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कोटा में प्रसूताओं की मौत मामले में नया खुलासा, मेडिकल रिपोर्ट में ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन से मौत नहीं होने का दावा

Kota Maternal Death Case: कोटा में प्रसूताओं की मौत के मामले में मेडिकल कॉलेज प्रशासन की शुरुआती जांच रिपोर्ट सामने आ गई है। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि महिलाओं की मौत को सीधे तौर पर ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन से जोड़ना फिलहाल उचित नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक, मृत प्रसूताएं पहले से ही सेप्सिस और मल्टी ऑर्गन डिस्फंक्शन सिंड्रोम (MODS) जैसी गंभीर चिकित्सीय जटिलताओं से जूझ रही थीं। मामले की गहन जांच के लिए दवाओं और मेडिकल उपकरणों के कुल 37 सैंपल जांच हेतु जयपुर और कोलकाता की लैब्स में भेजे गए हैं। गौरतलब है कि कोटा में ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन लगाए जाने के बाद पांच महिलाओं की मौत का दावा किया गया था, जिसके बाद यह मामला गंभीर विवाद में आ गया।

इंजेक्शन पर उठे सवाल, लेकिन मौत का कारण अब भी जांच के दायरे में

मामले में ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन के एक बैच के गुणवत्ता मानकों पर खरा नहीं उतरने के बाद सवाल जरूर खड़े हुए हैं, लेकिन मेडिकल विशेषज्ञों का कहना है कि केवल दवा में कमी पाए जाने भर से मौत का सीधा संबंध स्थापित नहीं किया जा सकता। प्रशासन के अनुसार, मृत प्रसूताओं की स्वास्थ्य स्थिति पहले से ही बेहद गंभीर थी और उन्हें सेप्सिस, अत्यधिक संक्रमण तथा मल्टी ऑर्गन फेल्योर जैसी जटिलताएं थीं। ऐसे में अंतिम निष्कर्ष विस्तृत मेडिकल और लैब जांच रिपोर्ट आने के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा।

राजस्थान के अलावा दिल्ली, एमपी और यूपी में ये इंजेक्शन भेजे गए

जानकारी के मुताबिक, 23 फरवरी और 3 मार्च को कुल 16 हजार ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन मंगाए गए थे। इनमें से लगभग 10 हजार इंजेक्शन कोटा मेडिकल कॉलेज के जेके लोन अस्पताल भेजे गए, जबकि 2479 इंजेक्शन न्यू मेडिकल कॉलेज को सप्लाई किए गए। बाकी इंजेक्शन अन्य स्वास्थ्य केंद्रों और संस्थानों में वितरित किए गए थे। जांच में यह भी सामने आया है कि इस इंजेक्शन की सप्लाई केवल राजस्थान के कोटा तक सीमित नहीं थी, बल्कि नई दिल्ली, इंदौर और उत्तर प्रदेश के गोंडा समेत अन्य राज्यों में भी की गई थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए राजस्थान सरकार ने संबंधित राज्यों को सतर्क करते हुए अलर्ट जारी किया है, ताकि वहां भी दवा के इस्तेमाल और स्टॉक की जांच की जा सके।