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अब गंजेपन और झुर्रियों का इलाज आपके ही खून से, GFC थैरेपी बनी लोगों की पहली पसंद

Hair Treatment : मथुरा में आयोजित दंत चिकित्सकों की कार्यशाला में विशेषज्ञों ने बताया कि बाल झड़ने, गंजेपन और चेहरे की झुर्रियों जैसी समस्याओं का समाधान अब मरीज के अपने खून में छिपा है। GFC (ग्रोन फैक्टर कंसन्ट्रेट) तकनीक न सिर्फ हेयर फॉल रोकने में कारगर साबित हो रही है बल्कि त्वचा को जवां और स्वस्थ बनाने का भी असरदार उपाय बन गई है।

कैसे काम करती है जीएफसी थैरेपी?

मथुरा के फेशियल एस्थेटिक्स विशेषज्ञों ने बताया कि इस प्रक्रिया में मरीज के शरीर से लगभग 10 से 20 ML खून लिया जाता है। मशीन की मदद से इस रक्त से विशेष प्लाज्मा अलग किया जाता है। फिर इसे जेली जैसे माध्यम के बाद प्रभावित हिस्से में लगाया जाता है।

आमतौर पर मरीज को 20-30 दिन के अंतराल पर 4 से 6 सिटिंग दी जाती हैं। इससे शरीर की कोशिकाएं (सेल्स) मज़बूत होती हैं और निष्क्रिय हार्मोन सक्रिय हो जाते हैं। नतीजतन बालों का झड़ना रुकता है और नए बाल (Hair Treatment) आने लगते हैं। यही नहीं, चेहरे की झुर्रियां, झाइयां, मुंहासे और चोट के निशान भी धीरे-धीरे कम होने लगते हैं। त्वचा पर कसाव आने से प्राकृतिक निखार बढ़ जाता है।

कौन ले रहा है इस उपचार का लाभ?

विशेषज्ञ ने बताया कि जीएफसी उपचार खासतौर पर शादी के योग्य युवक-युवतियों और उच्च वर्ग के परिवारों में बेहद लोकप्रिय हो रहा है। इसकी खासियत यह है कि इसमें एलर्जी या अन्य गंभीर साइड इफेक्ट का खतरा नहीं है। उन्होंने दावा किया कि इसका खर्च भी बेहद किफायती है। एक सिटिंग पर लगभग 5 से 10 रुपये का खर्च आता है।

कार्यशाला में नई तकनीकों पर चर्चा

दो दिवसीय कार्यशाला में विशेषज्ञों ने दंत स्वास्थ्य, सर्जरी और कॉस्मेटिक ट्रीटमेंट से जुड़े आधुनिक तरीकों पर भी चर्चा की। इस मौके पर आईडीए के अध्यक्ष डॉ. यूनुस खान ने कहा कि बदलते दौर में मरीज अब न सिर्फ स्वास्थ्य बल्कि सौंदर्य से जुड़ी समस्याओं के लिए भी आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों पर भरोसा कर रहे हैं।

दांतों के इम्प्लांट में एआई का कमाल

दिल्ली के एक डॉ. ने बताया कि अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ने दांतों के इम्प्लांट को आसान बना दिया है। AI की मदद से मुंह, मसूड़ों और दांतों की सटीक माप मिल जाती है। पहले जहां इस प्रक्रिया को पूरा होने में तीन महीने लगते थे, अब महज एक महीने में ही इम्प्लांट संभव है। वहीं, दिल्ली के ही विशेषज्ञों ने बताया कि संक्रमण की वजह से जब नसें खराब हो जाती हैं, तब दांतों को बचाने के लिए नई तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है।

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Disclaimer : इस चैनल की स्वास्थ्य संबंधी जानकारी केवल सामान्य जागरूकता हेतु है, इसे चिकित्सकीय सलाह का विकल्प न मानें। किसी भी बीमारी, उपचार या दवा के लिए हमेशा योग्य चिकित्सक से परामर्श लें। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए News India 24×7 उत्तरदायी नहीं है।