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न गला काटा, न धमाका… फिर भी रुला गई! धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म ‘इक्कीस’

Ikkis Movie Review: बॉलीवुड के लीजेंडरी अभिनेता धर्मेंद्र की फिल्म ‘इक्कीस’ अब थिएटर में रिलीज हो चुकी है। आम वॉर फिल्म्स की तरह इसमें जोर-जोर के विस्फोट, दुश्मन के खिलाफ शोर-शराबा या हीरो का शहीद होना नहीं है, फिर भी यह फिल्म सीधे आपके दिल को छू जाती है। श्रीराम राघवन की इस बायोग्राफी ने पारंपरिक वॉर फिल्मों के सारे ट्रेंड तोड़ते हुए ‘दिल से सिनेमा’ पेश किया है।

कहानी: 21 साल का साहस, 30 साल बाद पिता की यात्रा

फिल्म 2001 की उस सुबह से शुरू होती है, जब पाकिस्तान के ब्रिगेडियर जान मोहम्मद निसार के घर में एक खास तैयारी चल रही थी। स्वागत होना है एक भारतीय रिटायर्ड ब्रिगेडियर का मदनलाल खेत्रपाल (धर्मेंद्र)।

धर्मेंद्र का बेटा अरुण खेत्रपाल (अगस्त्य नंदा) महज 21 साल की उम्र में 1971 की जंग में शहीद हो गया था। फिल्म इसी शहादत और उसके पिता के भावुक सफर को दिखाती है। श्रीराम राघवन ने दिखाया है कि कैसे बेटे की शहादत पिता के दिल में दर्द और गहराई छोड़ती है, और कैसे दोनों देशों के बीच इंसानियत की कहानी बुनी जा सकती है।

क्यों खास है ‘इक्कीस’?

‘इक्कीस’ न तो पारंपरिक युद्ध-फिल्म है, न ही उसमें जोर-जोर के विस्फोट या खून-खराबा है। फिल्म में भावनाओं का ठहराव है, शहीद जवानों के बलिदान और उनके परिवार के दर्द को दर्शाया गया है। श्रीराम राघवन ने लाउड एक्शन और वॉयलेंस ट्रेंड को पीछे रखते हुए फिल्म को सलीके से संवेदनशील बनाया है। टैंकों की लड़ाइयों को इतनी सजीवता से दिखाया गया है कि यह बॉलीवुड में पहली बार हुआ है।

निर्देशन और राइटिंग

‘इक्कीस’ की पटकथा और निर्देशन श्रीराम राघवन ने खुद लिखा है। अरिजीत बिस्वास और पूजा लाधा सुरती के साथ मिलकर उन्होंने इसे तैयार किया। फिल्म तकनीकी रूप से भी शानदार है। टैंक बटालियनों, युद्धभूमि और तनावपूर्ण माहौल का अनुभव दर्शक को वास्तविक लगता है। श्रीराम राघवन ने युवाओं और बुजुर्गों दोनों की दृष्टि से कहानी पेश की है। 21 साल का अरुण खेत्रपाल पाकिस्तान को सबक देना चाहता है, वहीं 30 साल बाद उसके पिता के दिल में कोई कड़वाहट नहीं है।

एक्टिंग: धर्मेंद्र और अगस्त्य नंदा का कमाल

धर्मेंद्र फिल्म की आत्मा हैं। हर फ्लैशबैक और वर्तमान सीन में उनका अभिनय दिल को छू जाता है। अगस्त्य नंदा ने युवा और जुनूनी सैनिक का किरदार बखूबी निभाया है। जयदीप अहलावत, सिमर भाटिया और असरानी ने भी अपनी भूमिकाओं में दमदार प्रदर्शन किया है। धर्मेंद्र की सहजता और अगस्त्य की पॉलिश्ड एक्टिंग फिल्म को एक अलग ऊँचाई देती है।

क्यों देखें ‘इक्कीस’?

अगर आप सिर्फ एक्शन, ब्लास्ट और खून-खराबा वाली फिल्म चाहते हैं तो ‘इक्कीस’ आपके लिए नहीं। लेकिन अगर आप सच्ची वीरता, फौजी और उनके परिवार की भावनाओं को महसूस करना चाहते हैं, तो यह फिल्म मिस नहीं करनी चाहिए। फिल्म हमें याद दिलाती है कि युद्ध केवल राष्ट्रवाद नहीं है, बल्कि इसमें परिवार, दर्द और मानवता भी शामिल होती है। यह कहानी उन गुमनाम नायकों की है जिन्होंने अपने जीवन की सबसे बड़ी कीमत दी।

‘इक्कीस’ सिर्फ धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म नहीं है, बल्कि एक दिल से बना सिनेमा है। यह फिल्म आपको उन जवानों की अनकही गाथा महसूस कराती है जिन्हें इतिहास और हमारे दैनिक जीवन में अक्सर भूल जाते हैं।

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