Iran Hijab Protest: ईरान में हालात भयावह होते जा रहे हैं। जनता सड़कों पर उतर चुकी है और सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की सख्त तानाशाही के खिलाफ विरोध लगातार तेज हो रहा है। सेना तैनात होने और सुरक्षा बलों की भारी उपस्थिति के बावजूद प्रदर्शनकारियों का उत्साह कम नहीं हुआ। अलग-अलग शहरों में हुए संघर्ष में कई नागरिक मारे गए और सैकड़ों घायल हुए। पिछले साल इजरायल के साथ हुए टकराव के बाद बढ़ी महंगाई और आर्थिक कठिनाइयों ने जनता की नाराजगी को और बढ़ा दिया है।
ईरान में विरोध का लंबा इतिहास
ईरान में जन आंदोलन और विरोध की परंपरा लंबी है। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद धार्मिक नेतृत्व वाला शासन स्थापित हुआ, जिसे शुरू में शाह की तानाशाही के अंत के रूप में देखा गया। लेकिन धीरे-धीरे सत्ता धार्मिक प्रतिष्ठान और सुरक्षा तंत्र के हाथों में केंद्रीकृत हो गई। राजनीतिक दलों पर नियंत्रण, मीडिया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पाबंदियां और महिलाओं पर कड़े सामाजिक नियम आंदोलन की जड़ बने।
प्रदर्शनकारियों की मांग
2009 में हुए राष्ट्रपति चुनाव में विपक्षी उम्मीदवारों ने चुनावी नतीजों को धांधली करार दिया। इसी के विरोध में तेहरान और कई अन्य शहरों में हरे रंग के प्रतीक और बैंड पहनकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन शुरू हुए। इसे “ग्रीन मूवमेंट” कहा गया। प्रदर्शनकारियों की मांग थी, पारदर्शी चुनाव, राजनीतिक स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों की रक्षा। हालांकि सरकार ने इंटरनेट और मीडिया पर प्रतिबंध लगाए और हजारों लोगों को गिरफ्तार किया, लेकिन आंदोलन ने यह स्पष्ट कर दिया कि बड़ी संख्या में ईरानी नागरिक खुला और जवाबदेह शासन चाहते हैं।
आर्थिक असंतोष और बिखरे हुए विरोध
ग्रीन मूवमेंट के लगभग एक दशक बाद ईरान में महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के खिलाफ कई प्रदर्शन हुए। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और सरकारी सब्सिडी में कटौती से बिगड़ी अर्थव्यवस्था ने जनता को उकसाया। 2019 में पेट्रोल की कीमतें बढ़ाए जाने पर विरोध हिंसक रूप ले लिया। प्रदर्शनकारियों ने बैंकों, सरकारी भवनों और पोस्टरों को निशाना बनाया। इंटरनेट बंद किया गया, लेकिन जनता ने दिखा दिया कि वे केवल राजनीतिक ही नहीं, बल्कि आर्थिक सुधार भी चाहते हैं।
हिजाब कानून के खिलाफ जन क्रांति
सितंबर 2022 में 22 वर्षीय कुर्द युवती महसा अमीनी को नैतिकता पुलिस ने हिरासत में लिया। कथित हिजाब नियमों का पालन न करने पर हिरासत में उनकी मौत ने पूरे देश में गुस्से की चिंगारी भड़काई। यह आंदोलन अब केवल हिजाब विरोध तक सीमित नहीं रहा, बल्कि व्यापक सामाजिक और राजनीतिक बदलाव की मांग बन गया। महिलाओं ने खुले तौर पर हिजाब उतारकर, बाल काटकर और विरोध प्रदर्शन कर विरोध जताया। विश्वविद्यालय, स्कूल और कार्यस्थलों में भी इसका समर्थन देखने को मिला। सोशल मीडिया पर वैश्विक समर्थन ने आंदोलन को और ताकत दी।
अब पूरी व्यवस्था पर सवाल
हाल के प्रदर्शनों में यह साफ दिख रहा है कि जनता अब केवल किसी नीति या कानून के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरी इस्लामी गणराज्य की संरचना पर सवाल उठा रही है। “मुल्लाओं को जाना होगा” जैसे नारे इस असंतोष की गूंज हैं। छात्र, महिलाएं, मध्यम वर्ग, जातीय अल्पसंख्यक और कभी-कभी मजदूर वर्ग भी इस बदलाव की मांग में शामिल हैं। उनकी मांगें राजनीतिक स्वतंत्रता, आर्थिक न्याय, लैंगिक समानता और व्यक्तिगत आज़ादी—परस्पर जुड़ी हुई हैं।
अंतरराष्ट्रीय नजर और भविष्य
मानवाधिकार संगठन लगातार दमन और गिरफ्तारियों पर चिंता जता रहे हैं। सोशल मीडिया की मदद से ईरानी आवाजें तुरंत वैश्विक स्तर पर पहुँच रही हैं। हालांकि भू-राजनीतिक कारणों से बड़े देशों की प्रतिक्रियाएं सीमित रही हैं, लेकिन आंदोलन ने यह दिखा दिया कि ईरानी समाज में बदलाव की मजबूत इच्छा है।
ग्रीन मूवमेंट, आर्थिक विरोध और महसा अमीनी आंदोलन में एक साझा धारा जवाबदेह शासन, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और महिलाओं की बढ़ती भूमिका है। हर आंदोलन के बाद सत्ता और सुरक्षा तंत्र सख्त होता है, लेकिन समाज राजनीतिक रूप से अधिक जागरूक बनता है। नई पीढ़ी सोशल मीडिया और वैश्विक संपर्क से दुनिया भर के विचारों से जुड़ी है।
छोटी चिंगारी से जनविस्फोट
ईरान के ये आंदोलन हमें याद दिलाते हैं कि लंबे समय तक राजनीतिक दमन, आर्थिक असमानता और सामाजिक पाबंदियां हों, तो किसी भी छोटी चिंगारी से बड़े जनविस्फोट की संभावना बन जाती है। वोट की इज्जत, महिलाओं की गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की मांगें ईरान में लोकतंत्र और समानता की जड़ें लगातार मजबूत कर रही हैं।
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