Loss of Greenery Delhi: दिल्ली, जिसे अंग्रेजों ने अपनी राजधानी बनाने का निर्णय यमुना के मीठे पानी, अरावली की हरियाली और केंद्रीय भौगोलिक स्थिति के कारण लिया था, आज अपनी मूल खूबियों से कोसों दूर है। अब यमुना नदी केवल एक नाले के रूप में बसी है, ज़मीन के नीचे का पानी घट रहा है, और हैदरगढ़ की नहर जैसी जलधाराएं गायब हो चुकी हैं। बावड़ियां और तालाब खत्म हो गए हैं, जबकि राजधानी की आबादी चार करोड़ के करीब पहुँच गई है।
क्या हुआ जिससे प्रदूषण और धूल बढ़ी
अरावली की पहाड़ियों की तलहटी में अवैध कालोनियां बन गई हैं, जिनसे प्रदूषण और धूल बढ़ी है। सूरजकुंड और गुरुग्राम की झीलें सूख चुकी हैं, जबकि हरियाणा, दिल्ली और पंजाब में वन विभाग की जमीन संरक्षण अधिनियम (PLPA) के बावजूद संरक्षण में नाकाम हैं। परिणामस्वरूप दिल्ली-NCR की हवा बेहद जहरीली हो गई है। दिसंबर में AQI लगातार 400 पार कर गया, सांस लेना दूभर हो गया, और पेड़ काले पड़ने लगे। कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और सल्फ़र ऑक्साइड के छोटे PM2.5 कण लोगों के फेफड़े और हृदय पर हमला कर रहे हैं, जिससे लंग कैंसर और अन्य श्वसन रोग तेजी से बढ़ रहे हैं।
उठाए गए कदम
सरकारें केवल औपचारिक कदम उठा रही हैं, जैसे GRAP-3 लागू करना या वाहन प्रतिबंध, जबकि नोएडा, गुरुग्राम और ग़ाज़ियाबाद जैसी उपनगरीय सीमाओं पर कोई असर नहीं पड़ता। विश्व के विकसित शहरों जैसे बीजिंग, लंदन और न्यूयॉर्क से सबक लिया जा सकता है। वहाँ सख्त कानून, सार्वजनिक परिवहन और कृत्रिम वर्षा से प्रदूषण को नियंत्रित किया गया। दिल्ली में भी तत्काल और सख्त कदम उठाना आवश्यक है, नहीं तो राजधानी रहने लायक़ नहीं रहेगी। दिल्ली की खोई हरियाली, जल स्रोत और स्वच्छ हवा की वापसी अब सिर्फ़ गंभीर प्रशासनिक ध्यान और तत्काल कार्रवाई से ही संभव है।
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