लोकसभा चुनाव के बाद विपक्षी दलों को एकजुट रखने के उद्देश्य से बनाई गई INDIA गठबंधन की रणनीति एक बार फिर चुनौतीपूर्ण दौर से गुजरती दिखाई दे रही है। 8 जून को होने वाली महत्वपूर्ण बैठक से ठीक पहले गठबंधन के भीतर मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं। कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के बीच बढ़ती दूरी ने विपक्षी एकता को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। खास तौर पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी CPI(M) और झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने कांग्रेस की कुछ राजनीतिक गतिविधियों और फैसलों पर सार्वजनिक रूप से नाराज़गी जताई है। इससे यह संकेत मिल रहा है कि गठबंधन के भीतर सभी दलों के बीच तालमेल पहले जैसा मजबूत नहीं रह गया है।
कांग्रेस की क्षेत्रीय राजनीति पर CPI(M) ने जताई आपत्ति
बैठक से पहले CPI(M) नेतृत्व ने कांग्रेस के प्रति अपनी असहमति स्पष्ट कर दी है। पार्टी का आरोप है कि कांग्रेस ने हाल के चुनावी अभियानों के दौरान केरल में वामपंथी दलों के खिलाफ ऐसी राजनीतिक भाषा का इस्तेमाल किया जिससे विपक्षी एकता कमजोर हुई। CPI(M) महासचिव एम. ए. बेबी ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को पत्र लिखकर इस मुद्दे पर स्पष्टीकरण भी मांगा है। पार्टी का कहना है कि जब राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ एकजुटता की बात की जा रही है, तब सहयोगी दलों के खिलाफ आक्रामक राजनीतिक अभियान गठबंधन की भावना के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
झारखंड में उम्मीदवार चयन को लेकर JMM की नाराज़गी
झारखंड मुक्ति मोर्चा की नाराज़गी का कारण राज्य की राजनीति से जुड़ा है। पार्टी का आरोप है कि कांग्रेस ने कुछ महत्वपूर्ण राजनीतिक फैसलों में सहयोगियों से पर्याप्त चर्चा नहीं की और एकतरफा तरीके से कदम उठाए। विशेष रूप से राज्यसभा उम्मीदवार के चयन को लेकर JMM ने आपत्ति जताई है। पार्टी नेताओं का मानना है कि गठबंधन की राजनीति में सभी सहयोगी दलों को विश्वास में लेना आवश्यक होता है और ऐसा नहीं होने से सहयोगियों के बीच अविश्वास बढ़ सकता है। यही वजह है कि JMM ने भी अपनी असहमति खुलकर जाहिर की है।
DMK की दूरी ने और बढ़ाई चिंता
INDIA गठबंधन के सामने चुनौती केवल CPI(M) और JMM तक सीमित नहीं है। इससे पहले तमिलनाडु की प्रमुख पार्टी DMK ने भी 8 जून की बैठक में शामिल न होने का फैसला किया था। पार्टी ने कांग्रेस के कुछ राजनीतिक कदमों पर असंतोष व्यक्त करते हुए बैठक से दूरी बनाने का निर्णय लिया। DMK का यह कदम विपक्षी गठबंधन के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि दक्षिण भारत में पार्टी का प्रभाव काफी महत्वपूर्ण है।
विपक्षी एकता बनाए रखना कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस, INDIA गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते सहयोगियों के बीच संतुलन बनाए रखने की जिम्मेदारी निभा रही है। हालांकि क्षेत्रीय दलों की अपनी राजनीतिक प्राथमिकताएं और स्थानीय चुनौतियां हैं। ऐसे में कई बार राष्ट्रीय रणनीति और क्षेत्रीय राजनीति के बीच टकराव की स्थिति बन जाती है। वर्तमान विवाद भी इसी प्रकार की परिस्थितियों का परिणाम माना जा रहा है। यदि इन मतभेदों को समय रहते दूर नहीं किया गया तो विपक्षी एकता की कोशिशों को नुकसान पहुंच सकता है।
8 जून की बैठक पर टिकी सभी की निगाहें
राजनीतिक गलियारों में अब सभी की नजरें 8 जून को होने वाली बैठक पर टिकी हुई हैं। माना जा रहा है कि इस बैठक में विपक्षी दल आगामी राजनीतिक रणनीति, संसद के मुद्दों और भाजपा के खिलाफ साझा कार्यक्रम पर चर्चा करेंगे। साथ ही गठबंधन के भीतर उभर रहे मतभेदों को सुलझाने की कोशिश भी की जा सकती है। बैठक का परिणाम यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा कि INDIA गठबंधन आने वाले समय में कितनी मजबूती के साथ आगे बढ़ पाएगा।
8 जून की महत्वपूर्ण बैठक से पहले INDIA गठबंधन के भीतर उभरती नाराज़गी ने विपक्षी राजनीति को नई चर्चा दे दी है। CPI(M) और JMM द्वारा कांग्रेस की कार्यशैली पर उठाए गए सवाल, साथ ही DMK की दूरी, यह संकेत देती है कि गठबंधन के सामने केवल भाजपा का मुकाबला करना ही चुनौती नहीं है, बल्कि आंतरिक समन्वय बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस अपने सहयोगी दलों की चिंताओं को किस तरह संबोधित करती है और क्या विपक्षी गठबंधन एक बार फिर मजबूत एकता का संदेश देने में सफल हो पाता है।
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