Tumhen Yaad Karte Karte: “तुम्हें याद करते-करते जाएगी उम्र सारी…” यह केवल एक गीत नहीं है, बल्कि भारतीय सिनेमा के इतिहास में दर्ज वह दुर्लभ क्षण है, जहाँ कामुकता, पीड़ा, प्रेम और गरिमा एक साथ सांस लेते हैं। फ़िल्म आम्रपाली का यह गीत अपने भीतर वह संवेदनशील सौंदर्य समेटे हुए है, जो समय के साथ फीका नहीं पड़ता—बल्कि और गहरा होता चला जाता है।
यह गीत इसलिए विशिष्ट है क्योंकि यह एक सोलो परफ़ॉर्मेंस है, और इसलिए भी क्योंकि इसे पर्दे पर जीवंत करती हैं वैजयंतीमाला जी—जिनका अभिनय, नृत्य और भावाभिव्यक्ति मिलकर इसे अद्वितीय बना देते हैं। रूपहले परदे पर उन्होंने अकेले ही भावनाओं का ऐसा संसार रचा है, जो आज भी दर्शकों को बांध लेता है।

यह गीत एक ऐसे समाज की पृष्ठभूमि में रचा गया है, जो सामंती शोषण से ग्रस्त है—जहाँ एक असाधारण कलाकार, एक नर्तकी, “नगरवधू” का सामाजिक तमगा ओढ़े हुए है। लेकिन इस गीत में वह तमगा टूटता दिखाई देता है।
यहाँ आम्रपाली सिर्फ नगरवधू नहीं रहती—वह एक स्त्री बन जाती है।
एक ऐसी स्त्री, जो अपने प्रेम, अपनी कामनाओं, अपनी दबी हुई इच्छाओं और अपने प्रिय के सानिध्य की लालसा को व्यक्त करने के लिए व्याकुल है।
गीत की शुरुआत वैजयंतीमाला जी द्वारा विचित्र-वीणा के तार छेड़ने से होती है।
यह दृश्य मानो किसी स्त्री के अंतरंग मनोभावों की पहली झिझक हो—जैसे वह अपने प्रेम को शब्दों में ढालने से पहले स्वयं से ही संघर्ष कर रही हो।
उस क्षण में वह इधर-उधर देखती है, जैसे अपनी ही भावना को छुपाने की नाकाम कोशिश कर रही हो।
फिर धीरे-धीरे शब्द उनके अधरों से बहने लगते हैं—
“तुम्हें याद करते-करते, जाएगी रैन सारी
तुम ले गए हो अपने संग, नींद भी हमारी…”

मुखड़ा गाते-गाते वह शैय्या पर लेट जाती हैं।
मुखड़े की समाप्ति के साथ ही ऐसा प्रतीत होता है मानो वह अपने भीतर की गांठें खोलने को तैयार हो गई हों।
भावनाओं का यह खुलना इतना गहन है कि उनके कंधों से दुपट्टा धीरे-धीरे फिसल जाता है।
इसके बाद कैमरा लंबे समय तक केवल उनके चेहरे पर ठहरता है—और दर्शक समझ जाता है कि इस दृश्य में शरीर नहीं, भाव प्रधान हैं।
कुछ क्षणों बाद कैमरा उनकी सम्पूर्ण काया को सामने लाता है—जहाँ वह कामुक वस्त्रों में दिखाई देती हैं।
लेकिन आश्चर्य यह है कि दर्शक उनकी देह पर टिक ही नहीं पाता, क्योंकि उनके चेहरे के भाव, उनकी आंखें और उनकी अभिव्यक्ति उस कामुकता को ऊपर उठा ले जाती हैं—उसे प्रेम और विरह के स्तर पर पहुँचा देती हैं।
पूरे गीत में वैजयंतीमाला जी की कामुकता में एक अद्भुत गरिमा है।
यह वह सौंदर्य है जो उत्तेजित नहीं करता, बल्कि भीतर तक छू जाता है।
एक ऐसा कामुक सौंदर्य, जो वासना और पवित्र कामेच्छा के बीच की रेखा को स्पष्ट कर देता है।
अन्तरे के दौरान उनके कूल्हों की मंथर गति दृश्य में लय रचती है।
उनकी पोशाक उरोजों को उभारती प्रतीत होती है, लेकिन दर्शक वहाँ ठहरता नहीं।
उनके चेहरे के भाव—विशेषकर आंखें—इस कामुकता को पूरी तरह आत्मिक बना देती हैं।
आप देखते-देखते केवल उनके चेहरे की सुंदरता में खो जाते हैं।

पहले अन्तरे से ठीक पहले वह हल्की-सी अंगड़ाई लेती हैं, अपने बाल खोलती हैं, और विशाल महल के भव्य शयनकक्ष में व्याप्त अकेलेपन को महसूस करती हैं।
यहीं कवि शैलेंद्र के शब्द आम्रपाली के मुख से झरते हैं—
“मन है कि जा बसा है, अनजान एक नगर में
कुछ खोजता है पागल, खोई हुई डगर में…”
और जब वह गाती हैं—
“इतने बड़े महल में, घबराऊँ मैं बेचारी…”
तो उनके अधरों की आकृति, आंखों में छलकता दर्द और चेहरे की मासूमियत दर्शकों को स्तब्ध कर देती है।
“घबराऊँ” शब्द कहते समय वह बच्चे-सी मुखाकृति बनाती हैं, विशाल पलकों की झपकी देती हैं और अधरों को नुकीला कर लेती हैं।
यह क्षण नृत्य और अभिनय का ऐसा संगम है, जिसे बाद की पीढ़ियों की अनेक अभिनेत्रियों ने अपनाया—मुमताज़, साधना और श्रीदेवी तक ने इसे अपने अभिनय का हिस्सा बना लिया।
गीत के अंतिम अन्तरे में वह शैय्या पर वीणा के सहारे लेट जाती हैं और बेचैनी में हाथ फेरते हुए गाती हैं—
“बिरहा की इस चिता से, तुम ही मुझे निकालो
जो तुम न आ सको तो, मुझे स्वप्न में बुला लो…”
पूरे गीत में विचित्र-वीणा उनकी सखी बन जाती है—हमराज बन जाती है।
यह उनके लिए एक मनोवैज्ञानिक सहारा है, जिसके माध्यम से वह “नगरवधू” की पहचान से बाहर निकलकर एक स्त्री, एक कलाकार और एक प्रेमिका के रूप में स्वयं को स्वीकार करती हैं।
अंतिम दृश्य में वह पूरी तरह वीणा पर ही लेटकर “बिरहा” का दुख व्यक्त करती हैं।
वीणा यहाँ किसी मित्र या संरक्षक की तरह प्रतीत होती है—जैसे कोई व्यक्ति अपने गहरे दुःख को किसी अपने के सामने रो-रोकर हल्का कर रहा हो।

गीत के अंत में वह थकी हुई-सी लगती हैं—मानो एक लंबी प्रतीक्षा ने उन्हें शिथिल कर दिया हो।
मुखड़ा तीन बार दोहराया जाता है—
“तुम्हें याद करते-करते…”
और अंततः वह वीणा पर सिर टिकाकर गहरी निद्रा में चली जाती हैं।
ऐसा अभिनय वही कलाकार कर सकता है, जो नृत्यकला में पारंगत हो।
हालाँकि तुलना उचित नहीं, फिर भी वैजयंतीमाला जी को प्रायः नरगिस और मीना कुमारी जैसी अभिनेत्रियों के समकक्ष नहीं रखा गया।
लेकिन यह गीत प्रमाण है कि इसे उनसे बेहतर कोई और निभा ही नहीं सकता था।
उनकी नृत्यसाधना ने उन्हें इस गीत के कामुक भावों को व्यक्त करने में अतिरिक्त बढ़त दी।
वहीदा रहमान जी भी शास्त्रीय नृत्य में निपुण थीं, लेकिन उनकी व्यक्तित्वगत सादगी और आंतरिक संकोच उन्हें इस प्रकार की कामुक अभिव्यक्ति से दूर रखता है—
जैसा अंतर आप बाद में माधुरी दीक्षित और जूही चावला के बीच भी महसूस कर सकते हैं।

वैजयंतीमाला जी की अदाओं में कविता छुपी हुई प्रतीत होती है।
उनकी आंखें हर शब्द को एक कहानी में बदल देती हैं।
उनकी महानता इसी में है कि उन्होंने अत्यंत कामुक और उत्तेजक भावों से भरे इस गीत को भी गरिमामय, काव्यमय और शालीन बना दिया।
उत्तेजक वस्त्र, अनुपम सौंदर्य और अंतरंग इच्छाओं से भरे इस किरदार में भी उन्होंने स्त्री की मिलन-व्याकुलता को मर्यादा, माधुर्य और विनम्रता के साथ प्रस्तुत किया।
पूरे गीत में उनकी कामुकता अनकही है—लेकिन गहराई से महसूस होती है।
यह याद रखना ज़रूरी है कि इस गीत के समय वैजयंतीमाला जी की उम्र मात्र 30 वर्ष थी।

