि हम जानते ही नहीं है कि अपने अधिकारों का हमें करना क्या है। क्यों? क्योंकि हम अहंकार है। सबसे पहले हमने उसको वोट दे रखा है। उसको चुन रखा है। और वह कहता है कि अपने अंधे लक्ष्यों और अनपरखे स्वार्थों के लिए जो करना है सब करो। उसको बोलता है कामना। उसको बोलता है मान्यता। उसको बोलता है आइडेंटिटी। मेरी पहचान। उसके लिए वो कुछ भी करेगा। वो वोट भी डालएगा। वो सरकार बना भी देगा। सरकार पलट भी देगा। वो शादी भी कर लेगा, तलाक भी दे देगा। वह एक काम शुरू कर देगा, दूसरा व्यापार बंद भी कर देगा। वह धर्म परिवर्तन भी कर सकता है। वह आज इसको पूजता था, कल उसको पूजना शुरू कर देगा। लेकिन ले देकर सबसे पहले वो खुद को ही पूज रहा है। वो किसी पर भी सवाल उठा सकता है। वो किसी का भी तख्ता पलट सकता है। वो अपने ऊपर सवाल नहीं उठाता। आत्मजिज्ञासा, आत्म अवलोकन, आत्मज्ञान इससे वो सबसे ज्यादा घबराता है और सोचता है कि विकल्प में अगर बड़ी भारी वो व्यवस्थाएं खड़ी कर लेगा। कहेगा कि ये लेजिस्लेचर है, एग्जीक्यूटिव है, जुडिशरी है, मीडिया है तो बहुत अच्छा हो जाएगा। टेक्नोलॉजी आ गई है, टेक्नोलॉजी हमें बचा लेगी। ना संविधान बचा सकता है, ना न्यायपालिका बचा सकती है, ना मीडिया बचा सकती है, ना टेक्नोलॉजी बचा सकती है, ना सरकारी नीतियां बचा सकती हैं। लोकतंत्र को बस लोक ही बचा सकता है और लोग आप हैं। और आप अगर खुद अंधेरे में हैं। अगर आपने खुद नशे का चयन कर रखा है तो बड़ा मुश्किल है कि अब आपको बचाया जा सकता है।
सवाल: अगर लोगों के भीतर आत्म-जागृति (awakening) आ जाए, तो व्यवहारिक स्तर पर समाज और राजनीति में सबसे पहला बड़ा बदलाव आप क्या देखते हैं?
जवाब: जो कर रहे हैं कम से कम वह करना रोक देंगे और उससे बड़ी भारी संभावना खुल जाएगी कुछ नया करने की। जैसे जैसे कि क्या पता अभी तो जैसे ही मैं कुछ जैसे बोलूंगा तो आपके सामने वही विकल्प तो आएंगे ना ले दे के जो मौजूद हैं जो दृश्यमान है और वो सारे विकल्प हमारे गलत केंद्रों से निकल रहे हैं। मैं उसका उदाहरण आपको कैसे दे दूं जो अभी मौजूद ही नहीं है जिसको जन्म ही दिया जाएगा एक नई चेतना के द्वारा। मैंने अभी 100 तरह की गंदगी फैला रखी है। ठीक है? 100 तरह की गंदगी फैला रखी है। आप मुझसे कोई उदाहरण मांगेंगे भी तो मैं उसी से तो दूंगा। कहूंगा वो है वो है। अच्छा नहीं उसको हटा के वो आ जाएगा। उसको हटा के वो आ जाएगा। जी। सफाई का उदाहरण कैसे दूं मैं आपको? कभी ऐसा हुआ भी नहीं है हमारे यहां। नहीं हुआ है। बिल्कुल हुआ है। तो वैसे उस उदाहरण से दे दीजिए। पर वो जब हमारी आंखों से देखा जाता है तो गंदा हो जाता है। मैं अगर आपसे कहूंगा कि उस सफाई का उदाहरण कृष्ण हैं कि बुद्ध हैं कि कबीर हैं। तो मैं फिर आपसे कृष्ण, बुद्ध और कबीर की बात नहीं कर रहा। मैं आपसे उस कृष्ण उस बुद्ध उस कबीर की बात कर रहा हूं जिसको आपने अपनी नजरों से देखा है और जिसकी आपने अपने मन से कल्पना करी है। हमारी आंखें उनको गंदा कर देंगी। तो इसीलिए मेरा उदाहरण देना भी व्यर्थ चला जाएगा। कभी भी इसीलिए यह नहीं पूछना चाहिए कि गंदगी हटेगी तो क्या आएगा? श्रद्धा का अर्थ है कहना। गंदगी है और जान लिया कि यह चीज ठीक नहीं है। इसको हटा दो। उसके बाद जो होगा अच्छा होगा। उसके बाद जो होगा जो ऐसा अभी है उससे बहुत बेहतर होगा। आपने इनको आरंभ में कहा कि फैंस हैं। फैंस नहीं है। छात्र हैं। और जब छात्र हैं तो हम बात हम निष्काम कर्म की कभी श्रद्धा की अपने गीता सत्रों में परिभाषा देते हैं कि सही काम का अंजाम सोचना ही पाप है। तो नहीं सोचना चाहिए कि जब मैं सही काम करूंगा तो क्या होगा? अच्छा पहले से उदाहरण दे दो। पहले से गारंटी दे दो। पहले से झलक दिखा दो। पहले से हमें कुछ तो डेमोंस्ट्रेशन कुछ प्रदर्शन दे दो ना। भाई डेमो दिए बिना माल कैसे खरीदेंगे? यह नहीं कहना चाहिए। बस ये कहना चाहिए जो सही है सो सही है। उसके अंजाम की परवाह नहीं है।
सवाल: क्या फिल्मी सितारों या “फेस-आधारित” राजनीति का उभार जनता की राजनीतिक समझ से ज्यादा उसकी भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक प्रवृत्तियों का परिणाम है?
जवाब: स्क्रीन आधार है। देखिए जब इंसान खुद से बचना चाहता है ना तो और दिशाओं में भागता है। और उनमें से एक बड़ी आकर्षक दिशा होती है स्क्रीन। जगमग। चकाचौंध लिए हुए स्क्रीन जो तमिलनाडु में हुआ एक तरह से वह वो ईमानदारी की बात है दक्षिण में होता रहा है हमेशा से तमिलनाडु में होता रहा है आंध्र में होता रहा है कि जो स्क्रीन पर नजर आता है उसको देवतुल्य मान लिया जाता है मैंने उसको ईमानदारी की बात क्यों बोला क्योंकि होता तो यही उत्तर भारत में भी रहा है जब हमें खुद का ही पता नहीं होता तो हमें कौन सा अपने नेता का पता होता है? हम मरते तो उसकी छवि पर ही है ना और छवि माने स्क्रीन। छवि माने स्क्रीन। तो इसीलिए उत्तर भारत में भी जो नेता रहे हैं और आज भी जो हैं वो भी अभिनेता ही हैं। सब अभिनय ही कर रहे हैं। लेकिन यहां वो खुले तौर पे अपने आप को अभिनेता बोलते नहीं है। यहां ऐसा नहीं होता है कि उन्हें चुनाव जीतना है तो पहले पिक्चर बनाएंगे और पिक्चर के डायलॉग ऐसे होंगे कि जिनका एक राजनैतिक भी अर्थ होगा। उस अर्थ में डबल मीनिंग होंगे और फिर चुनाव में खड़े होंगे और चुनाव जीत जाएंगे। उत्तर भारत में ऐसा थोड़ा कम हुआ है। यद्यपि उत्तर भारत में भी अभिनेता लोग चुनाव जीतते रहे हैं। मंत्री भी बनते रहे हैं। प्रधानमंत्री नहीं बने हैं। मुख्यमंत्री नहीं बने हैं। या पता नहीं नहीं नहीं बने। और बहुत कम है। बहुत इनेगिने हैं। सुनील दत्त साहब याद आ रहे हैं। मुझे तो अभी बात करते करते। तो जब हम अपनी ही माया नहीं पकड़ पाते। तो सामने वाले की माया क्यों पकड़ना चाहेंगे? याद रखिए मैंने यह नहीं कहा कि सामने वाले की माया पकड़ पाते नहीं। हम उसकी माया पकड़ना चाहते नहीं। बल्कि माया तो जब हमारे सामने आती है तो हमें बहुत लुभाती है। स्क्रीन की जब बात हो रही है, मुंबई को माया नगरी कहा जाता है। है ना? वहां स्क्रीन का कारोबार खूब होता है। हमें माया पसंद है भाई। स्क्रीन पर जो भी हमें कोई आकर्षित कर जाएगा, लुभा जाएगा, हम उसके दीवाने हो जाएंगे। हम उसके मंदिर ही बना देंगे। देवता क्या वो भगवान हो जाएगा हमारे लिए। तो यह काम दुनिया भर के लोग जानते रहे हैं और भारत में दुर्भाग्य से यह काम थोड़ा ज्यादा होता है। यद्यपि जैसे सब व्यवसाय हैं, सब काम है। उसी तरह अभिनय भी काम है, कला है। मुझे अभिनय से कहीं किसी तरह की कोई शिकायत नहीं है अभिनेता होने से। लेकिन मुझे समस्या तब होती है जब आप जनता के सामने अभिनय कर रहे होते हैं। जब आप अपना असली रूप छुपा छुपा करके वोट ले रहे होते हैं। नेता बन रहे होते हैं। लेकिन उसमें भी मैं सबसे पहले यह जो नेता या अभिनेता है इसकी नहीं शिकायत करूंगा। सबसे पहले तो मैं उस वोटर की शिकायत करूंगा जिसको बस चकाचौंध चाहिए। वाओ कितना अच्छा लग रहा है। क्या बोलता है, क्या अदा है, क्या डायलॉग डिलीवरी है, क्या धांसू पंच मारा है। इन्हीं चीजों पर हमारी जिंदगी चलती रही है। यदि व्यक्तित्व और संवाद कौशल का उपयोग सत्य या ज्ञान को सरल रूप में प्रस्तुत करने के लिए हो, जैसे कबीर या बुद्ध के संदर्भ में, तो वह स्वीकार्य है। लेकिन समस्या तब होती है जब व्यक्तित्व का उपयोग बुद्धत्व या सत्य की सेवा के बजाय केवल अहंकार और छवि निर्माण के लिए किया जाता है।
सवाल: क्या आज की राजनीति में बुद्ध जैसे प्रतीकों का उपयोग वास्तविक चेतना और जागृति के बजाय सिर्फ वोट बैंक और पहचान की राजनीति तक सीमित हो गया है?
जवाब: नहीं इससे शुभ क्या हो सकता है कि बुद्ध राजनीति का केंद्र हो जाए। इससे ऊंची इससे शुभ कोई बात हो सकती है क्या? इससे शुभ क्या हो सकता है कि अगर राम सचमुच हमारी राजनीति के केंद्र में बैठ जाए हो सकता है। कुछ नहीं हो सकता इससे शुभ। काशी यदि वास्तव में महादेव का प्रतीक है और मथुरा श्री कृष्ण का तो इससे शुभ क्या होगा कि राजनीति के केंद्र में धुन उठे कभी निर्वाण शटकम की शिवोहम और कभी भगवत गीता की कृष्ण के नाम की मुरली बजे इससे शुभ क्या होगा लेकिन इससे ज्यादा अशुभ नहीं हो सकता जब इन ऊंचे से ऊंचे नामों को लेकर के एकदम कोई साधारण सा औसत दर्जे का या कई बार तो बिल्कुल गिरा हुआ स्वार्थ साधने की कोशिश की जाती है। तो फिर हम क्या बोला करते हैं लोगन लोगन राम खिलौना जाना कि आप कैसे हो और कैसा अटल है अहंकार अनंत खाई की तरह है। वह सत्य को भी खा जाता है। वह राम को और कृष्ण को और बुद्ध को भी नहीं छोड़ता। वह अपने छोटे-छोटे बहुत शुद्र स्वार्थों के लिए आसमान पर भी थूक देता है। वो किसी को नहीं छोड़ना चाहता। ये ये बड़े दुर्भाग्य का और दुर्भाग्य हटाइए। यह आदमी के लिए बड़े दुख का लक्षण है। अगर वो ऐसा काम कर रहा है। जो बुद्ध का नाम लेते हो सबसे पहले उनसे कहना चाहिए आओ बैठो। राजनीति हटाओ। तुम बुद्ध की राजनीति कर रहे हो ना तो पहले बुद्ध की बात करो। तुम्हारी राजनीति यदि बुद्ध के नाम से शुरू होती है तो बैठो। पहले बुद्ध की बात करो। राजनीति अपने आप हो जाएगी। करना क्या है राजनीति का? बुद्ध तो सब राजनीति वगैरह छोड़छाड़ के गए थे। तो पहले बुद्ध की बातें करते हैं। और अगर वो बुद्ध की बात ना कर पाए तो आप उससे बुद्ध की बात करिए। क्या पता उसकी राजनीति शुद्ध हो जाए। इसी तरीके से जो राम के नाम पर वोट मांगते हैं उनका तो स्वागत करिए। उनके चरण पखारिए उनसे बोलिए आइए हमारे घर बैठिए। बोले राम की बात करने आए हो ना? आओ राम की बात करते हैं। पहले वोट वगैरह बाद में हो जाएगा। पहले बैठो राम की बात करते हैं। और आप 99% यही पाओगे कि वो राम की कोई बात कर नहीं सकते। राम से उन्हें कोई लेना देना नहीं है। और जब वह राम की बात ना कर पाए तो आप उनसे राम की बात करिए। क्या पता जिस घटिया राजनीति में वो घुसे हुए हैं उससे उनका पिंड छूट जाए। उनका भी जीवन सार्थक हो जाए। इसी तरीके से जो लोग और आदर्शों की बात करते हैं। ये सब तो जो हमने बात करी ये धार्मिक आदर्श हो गए। पुराने हो गए। और जो थोड़ा समसामयिक आदर्श है उनकी भी बात करी जाती है। अंबेडकर जैसे अंबेडकर की पेरियार की बात करेंगे। उनको बुलाइए उनको बोलिए। बता तूने अंबेडकर को कितना पढ़ा है? बता तूने पेरियार को कितना पढ़ा है? और अगर तूने नहीं पढ़ा तो यह किताबें ले। हां, मेरी लाइब्रेरी में अंबेडकर भी है, पेरियार भी हैं। मैं अपनी ओर से किताबें आपको देता हूं। आप इनको पढ़िए। क्या पता आपका चित्त भी कुछ शुद्ध हो जाए। ये किताबें पढ़ के। वह बहुत आवश्यक है। समस्या यह नहीं है कि वह आ गए हैं आपसे बुद्ध के नाम पर वोट मांगने या राम के नाम पर वोट मांगने या कि फिर सेकुलरिज्म या रेशनलिज्म के नाम पर वोट मांगने और आप बहक जाते हो। आप उन्हें वोट दे देते हो। समस्या यह है कि वो वोट मांगने आया है और राम को और बुद्ध को और पेरियार को नहीं जानता। और जिससे वोट मांगने आया है वो खुद भी नहीं जानता। ना राम को ना बुद्ध को ना कृष्ण को वो खुद भी नहीं जानता ना उधर कोई जानने वाला ना इधर कोई जानने वाला अंधा अंधे ठेलिया दोनों कूप पड़ंत वो आकर के कह रहा है कि बुद्ध के नाम पर वोट दे दो अब हम बुद्ध के नव अनुयाई हैं वो कह रहा है कि कृष्ण के नाम पर वोट दे दो और आप अरे भाई आपको भी अगर पता होता अगर वोटर को रामत्व कृष्णत्व बुद्धत्व का वास्तविक अर्थ पता होता तो जो लोग उसको इन नामों से फुसलाकर उसका वोट ले जाते हैं। क्या वो फिर अपना वोट यूं बिकने देता? बोलो। तो बोलिए क्या मैं उसको दोष दूं जो आकर के आपसे कह रहा है कि देखो बुद्ध का ऐसा, बुद्ध का वैसा हम भी तो चैतन्य लोग हैं। भाई हमें क्यों नहीं बुद्ध का कुछ पता? और बुद्ध की हमसे कोई चर्चा करने आया है। हमें तो बड़ी खुशी होगी कि आया तो कोई बुद्ध की राजनीति करने। आओ बैठो। बुद्ध की राजनीति करते हैं। आओ बैठो। बताओ कहां से त्रिपिटक खोलें? क्या करें? कैसे करनी है बात? बोलो। जातक कथाएं खोलें। उतना तो तुम्हें पड़ेगा। बोलो क्या? अरे कुछ भी नहीं। तो चलो आर्य सत्य से ही शुरू कर देते हैं। इतनी तो बात हो। यहां तो क्या करा है? स्लोगन बना दिया। एक एक चुनावी नारा बना दिया इन ऊंचे नामों को भी। हम और इंसान ने खुद को गिरा लिया।
सवाल: क्या यह अपेक्षा उचित है कि जिन मतदाताओं को आर्थिक योजनाओं से प्रभावित किया जा रहा है, उनसे दर्शन और राजनीतिक समझ की गहरी जागरूकता भी अपेक्षित हो?
जवाब: जिसे जीना है उससे यह अपेक्षा क्या ज्यादा हो जाएगी कि होश में जियो। जिसे जीना है उससे यह उम्मीद ज्यादा है क्या कि होश में जियो। पूछ रहा हूं। नहीं नहीं तो यह ज्यादा कैसे हो गई? मैं देखता हूं महिलाओं की ओर और कहता हूं कि तुम्हारे साथ चुनावी क्षेत्र में भी तो वही हो रहा है जो गृह क्षेत्र में होता है। बिकते तो पुरुष भी हैं। अहंकार का काम ही है बिकना और खरीदना। वहां बस यही है क्रय विक्रय। लेकिन पुरुष जब बिकता है तो उसको बोलते हैं आज नौकरी के लिए बिक जा। धर्म के लिए बिक जा। उसको यह बातें आज जमीन के लिए बिक जा। उसको यह सब लुभाववने बातें दिखाई जाती है कि यह सब देंगे तुझे। आ वोट दे दे अपना। तो बिकता पुरुष भी है पर उसकी बोली थोड़ी ऊंची लगती है। महिला को सिलाई मशीन, वाशिंग मशीन, गैस सिलेंडर, ₹1000, प्रेगनेंसी बेनिफिट। महिला इन चीजों पे बिक रही है। और क्यों? क्योंकि घर में भी उसके साथ यही चला है। बात चुनावी क्षेत्र की नहीं है। बात उसके व्यक्तिगत क्षेत्र की है। जैसे वो खुद को जानती नहीं रही है। अपना मूल्य कभी पहचानती नहीं रही है। तो सदा से छोटी-छोटी बातों पर बिकती रही है। वैसे ही आज वो अपना वोट भी बस चंद रुपयों के लिए बेच देती है। आक्षेप महिला पर कोई नहीं लगा रहा हूं अकेला। पुरुष भी यही कर रहा है पर सोचो तो पुरुषों से जब बात की जाती है तो मुद्दा बेरोजगारी का होता है अक्सर कहते हैं ना अच्छा ये सब आए हैं बेरोजगार युवा तो बेरोजगार युवाओं के लिए क्या करा नेताजी ने कह रहे इतनी नौकरियां खुलवा देंगे सरकारी आपने कभी नहीं सुना होगा कि बेरोजगार युवतियों के लिए क्या किया बेरोजगार युवतियों के लिए क्या किया सामूहिक विवाह ताकि पिताओं के ऊपर कन्यादान का जो बोझ है वो हट जाए तो ये क्या कर रहे हो इस पे हमें हंसी आ रही है। लेकिन ये कितना दुखद है अभी रियलाइज हो रहा है ये चीज। ये क्या कर रहे हो? कुछ नया नहीं कर रहे हो। मैं चौंकता भी नहीं। वही कर रहे हो जो परंपरा से लगातार अपने घर में ही अपने साथ करवाते आए हो। वही आज चुनावी क्षेत्र में भी तुम्हारे साथ हो रहा है। सोचो तो कि किस चीज पे एक साइकिल दे दी जाएगी। और वो बिल्कुल ऐसी हो जाती है कि पता नहीं क्या दे दिया मुझे। तुम्हें गैस के सिलेंडर में ₹100 कम कर दिया जाएगा। वो बिल्कुल अघा आ जाती है। मजा आ गया। ₹100 कम कर दिया। तुम्हारे जीवन का तुम्हारी चेतना का यही मूल्य है। पहली बात तो ₹100 क्या करोड़ क्या अरब के लिए भी नहीं बिकना चाहिए। लेकिन अगर बिक ही रहे हो तो यह भी तो देख लो कि तुम्हारे घर का जो पुरुष है उसकी बोली 10 गुना ज्यादा लग रही है। तुम इतने कम में काहे को बिक रहे हो? बात कुछ आ रही है समझ में? स्त्री ने अपना मूल्य करना कभी जाना नहीं है क्योंकि उसकी अपनी अस्मिता कभी रही नहीं है। वो पैदा तो होती है बच्ची लड़की और उसके बाद वो जो बनती है वो उसे पुरुष द्वारा ही बनाया जाता है। आप कहेंगे नहीं फलानी है उसके घर में तो ज्यादातर औरतें ही औरतें थी। कोई लड़की है उसकी परवरिश सिर्फ औरतों ने ही करी है। वो जो औरतें हैं जिन्होंने उस लड़की की परवरिश करी। उन औरतों को पुरुष ने बनाया है। बनाने वाला पुरुष ही है। कर्ताधर्ता पुरुष ही है। आज फिर भी कुछ बाप ऐसे होते हैं या पति ऐसे होते हैं जो कहेंगे कि साहब हम प्रोग्रेसिव हैं। हम हम बड़े दिल के हैं। बड़े उदारवादी हैं। तो हम तो कहते हैं जाके सबसे भिड़ जाओ और किसी के सामने दबना नहीं, किसी के सामने झुकना नहीं। हां, किसी के सामने दबना नहीं, किसी के सामने झुकना नहीं। लेकिन पति और बाप के सामने जरूर झुकना। जाकर दुनिया भर में लड़ लो और जाकर फिर पति के सामने बिछ जाओ। यह वहां पर तुम्हें कोई आजादी नहीं है। वहां कोई आजादी नहीं है। बात समझ में आ रही है? खूब पढ़ो लिखो, खूब पढ़ो लिखो। उससे अच्छा वर मिलेगा। कई बार तो वह पढ़ी लिखी इसलिए रही होती है कि जितने दिन अभी उसके लिए लड़का खोजा जा रहा है, उतने दिन में तू आजकल कोई डिग्री पूरी कर ले। यही चलता आया है और अब यही काम चुनावी क्षेत्र में हो रहा है। जैसे उसका मूल्य कभी नहीं लगाया गया परिवार द्वारा समाज द्वारा उसी तरह उसका मूल्य अब राजनैतिक दलों और नेताओं द्वारा नहीं लगाया जा रहा लगाया जा रहा है वही कौड़ियों के भाव कौड़ियों के भाव पर फिर किसी को दोष नहीं दूंगा मनुष्य है स्त्री और प्रत्येक मनुष्य का दायित्व होता है कि वो अपनी मुक्ति के लिए स्वयं उत्तरदाई रहे स्वयं संकल्पित ित रहे मनुष्य है उसको बार-बार महिला नारी स्त्री बोलना यह सब भी कुछ सुहाता नहीं ज्यादा आप इंसान हो पैदा हुए हो कुछ दिन के लिए हो मर जाओगे मरने से पहले आजाद उड़ना है कि नहीं उड़ना है वो आपका अपना फैसला होता है किसी को दोष मत दीजिए ना परंपरा को ना इतिहास को ना अपने शरीर को ना समाज को ना पितृसत्ता को ना नेताओं को ना व्यवस्थाओं को किसी को नहीं दीजिए आप यदि अपने आप को दमित पाती हैं, कैद में पाती हैं। तो यह सारी कारा तोड़ने की जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ आपकी है। दूसरा अगर चाहेगा भी तो कुछ नहीं कर सकता। एक सीमा पर जाकर सब सहायता रुक जाती है। उसके आगे आपका अपना सार्वभौम क्षेत्र है। आपका अपना जीवन है। आपको तय करना है कि आपको आजादी चाहिए कि नहीं चाहिए। इतना ही नहीं कि बाहर की जितनी भी मदद आती है वह एक जगह रुक जाती है। आप अगर मुक्त होना चाहती ही नहीं है तो बाहर से कोई आएगा भी आपको मुक्त कराने तो आप मदद के लिए बढ़ते हुए हाथ को भी अस्वीकार कर दोगे। उसके आगे भी जा सकते हो। मदद के लिए जो हाथ बढ़ रहा होगा उसको मरोड़ दोगे। यह भी कर सकते हो। क्योंकि फैसला आपका है। मनुष्य हो आप। चेतना और जिंदगी आपकी है।
सवाल: क्या बढ़ता हुआ महिला वोट प्रतिशत लोकतंत्र में वास्तविक सशक्तिकरण का संकेत है या केवल चुनावी रणनीति और वोट बैंक की राजनीति का नया रूप?
जवाब: देखिए यह बात अच्छी भी हो सकती है और बहुत खतरनाक भी हो सकती है क्योंकि महिला वोटर है। अब यह जो वोटर है अगर यह गलिबिल है। गलिबिल माने इसे बहुत आसानी से बहकाया बरगलाया जा सकता है। अगर यह जो वोटर है 50% वोट हैं महिलाओं के। और बड़ी संख्या में आपने कहा कि पुरुषों से ज्यादा अनुपात में निकल रही है वोट देने को भी। यह बात लोकतंत्र के लिए बहुत-बहुत शुभ भी हो सकती है और खतरे की भी हो सकती है। क्योंकि अब यह जो वोट देने नया वोटर निकल रहा है जो लिंग से स्त्री है यह चेतना से कैसा है? अगर यह ऐसा है कि भावपूर्ण नारे लगा करके इसको भ्रमित किया जा सकता है। अगर सुंदर और रंगीन नजारे दिखा दिखा के इसको आकर्षित किया जा सकता है। प्रभावित किया जा सकता है। तो यह बात लोकतंत्र के लिए कुछ अच्छी नहीं हुई ना। उसके बाद तो नेता को बस यह करना है कि सुंदर बनकर सामने आना है। मनभावन बातें बोलनी है। कुछ वादे करने हैं। कुछ नारे सुनाने हैं, कुछ गीत सुनाने हैं। और यह जो 50% वोटर है, खतरा खड़ा हो जाएगा कि अगर यह वोटर चैतन्य नहीं है तो ज्यादा आसानी से बहक जाएगा। दूसरी बात महिला जब वोट डालने जा भी रही है तो वह मन से कितनी स्वाधीन है। कहीं ऐसा तो नहीं कि वो वोट उस महिला का नहीं उस घर का है। उस मोहल्ले का है, उस समाज का है, उस समुदाय का है, उस जाति का है, उस पंथ का है? आप यह तो कह रहे हो कि महिला वोट डालने जा रही है। पर क्या हमें यह पता है निश्चित रूप से कि वह वोट उस महिला का उसके पति का नहीं है या उसके बाप का नहीं है। पूरे घर का नहीं है। घर में ऊपर जो मुखिया बनकर बैठा हुआ है। उसने आज्ञा जारी कर दी है और वही आज्ञा जाकर के महिला का वोट बन गई है। कहीं ऐसी बात तो नहीं है। महिला अगर यह फिर कहती भी है कि नहीं मेरा वोट तो अपना है। मेरा स्वतंत्र वोट है। मैं जागरूक महिला हूं। मैं आजाद महिला हूं। तो यह तो बता दो कि तुम्हारी जागरूकता और आजादी का मतलब क्या है? अगर कोई आकर के तुमसे लुभाववनी बातें करके चित्ताकर्षक बातें करके तुमसे मीठी बातें करके हम तुम्हें भावुक करके तुमसे गलत फैसले करा ले जाता है। यही काम तो सब विक्रेता कर रहे हैं ना। आपने देखा है आफ्टरनून में टीवी पर जो आता है मामला वह ज्यादातर दोपहर के जो सोप्स वगैरह होते हैं वह महिलाओं के लिए होते हैं। आपने देखा है ना किस बौद्धिक स्तर के होते हैं। इससे यह पता चल रहा है कि जो भी कुछ कोई महिलाओं को बेचना चाहता है वो ये तय करके चलता है कि महिलाओं की बौद्धिकता का स्तर तो नीचे का होता है। आपने देखा है ना यह सब? आपने देखा है महिलाएं जो भी चीजें खरीदती हैं उनके विज्ञापन भी कैसे होते हैं। जैसे किसी बच्चे को लुभाया जा रहा हो। विज्ञापन दाता भी महिला की बौद्धिकता को बहुत कम करके आंक रहा है और मुझे बड़ा अफसोस है कि वह सफल हो जा रहा है। महिलाएं उसे सफल होने दे रही हैं। जब एक एक एक फिल्म बनाने वाला जब एक साड़ी बेचने वाला जब एक साबुन बेचने वाला जब एक टीवी सीरियल बेचने वाला आपको आकर लुभा ले जाता है। मीठी-मीठी गोल-गोल भावना प्रधान बातें करके तो कोई नेता भी तो आके आपसे गोल-गोल मीठी-मीठी बातें करके आपको लुभा ले जाएगा ना। अब बताइए यह बात लोकतंत्र के लिए अच्छी हुई या खतरे की हुई? तो महिलाओं का बड़ी संख्या में बाहर निकलना प्रथम दृष्ट या तो शुभ बात है। पर उसके आगे खतरा भी है। महिला को जगना पड़ेगा। हमें एक चैतन्य वोटर चाहिए। चैतन्य वोटर मनुष्य जो सोच सकता हो जो समझ सकता हो जो अपने शरीर का और समाज का गुलाम ना हो। ठीक है? फिर चाहे वो पुरुष के भेष में आए और चाहे महिला के भेष में आए।
सवाल: क्या महिलाओं को राजनीति में 33% आरक्षण देना वास्तविक सशक्तिकरण है, और क्या उनके मतदान निर्णय को उनकी “चेतना” के स्तर से जोड़कर देखा जा सकता है?
जवाब: महिला की स्थिति बड़ी विद्रूप विकृत और और विचित्र रही है। उसको खुद को जानने लायक माहौल ही नहीं दिया गया है। कोई महिला यदि आपको किसी क्षेत्र में अग्रणी या सफल या नेत्री नजर आती है तो इसे अपवाद मानिएगा। इसे व्यवस्था की सफलता मत मानिएगा। यह मत कहिएगा कि हमारा लोकतंत्र इतना अच्छा है कि देखो उसमें से महिला मुख्यमंत्री एक के बाद एक निकल के आई हैं। यह मत कह दीजिएगा। ऐसा नहीं है। देखिए महिला पैदा होती है और पैदा होते ही उस बच्ची को जीवन के बारे में एक चित्र दे दिया जाता है। एक खाका एक मॉडल दे दिया जाता है। यह है जिसमें तुम्हारी यह जगह है और तुम ऐसेसे करोगी तो तुमको यह यह लाभ होंगे और तुम ऐसेसे करोगी तो तुम पर खतरा आएगा नुकसान होगा। तुम्हें दंड मिलेगा और वह यही सब कुछ अपने चारों ओर लगातार होते हुए देखती है। है तो इंसान ही ना और इंसान माने वो जो माया का आसानी से शिकार हो सकता है। जिसको डराओ तो डर सकता है। और जिसको लुभाओ तो लुभ सकता है। महिला लुभ जाती है। इंसान है वो भी। महिला डर जाती है। इंसान है वो भी। और उसके बाद वह जो आपके सामने जो स्त्री निकल कर के आती है उसमें निजता बहुत कम होती है। उसमें समाज संयोग परंपरा इनके प्रभाव ही ज्यादा दिखाई देते हैं। आप नहीं कह पाओगे कि ये एक इंडिविजुअल है। उसमें इंडिविजुअल जैसा बहुत कम है। उसके विचार बाकी महिलाओं जैसे हैं। जीवन को लेके उसकी मान्यता बाकी महिलाओं जैसी है। उसका खाना पीना और उसकी वेशभूषा उसका अलंकरण आभूषण सब बाकी महिलाओं जैसा है। उसके अपने आप को लेकर मान्यता समाज में जीवन में परिवार में अपने स्थान को लेकर आग्रह सब बाकी महिलाओं जैसे हैं। तो मैं यह कैसे कह दूं कि महिलाएं कम विकसित होती हैं। महिला मनुष्य ही नहीं हो पा रही है। हमने उसको जिस ढांचे में रखा हुआ है, हमने उसको जिस कैद में पैदा किया और उसे कह देते हैं अब यहीं बड़ी हो जा। वो बड़ी हो ही नहीं पा रही है। तो महिलाएं कम विकसित होती हैं ये कहना बात बड़ी अजीब हो जाएगी। कैटेगरी मिसमैच हो जाएगा। देखिए विकसित कोई हुआ कि नहीं हुआ। यह बात तब ना जायज होती है। यह सवाल प्रासंगिक ही तब होता है जब पहले उसकी अपनी कोई इंडिविजुअलिटी हो, कोई सत्ता हो। वो कुछ हो। वो इतनी सी है। और आपने उससे कह दिया कि तुम पिंक फ्रॉक पहनोगी और गुड़िया से खेलोगी और बाल लंबे करके रखोगी। वह अभी इतनी सी है। यहीं से उसका आपने खेल खत्म करना शुरू कर दिया है। और आपने उससे कह दिया है कि तुम ऐसे करके खड़े होगी। भले ही भैया कहीं भी चढ़ सकता है, कूद सकता है, दीवार के ऊपर चढ़ जाएगा, अलमारी के ऊपर चढ़ जाएगा, कूद फांद लेगा। पर तुमको ना बहुत पोलाइट और बहुत कंपोज्ड पोश्चर रखना चाहिए और बिहेवियर करना चाहिए। भैया आकर के ऐसे ही आया बाहर से अपने कपड़ेपड़े उतार करके कूद गया बिस्तर पर सो गया कुछ कर रहा है वो लड़की अभी छोटी ही है वो अपने शर्ट के दो चार बटन खोल ले मां आ के उसको चांटा मार देगी कहेगी आर यू अ बॉय आर यू अ बॉय तुम कैसे अपने बटन खोल के घूमने लग गई अब उसके बाद हम यह भी कहें कि वो विकसित नहीं हुई है। वह मानसिक रूप से पिछड़ी हुई है। तो यह बात को समझ में नहीं आती। मैं इस बात को गलत भी नहीं बोल रहा। मैं इस बात को कह रहा हूं कैटेगरी मिसमैच है। कोई बड़ा हो गया हो, किसी को स्वाधीन माहौल मिला हो, जिसे अवसर मिले हो, उसके बाद वो कहे कि भाई मैं गलत चुनाव कर रहा हूं, तो मैं उसे दोष भी दूं। जिसको आपने बचपन से ही हर तरीके से बोंजाई बना दिया। उसकी फिर हम शिकायत करें। यह बात मुझे न्याय की लगती नहीं है।
सवाल: क्या दर्शन (चेतना) और राजतंत्र (व्यवस्था) को व्यावहारिक रूप से अलग मानकर चलना आवश्यक है, ताकि प्रशासनिक विकास और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे कार्य प्रभावी ढंग से हो सकें?
जवाब: नहीं उनको अलग-अलग करके वैसे ही देखना पड़ेगा जैसे हम अपने खाने को और अपने कपड़ों को अलग रखते हैं। आप अपना खाना अपने कपड़ों के ऊपर गिरा नहीं लेते ना और ना आप यह करते हो कि जहां आपका खाना रखा है वहीं पर जाकर अपने कपड़े बिछा दो ये नहीं करते ना लेकिन आपके खाने में और आपके कपड़ों में कुछ साझा है। बोलो क्या? दोनों आपके लिए हैं। दोनों आपके लिए हैं। लेकिन फिर भी इन दोनों को आप मिला नहीं देते। लेकिन इन दोनों में फिर भी एक मेल चलना जरूरी है। उल्टा पुल्टा खाना खाओगे तो जो कपड़े पहन रहे हो पहन नहीं पाओगे। कहोगे अरे बटन क्यों नहीं बंद हो रहा? तो आप पूछ रहे हो कि दर्शन और राजतंत्र कहां आकर मिल जाते हैं? ठीक वहां जहां से उनका साझा उद्गम है। द मैन, द इंडिविजुअल। दर्शन भी मनुष्य के कल्याण के लिए है और राजतंत्र इसलिए है ताकि वह बाहरी परिस्थितियां स्थापित हो सके जिसमें मनुष्य का अधिकतम कल्याण हो सके। व्यवस्था बाहरी व्यवस्था तो बन सके। तो दर्शन कहता है कि मनुष्य 100 तरीके से घिरा होता है भीतर अपने। किससे घिरा होता है? बाहरी प्रभावों से घिरा होता है और बाहरी प्रभाव ऐसे रहे कि मनुष्य आजाद हो सके। यह काम पॉलिटिकल साइंस का है। यह काम सारी साइंसेस का है। इसीलिए उपनिषद विद्या और अविद्या को साथ लेकर के चलते हैं। देखिए समझिए। दर्शन आपने खूब पढ़ लिया। ठीक? दर्शन आपने खूब पढ़ लिया और अब आपके भीतर वह रोशनी है, चेतना है जो कह रही है साहब मुझे झंझटों से आजाद जीना है। मुझे निर्भीक जीना है। मुझे प्रेमपूर्ण जीना है। मुझे सहज सरल जीना है। मुझे सच्चा और दमदार जीवन जीना है। आप भीतर से तो ऐसे हो गए। और बाहर व्यवस्था कैसी है? अराजकता की, दमनकारी, शोषणकारी, भेदभाव पूर्ण बाहर ऐसी है तो आपके लिए मुसीबत खड़ी हो जाएगी। अब आपके सामने दो ही रास्ते रहेंगे। या तो शहीद हो जाओ या पाखंडी हो जाओ। क्योंकि अगर आप भीतर से जग गए हो और जो बाहर की व्यवस्था वो गड़बड़ है तो आपको शहीद ही होना पड़ेगा। क्योंकि अब आप घुटने तो टेकोगे नहीं। ना हाथ मिलाओगे। अब भिड़ना आपके लिए अनिवार्य हो जाएगा तो शहीद होना पड़ेगा। अब शहीद होना आखिरी बात होनी चाहिए ना भाई जिंदगी इसलिए तो मिली नहीं है कि जल्दी से शहीद हो जाओ। शहादत का वर्णन तो व्यक्ति तभी करता है जब कहता है कि सही रास्ते में अब और कोई विकल्प बचा नहीं है। अब एक ही तरीका है कि जान दे दूं अपनी। तो शहादत तो आखिरी विकल्प होता है। दूसरा फिर आपके पास विकल्प यह बचेगा कि मैं प्रकाशित हूं पर बाहर दुनिया अंधेरे की है और जीना मुझे इसी अंधेरे में है। तो चलो अब मैं अंधेरे से हाथ मिला लेता हूं। यह पाखंड हो जाएगा। तो दर्शन आपको भीतर से प्रकाशित करने के लिए और बाकी सब शास्त्र सब विज्ञान जिसमें कि समाजशास्त्र और राजनीति शास्त्र सब आ जाएंगे। वह इसलिए है ताकि बाहर अंधेरा इतना घना ना हो कि आपके भीतर के दिए के सामने वीरगति के अलावा कोई रास्ता ना बचे। बात समझ में आ रही है? दर्शन इसलिए है, धर्म भी इसीलिए है ताकि आपके भीतर दिया जल सके। और बाकी सब विधाएं और विज्ञान इसलिए हैं ताकि बाहर के तूफान और अंधेरे इतने प्रबल ना हो जाए कि दिए को शहीद ही होना पड़े। इन दोनों को एक साथ चलना पड़ेगा लगातार। लेकिन इन दोनों में भी प्रमुख कौन है? दर्शन दर्शन। क्योंकि बाहर भी आपको अगर प्रकाश लाना है तो कौन लाएगा बाहर प्रकाश? व्यक्ति ही लाएगा। आपके भीतर का लाएगा। तो दोनों चाहिए होती हैं विद्या और अविद्या। पर इन दोनों में भी प्रथम कौन है? सदा विद्या ही प्रथम है। ठीक है? तो मनुष्य को भीतर से जगना होता है और आम आदमी जगा ही रह सके। उसको जगे होने की पेनल्टी ना देनी पड़े। उसको जगे होने का दंड ना भुगतना पड़े। उसे अपनी सच्चाई का अफसोस ना माना पड़े। इसलिए राजनैतिक व्यवस्था होती है कि जो जगा हुआ आदमी है उसको सम्मान मिले, मान मिले, स्थान मिले। उसको अपने अपनी जागृति का रंज ना रह जाए। उसको यह ना रहे कि सब नशे में है, सब बेहोश हैं। मैं भी इनके जैसा होता तो मुझे इतना दुख क्यों झेलना पड़ता? मैं तो बस इस बात का दंड भोग रहा हूं कि मैं देख सकता हूं और यह सब अंधे हैं। देख नहीं सकते तो खुश हैं। हम तो इन दोनों को साथ चलना पड़ेगा। जो राजनीति दर्शन से विमुख हो गई वह राजनीति बस अंधों की व्यवस्था स्थापित करेगी।
सवाल: क्या दार्शनिकों के लिए केवल चेतना और जागरण की बात करना पर्याप्त है, या उन्हें व्यावहारिक राजनीति में भी सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए?
जवाब: तुम मेरी गीता में आओ। वो कहेंगे ये हमारा काम नहीं है। तुम इंसान हो कि नहीं हो? इंसान के घर में पैदा हुए थे ना होमोसेपियंस हो ना तो तुम्हें भी अध्यात्म चाहिए। राजनेता तो तुम बाद में बने हो। मनुष्य जन्म से ही हो। मनुष्य तुम्हारा होना प्रथम बात है। तो पहले आओ मेरे साथ बैठो। जीवन समझे, दर्शन समझे, अध्यात्म समझे। उसके बाद राजनीति बड़ी खूबसूरती से हो जाएगी। पतंजलि थे, चाणक्य थे। हर जगह हम देखते हैं कि ऋषि मुनि या दर्शन शास्त्री राजाओं के साथ में या उनको आगे हर जगह है। आपकी रामायण महाभारत से ले किसी भी ग्रंथ को उठा लें। कृष्ण भी उपदेश कर रहे हैं। युद्ध नहीं लड़ रहे हैं। लेकिन पूरे युद्ध के मैदान में हैं। उपदेश दे रहे हैं। जिसको आप रखते भी हैं। वो दर्शन ही है और चल रहा है वहां युद्ध। कर्म चल रहा है। कर्म योग का सिद्धांत यही है। तो आप जैसे वर्तमान समय के ऋषि कम से कम सपोर्ट तो कर सकते हैं इन लोगों का। कर ही तो रहे हैं। आपको क्या लगता है? नहीं राजनेताओं का। घर-घर में राजनीति नहीं चल रही है क्या? आपको क्या लग रहा है कि ये जितने छात्र हैं मेरे ये सब किसी ना किसी तरीके से राजनीति में सक्रिय नहीं है क्या? सब अपनेप मोर्चों पर युद्धति हैं। सब जूझ रहे हैं। सब अर्जुन है। आपको आपको क्यों लग रहा है कि यहां जो काम हो रहा है उसका कोई व्यापक ऐतिहासिक प्रभाव नहीं होगा। बस इतना है कि आप जहां बैठे हुए हैं वह जगह अभी थोड़ा हमारे क्षेत्र से दूर है। तो यहां पर जो जो सुनामी जो भूचाल तैयार हो रहा है अभी आप तक उसकी खबर उसकी आहट उसकी लहरें पहुंच नहीं रही है। नहीं तो यह समझ लीजिए कि सोया हुआ आदमी जब जगता है ना तो सब बदल देता है। राजनीति तो बहुत छोटी चीज है। ये ये दुनिया बदल देंगे। ये सभ्यता, संस्कृति सब बदल देंगे। यह एक सिविलाइजेशनल चेंज है जो हम ला रहे हैं। उसमें राजनीति तो बहुत छोटी चीज है। राजनीति तो बदल ही जाएगी, अपने आप बदल जाएगी। कहते हैं ना प्यार का दर्द है। मीठा-मीठा प्यारा प्यारा है। तो हम आप तो हम आप तो मस्त हो के बैठ गए हैं यहां पे। देखिए वो खड़े हुए हैं। परेशानी ही तो झेल रहे हैं ना। हमारे लिए तो ये पंखा यहां पर चल रहा है। यहां कौन सा पंखा चल रहा है? वो वहां पीछे खड़े हैं। उतनी पीछे वहां उनको कुछ सुनाई भी नहीं पड़ रहा। पर फिर भी खड़े हुए हैं। हां। वो वहां और पीछे थे। उन्होंने अभी बच्चा था उसको ऊपर उठा रखा था। परेशानी झेल रहे हैं। और मुझे ये देखिए वो वो देखिए देखिए देखिए। तो परेशानी झेल रहे हैं और मेरा इनसे वादा कभी भी यह नहीं रहा है कि तुम्हें मेरे साथ चलने पर सुख मिलेगा। मेरा वादा बस इतना रहा है कि अगर तुम दर्द झे तो अपने बगल में मुझे खड़ा पाओगे।
सवाल: क्या वर्तमान विकास वास्तव में प्रगति है या चेतना के अभाव में यह केवल बाहरी सुधारों तक सीमित रह गया है, जिसमें अभी और गहरी संभावनाएँ बाकी हैं?
जवाब: देखिए एक रुकी हुई घड़ी भी कहते हैं ना कि दिन में दो बार समय दिखाती सही समय दिखाती है तो कुछ मुझे अच्छे काम अच्छे कर्म होते हुए दिखाई जरूर देते हैं पर उनको लेकर के मैं बहुत आशान्वित हो नहीं पाता एक शराबी भी हो सकता है कि वो कुछ कदम तक सही रास्ते पर जा रहा हो पर वो सही रास्ते पर अगर जा रहा है तो इसलिए इसलिए नहीं कि उसके भीतर की दिशा सही है। यह संयोग है कि थोड़ी देर के लिए लुढ़कतेपुढ़कते वो सही रास्ते पे चल दिया और थोड़ी देर में वो दाएं जा रहा था तो बाएं भी चलना शुरू कर देगा। क्योंकि नशे में तो वह तब भी था जब ऐसा लग रहा था कि वह सही काम कर रहा है। तो मैं अगर अभी कोई अच्छा काम कहीं होते देखता भी हूं तो ठीक है अच्छी बात है अच्छा काम हो रहा है। लेकिन अच्छा काम जब तक अच्छे केंद्र से नहीं आ रहा तब तक उस अच्छे काम को लेकर के बहुत आशा बैठाना अपने आप को धोखा देने की बात है। कौन सा अच्छा काम देखा है अभी आपने हाल में? मान लीजिए सड़क बन गई कहीं पर। हम मान लीजिए एयरपोर्ट कहीं बन रहा है। मान लीजिए कहीं सफाई दिखाई देने लग गई। मान लीजिए कोई विधेयक पारित हो गया। बहुत सारे काम हैं जो अगर सिर्फ उसको उसको लोकली देखें उसको आइसोलेशन में अलग करके पृथकता में देखें तो आप कहोगे यह काम तो साहब अच्छा हुआ। उदाहरण के लिए आपने बीच में अभी जिक्र करना चाहा था। फिर आपने छोड़ दिया था महिलाओं के लिए 33% आरक्षण की बात। अब ये अपने आप में काम अच्छा है। इन इटसेल्फ इंडिविजुअली इन आइसोलेशन ये काम अपने आप में अच्छा लग रहा है। लेकिन जब मैं इसको एक व्यापक क्षेत्र में रख के देखता हूं तो मैं कहता हूं जो 33% महिलाएं होंगी जो पहुंच जाएंगी संसद में कौन होंगी? मैं कहता हूं महिलाएं तो अभी भी रहती हैं। कम से कम वो 8% 10% रहती हैं। कभी-कभी 14-15% भी हुई हैं वो संसद में। तो ये कौन रही है महिलाएं? वो ज्यादातर महिलाएं पुरुषों के नेताओं के राजनीतिज्ञों के यहां की बहू बेटियां बीवियां रही हैं या कि पार्टियों में ही जो बहुत साधारण स्तर की कार्यकर्ताएं रही हैं जिनको एक तरीके से आप कहिए कि भेंट देकर के ऊपर बैठा दिया गया है। वो ऐसे रही हैं। तो मुझे इसमें बहुत फिर आशा दिखती नहीं है। मैं बहुत सम्मान करता हूं उन महिला विधायकों का और सांसदों का भी जो वहां पहुंची हैं। ठीक है। पर उनमें से बहुत सारी तो यह रही है कि चलो चेहरा अच्छा है तो पहुंचा दें। अभिनेत्री है। थोड़ी देर पहले भी आपसे कहा था अभिनय से मुझे कोई समस्या नहीं और अभिनेत्रियां भी कलाकार हैं। वो भी सम्मान के बिल्कुल पात्र हैं। लेकिन फर्क होता है ना इंसान और इंसान में फर्क होता है ना। कोई वहां इसलिए पहुंचा है क्योंकि उसका रूप रंग चेहरा मोहरा अच्छा था। और कोई वहां इसलिए पहुंचा है कि अभिनेता था। अभिनेता होना उसका व्यवसाय था। उसकी कला थी। अब अभिनेता से वो नेता भी हो सकता है वास्तव में। यह दो बहुत अलग बातें होती हैं। तो अगर 33% महिलाएं संसद में हो भी गई पर वो जगी हुई महिलाएं नहीं है। वो चेरी पिक्ड महिलाएं हैं। आप बात समझ रहे हैं? जैसे अभी पंचायत स्तर पे बहुत होता है। हां। कि सरपंच जी खुद चुनाव नहीं लड़ सकते। तो अपनी अपनी पत्नी को वो मिस सरपंच बना देते हैं। मिसेज सरपंच बना देते हैं। अब इसी तरह काम संसद में भी शुरू हो गया तो मैं उसको तरक्की प्रगति कैसे मानूं और कैसे खुशी मनाऊं तो अभी मैं कोई अच्छा काम बहुत होते देखता भी हूं। मैं कहता हूं चलो ठीक है अच्छा काम हो रहा है। लेकिन वो कोई बहुत खुशी मनाने की बात नहीं है। जब तक व्यक्ति भीतर से नहीं जगा हुआ है। उसके अच्छे काम भी सब देखतेदेखते बुरे हो जाएंगे।
सवाल: क्या सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों से चल रहे “इमेज वॉर” और मनोवैज्ञानिक प्रभाव को नियंत्रित करना संभव है, और इसके बीच आम जनता अपनी सोच और निर्णय क्षमता को कैसे सुरक्षित रख सकती है?
जवाब: नहीं इसमें ऐसा लगता है जैसे जो इंजेक्ट कर रहा है, जो डाल रहा है उसका हमने दोष बता दिया है। हम सोशल मीडिया का दोष बता देते हैं। सोशल मीडिया क्या है? व्यापार है। धंधा है। धंधा ही तो है। दुनिया में इतने धंधे हैं। उसमें से एक धंधा यह भी है। सोशल मीडिया वो कंपनियां ही तो हैं और क्या है? तो वो तो आए ही हैं आपसे पैसा लेने के लिए। वो कोई आपका कल्याण करने तो आए नहीं है। इसी तरीके से बहुत बार मीडिया का दोष बता दिया जाता है। मीडिया क्या है? साधु है, संत है। मीडिया का सब काम आश्रमों में चलता है। मठों में चलता है। मीडिया हिमालय के ऊपर बैठ के ज्ञान की पुस्तकें लिख रहा है। ध्यान में मग्न है। नहीं मीडिया भी क्या है? धंधा है, व्यापार है। उनका दायित्व ही नहीं है कि वो आपको उठाएं कि उबारें। हम बहुत परेशान हो जाते हैं। हम कहते हैं अरे पहले हमें मीडिया भ्रष्ट कर रहा था। फिर सोशल मीडिया भ्रष्ट कर रहा था। अब एआई भ्रष्ट कर रहा है। एआई भी क्या है? वह भी बिजनेस है, व्यापार है। तो उनका काम कहां है? उन्होंने कभी आपसे कहा कि हम तुम्हें मुक्ति देने आए हैं। उन्होंने कहा आप टीवी चैनल खोलते हो। उसमें कभी लिखा आता है क्या कि यह टीवी चैनल देख के आपको अपने सब आंतरिक भ्रमों से और व्यामोह से मुक्ति मिल जाएगी। आप अपने चैनल में ऐसा बोलते हैं किसी को? बट नहीं तो मैं इस पे एक पॉइंट जरूर ऐड करना चाह रहा था। इसी मीडिया के जरिए आपकी बात भी तो जा रही है। इसी सोशल मीडिया के इस मीडिया के जरिए नहीं जा रही है। इस मीडिया से लड़ के जा रही है। जितना मुझे एल्गोरिथ्मिक रेजिस्टेंस मिला है वो मैं ही जानता हूं। जान लगा दी है कि एल्गोरिदम के प्रचंड विरोध के बावजूद आप तक मेरी बात पहुंच पाए। एल्गोरिदम का विरोध, मीडिया का विरोध सबका और विरोध सिर्फ ऐसे ही नहीं किया जाता कि हाय हाय ब्लैक आउट, बॉयकॉट, कैंसिल, नारेबाजी सबसे बड़ा बॉयकॉट होता है उपेक्षा। इग्नोर करना इररेलेवेंट बना दो। इररेलेवेंट बना दो। देश के बड़े-बड़े मीडिया हाउसेस के लिए दशकों तक मैं कुछ था ही नहीं। इररेलेवेंट। उनमें से कईयों के लिए अभी भी मैं हूं ही नहीं। एज इफ आई डोंट एक्सिस्ट। तो, आप यह मत कहिए कि उसी मीडिया के जरिए मैं इन तक पहुंचा हूं। बहुत मेहनत करके पहुंचा हूं। दुनिया भर के विरोध के बावजूद पहुंचा हूं। तो अलग बात है। लेकिन मैं मीडिया को भी दोष नहीं दे रहा कि उसने मुझे इरिलेवेंट करा या कि उसने मेरा विरोध करा। क्योंकि फिर बोल रहा हूं वो कौन से साधु संत हैं। वो तो बाजार खोल करके बैठे हुए हैं। और क्या करके बैठे हैं? और उसमें ऐसा भी नहीं है कि जो बाजार खुली हुई है उसमें एक सात्विक बाजार है और एक तामसिक बाजार है। लोग कहते हैं गोदी मीडिया विरोधी मीडिया साहब वो एक ही दुकान के दो काउंटर हैं। एक दुकान होती है ना उसमें कई बार दो काउंटर होते हैं। कुछ यहां से खरीदो अपनी पसंद का माल। बाकी यहां से खरीदो अपनी पसंद का माल। तो आप क्यों उम्मीद कर रहे हो कि कोई भी आएगा आपको बचाने के लिए। आप कैसे मासूम लोग हो? कभी आप सोचते हो कि कोई बाहरी व्यवस्था राजनीति बचा देगी। कभी आप सोचते हो कि बाहर से कोई मसीहा आकर बचा देगा। कभी आप स्तुति करने लग जाते हो कि गुरु आएगा आपको बचा देगा। कभी राजनेता बचा देगा। कभी सोचते हो कि मीडिया आपका तारणहार बन जाए। कभी कहते हो न्यायपालिका हमारी रक्षा करेगी। कोई नहीं करता किसी की रक्षा। आप मनुष्य हो। सर्वप्रथम अपनी मुक्ति का दायित्व आपका अपना है। और अगर आप अपने आप को बाहरी बंधनों में पा रहे हो तो उसका कारण बाहरी बंधन बाद में है। आप पहले हो इसको स्वीकार करो इस बात को। नहीं तो बस विक्टिम बने रह जाओगे। हम क्या करें? सोशल मीडिया ने हमको गलत चीजें दिखा दी। हम क्या करें? एल्गोरिदम ही भ्रष्ट है। हम क्या करें? जुडिशरी करप्ट हो गई है। अब हम क्या करें? नेता सारे चोर हैं। यही करते रह जाओगे बस। ये जितनी बातें आप बोलोगे वो झूठ नहीं होंगी। झूठ नहीं होंगी। बस प्रथम नहीं है वो। वो सारी बातें बाद में आती है। हां मीडिया करप्ट है। हां हो सकता है जुडिशरी भी करप्ट हो। हां हो सकता है यूनाइटेड नेशंस भी करप्ट हो। सब हो सकता है करप्ट हो। बिल्कुल हो सकता है। लेकिन उन सबसे पहले आम आदमी करप्ट है। और आम आदमी मतलब आप और मैं। हमें सुधरना पड़ेगा। हम जिस दिन सुधरने लग गए उस दिन कम से कम हमारा तो कल्याण शुरू हो गया और फिर बात हमसे आगे बढ़ेगी। हो सकता है दूर तक जाए। दूर तक नहीं भी गई तो कोई फर्क नहीं पड़ता। जीनी तो हमें अपनी जिंदगी है ना। हम अपने आप को बेहतर बनाएं। हम भीतर से जगे। शुरुआत यहां से करें तो फिर देखते हैं बात आगे कहां तक जाती है। जाएगी तो जाएगी। नहीं तो राम की मर्जी। आप जैसे लोग भी तो हैं। मतलब हम सिर्फ यह पहलू क्यों देखें कि सब कुछ बुरा बुरा चल रहा है। आप जैसे से मतलब है बहुत सारे लोग हैं जो सकारात्मक बात कर रहे हैं या दर्शन को प्रसारित करने की इसी चेतना के जागरण की इसी अवेकनिंग का प्रयास कर रहे हैं। कुछ एक प्रयास है। स्वामी विवेकानंद ने भी तो ऐसे ही एकल प्रयास किया। आदि शंकराचार्य ने भी ऐसा ही एकल प्रयास किया। ना स्वामी विवेकानंद ना शंकराचार्य और ना मैं मैं तो बहुत छोटी चीज हूं। बहुत एक तुच्छ नाम हूं। वो कहीं अलग नहीं है। वो कहीं दूर के नहीं है। वो भी आपको बाहर से बचाने नहीं आ सकते। वो भी आपके भीतर ही बैठे हुए हैं। वो आपकी सच्चाई के रूप में आपके हृदय में हैं। हम क्या कहा करते हैं? हरे वो बाहर नहीं प्रकटेंगे कहीं। आस ये अवरुद्ध करो हरि भीतर ही अभी यदि स्वयं से तुम युद्ध करो कोई बाहर से नहीं आएगा आचार्य शंकर भी नहीं आएंगे विवेकानंद भी तुम्हारा कल्याण नहीं कर सकते इतने अवतार आए और चले गए जिनको भ्रष्ट रहना था जिनको बंधन में रहना था वो आज भी बंधन में है तुम्हारे ही भीतर से कृष्ण प्रकट होंगे यदि तुम स्वयं से युद्ध करो अर्जुन होने का अर्थ होता है आंतरिक अर्थ होता है अपने ही विकारों के प्रति अहंकार का अपने ही प्रति युद्ध तुम स्वयं से युद्ध करो तब बाहर से कोई विवेकानंद आएगा कि कोई आचार्य आएंगे तो वो भी तुम्हारे काम आ पाएंगे। नहीं तो इतनी बड़ी दुनिया है। वो सब के सब तो नहीं चले गए थे ना विवेकानंद को सुनने और आचार्य शंकर का भी बड़ा विरोध हुआ था। विवेकानंद को यूं ही इतनी कम उम्र में नहीं जाना पड़ा। और आचार्य शंकर को भी जान से मारने की क्या-क्या साजिशें हुई थी वो आप जानते हो। वो भी बहुत कम उम्र में ही चले गए थे। कोई वजह तो होगी ना कि दो नाम आपने लिए और दोनों ऐसे थे कि 40 भी ना देख पाए। कोई वजह तो रही होगी ना। क्या वजह थी? हम वजह हैं और भूलिएगा नहीं। जो ऊंची से ऊंची चेतना हो सकती है, वह आपके हृदय में पहले से ही मौजूद है। अब यह फैसला आपको करना है कि आपको अपनी ऊंचाइयों की सुननी है या अपनी नीचाइयों की। आपको अपने बल की सुननी है या अपने डर की यह फैसला आपको करना है।
सवाल: भारत जैसे लोकतांत्रिक और विविधता वाले देश के लिए कौन-सा राजनीतिक ढांचा अधिक प्रभावी माना जा सकता है—विकेंद्रीकृत लोकतंत्र या केंद्रीकृत “सॉफ्ट डिक्टेटरशिप”, और क्यों?
जवाब: देखिए दो-तीन आपके सामने मैं चित्र रखे देता हूं। आप बता दीजिएगा। बुद्ध चले जा रहे हैं और उनके बुद्धत्व की यह बात है कि वह गांवों से और नगरों से गुजर रहे हैं। उनका बुद्धत्व हर दिशा में लोगों के भीतर प्रवेश कर गया है। लोग खुद बुद्ध बने जा रहे हैं। वास्तविक बुद्ध की यही पहचान होती है। उसके पास आप जब रहते हो ना तो आपके भीतर का बुद्ध जागृत सक्रिय होने लगता है। ठीक है? तो अपने जागरण के नाते, अपनी रोशनी के नाते बुद्ध के चरणों में आकर लोग बैठे जा रहे हैं। बुद्ध के सामने समर्पित हुए जा रहे हैं। बुद्ध को स्वामी ही मान लिया। वो भिक्षु है पर उन्हें कहा स्वामी। बुद्ध को स्वामी ही मान लिया। एक ये छवि है। यहां भी आप क्या पा रहे हो कि किसी व्यक्ति को लोगों ने अपने केंद्र में रख लिया। उसके सामने झुक गए, समर्पित हो गए और कहा जैसा आप कहें मालिक जैसा आप कहें। यह पहली छवि हो गई। दूसरी हो गई कि एक फिल्म स्टार है जिसका काम है लोगों को बस लुभाना। उसने शरीर बना लिया है और मस्त तरीके से नाचता है और आकर्षित करता है और यह गाने, वह गाने, यह अदाएं, यह सब करता है और वो फिल्म स्टार निकलता है सड़कों पर और लोग उसके पीछे आ जाते हैं। लोग अपनी नसें काट रहे हैं। खून में भरी चिट्ठियां भेजी जा रही है। राजेश खन्ना कहते हैं उनको आती थी। ठीक है। लौट रहे हैं उनके सामने। और कोई दूर से देखे अगर तो नजारा लगभग वैसा ही है जैसा कि बुद्ध के सामने लोग समर्पित हो रहे हैं। उनके दंडवत है सामने और चरणों पर बैठ रहे हैं। नमन कर रहे हैं। वैसा ही दिखाई देगा। एक फिल्म स्टार उसके सामने ही बैठ रहे हैं। ये दूसरा नजारा हो गया। तीसरा नजारा है कि किसी के पास कोई बहुत लुभाने वाला माल है वो लुभाने वाला माल ऐसा हो सकता है कि फिजिकल हो सकता है साइकोलॉजिकल हो सकता है वो हो सकता है कि आपको कोई कोई चीज दे रहा है या वो हो सकता है आपको कोई मान्यता दे रहा है वो हो सकता है आपको कोई वस्तु दे रहा है या हो सकता है आपको कोई विचार दे रहा है पर वो आपको लुभा रहा है वो आपको लुभा रहा है वो आपको कुछ बेच बेच रहा है। ठीक है? और बड़ी तादाद में लोग उसके सामने खड़े हो गए हैं और जीजूरी कर रहे हैं। भाई भाई आप सब कुछ है। हमारे भाई भाई भाई भाई आप हमारे आगे आगे चलिए। आप जैसा बोलोगे हम करेंगे। तीन नजारे हैं। तीनों ही नजारों में आपको दृश्य ऐसा ही दिखाई देगा जैसे सत्ता का केंद्रीकरण हो गया है। जहां बुद्ध हैं वहां भी एक तरह से सत्ता का केंद्रीकरण ही तो हो रहा है ना। राजा भी आ गए हैं। राजाओं जिनके हाथ में राजनीतिक सत्ता होती है वो भी आ गए हैं और बुद्ध के सामने झुक गए हैं। तो वो भी एक तरह सत्ता का केंद्रीकरण ही है। है ना? कि हम कहते हैं कि साहब भारत में खासतौर पे साधु वगैरह को राजाओं से भी ऊपर कहा गया। ठीक है? कि साधु तो ऐसा होता है। राजा भी जब मरता था तो वह कैसे जाता है? कैसे कैसे चलता है? जब राजा मरता है। चढ़े बांध जंजीर। और साधु क्या होता है? साधु कहते हैं बादशाह है, स्वामी है। राजा से ही बड़ा महाराजा है। तो वहां भी सत्ता है बहुत बड़ी। और कोई आपको लुभा रहा है वहां भी सत्ता है। कोई आपको शरीर देख के अपना शरीर दिखा दिखा के अपना गुलाम बना रहा है। वहां भी सत्ता है। तो यह तो इस पर निर्भर करता है ना कि लोग कैसे हैं और किस नाते किस व्यक्ति को अपनी सत्ता का केंद्र बना रहे हैं। अगर जनमानस जागृत नहीं है तो आप जिसको सत्ता का केंद्रीकरण कह रहे हो बहुत बहुत बहुत खतरनाक हो जाएगा। तब वहां कोई बुद्ध नहीं होगा। जिसको स्वामी माना जाएगा तब वहां कोई लुटेरा होगा जिसको स्वामी बना लिया जाएगा या तो लुटेरा या विक्रेता व्यापारी और व्यापारी भी ऐसा जो कि 10 का माल 10,000 में बेच रहा हो। बात आ रही है समझ में? मुझे इस बात से कोई प्राथमिक तौर पर समस्या नहीं है कि आप किसी व्यक्ति को अपना सब कुछ मान लें और कह दें कि साहब हमने आपको अधिकार दे दिए, सत्ता दे दी वो हो भी सकता है, सही हो सकता है। पर वो सही सिर्फ बहुत कड़ी शर्तों के साथ हो सकता है। जनमानस जबरदस्त रूप से जागृत होना चाहिए। जब वो जागृत होगा तो वह किसी बुद्ध को सिंहासन सौंपेगा। जब वह जागृत नहीं होगा तो किसी ठग को सिंहासन सौंप देगा और सत्ता का केंद्रीकरण तब बहुत बहुत खतरनाक बात हो जाएगी।
सवाल: क्या आपके विचारों में जो “क्रांतिकारी बदलाव” की बात है, वह वास्तव में तभी संभव है जब लोग उसे सिर्फ सुनें नहीं बल्कि अपने जीवन में उतारें और जीना शुरू करें?
जवाब: मैं तो यह पूछ रहा हूं तिवारी जी कि बाकी जितने तरीके आजमाने थे आजमा नहीं लिए क्या अभी तक भी निराश नहीं हो पा रहे हो श्री कृष्ण गीता में बार-बार क्या बोल रहे हैं निराशी निर्ममो भूतवा विगत जोर कि भाई अब तो निराश हो जाओ अपने तौर तरीकों से एक के बाद एक पार्टियां बदल के देख ली कपड़े बदल के देख लिए बीवियां और शौहर बदल के देख लिए नौकरियां बदल के देख ली लोगों ने तो धर्म भी बदल के देख लिए और लोगों ने जन्म भी बदल के देख लिए वो कहते हैं हमारे आठवां जन्म चल रहा है जो कुछ भी तुम बदल के देख सकते थे तुमने सब बदल लिया बस स्वयं को नहीं बदला अब अब ये स्वयं को ही जड़ से बदलने का मार्ग भी थोड़ा अपना कर देख लो। बाकी सब मार्गों पर तो कब से चल लिए? क्या पाया है? तो हमें एक डिसपॉइंटमेंट चाहिए। हमें एक डिसल्यूजनमेंट चाहिए। जिन गड्ढों में इतनी बार गिर चुके हो उनमें और अब क्यों गिरना है? उनसे निराश हो जाओ कि इसमें कुछ नहीं रखा। अब नहीं जाना इसकी ओर। यही एकमात्र चीज है जिसका प्रयोग किया जाना बाकी है। थोड़ा इसको आजमा के ही देख लो।

