Bengal Assembly Elections 2026: पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर सियासी संग्राम अब खुलकर सामने आ चुका है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) और बीजेपी के बीच यह लड़ाई सिर्फ वोटर लिस्ट की नहीं, बल्कि 2026 के चुनावी नैरेटिव की नींव रखने की जंग बन गई है। सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्देशों के बाद टीएमसी इसे अपनी “बड़ी जीत” बता रही है, लेकिन सवाल है क्या वाकई कोर्ट के आदेश ने बीजेपी और चुनाव आयोग को झटका दिया है, या यह सिर्फ एक राजनीतिक व्याख्या है?
कोर्ट का आदेश कैसे बना हथियार?
टीएमसी का तर्क साफ है सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग (ECI) को SIR प्रक्रिया में पारदर्शिता और मतदाता सुविधा बढ़ाने के सख्त निर्देश दिए हैं, जो पार्टी की मूल मांगों से मेल खाते हैं। यही वजह है कि पार्टी इसे केंद्र सरकार और बीजेपी की नैतिक हार बता रही है। TMC सांसद अभिषेक बनर्जी ने इसे “मां-माटी-मानुष की जीत” बताते हुए कहा कि करोड़ों असली मतदाताओं का अधिकार बचा लिया गया है। पार्टी का दावा है कि बीजेपी सवा करोड़ वोटरों के नाम काटने की साजिश रच रही थी, जिसे कोर्ट ने रोक दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने 19 जनवरी 2026 के आदेश में चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि जिन 1.25 करोड़ नामों में ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ पाई गई है, उनकी पूरी सूची तीन दिनों के भीतर ग्राम पंचायत, ब्लॉक और वार्ड कार्यालयों में सार्वजनिक की जाए। इससे मतदाताओं को यह जानने का मौका मिलेगा कि उनका नाम सूची में है या नहीं।
इसके साथ ही कोर्ट ने कुछ अहम राहतें भी दीं-
दस्तावेज जमा करने के लिए 10 दिन का अतिरिक्त समय
पंचायत और ब्लॉक स्तर पर दस्तावेज जमा करने की सुविधा
उम्र प्रमाण के लिए कक्षा 10 का एडमिट कार्ड मान्य
सुनवाई के दौरान परिवार के सदस्य या BLA को साथ रखने की अनुमति
हर दस्तावेज जमा करने पर रसीद देने का निर्देश
TMC का कहना है कि यही उनकी लड़ाई थी, और कोर्ट ने उसे मान लिया।
लेकिन कोर्ट ने SIR रद्द नहीं किया
यहां पूरा सच समझना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने न तो SIR प्रक्रिया रद्द की है, न ही हटाए गए नामों को अपने आप बहाल करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि SIR का मकसद फर्जी वोटरों को हटाना है, लेकिन कोई भी योग्य मतदाता बाहर नहीं होना चाहिए। यानी प्रक्रिया जारी रहेगी, बस अब ज्यादा पारदर्शी और मतदाता-अनुकूल होगी। असल में कोर्ट ने ECI की मौजूदा व्यवस्था को खत्म नहीं किया, बल्कि उसे और मजबूत किया है।
पहले से प्रक्रिया में थे
चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया में पहले से ही नोटिस जारी करने, दस्तावेज जमा कराने, फॉर्म-7/8 से आपत्ति दर्ज करने और BLO/राजनीतिक दलों की मदद लेने की व्यवस्था थी। ड्राफ्ट वोटर लिस्ट के बाद 15 से 30 दिन का समय भी पहले से तय था। फर्क सिर्फ इतना है कि अब लिस्ट को बड़े पैमाने पर स्थानीय स्तर पर सार्वजनिक करना अनिवार्य कर दिया गया है, ताकि कोई मतदाता जानकारी के अभाव में बाहर न रह जाए।
बिहार का उदाहरण
बंगाल में जिस आदेश को टीएमसी जीत बता रही है, वैसा ही आदेश सुप्रीम कोर्ट ने पहले बिहार के SIR के दौरान भी दिया था। तब भी हटाए गए नामों की बूथ-वाइज सूची प्रकाशित करने, दस्तावेज मान्य करने और क्लेम दर्ज करने के निर्देश दिए गए थे। बिहार में 65 लाख नाम हटे थे, लेकिन फाइनल लिस्ट में करीब 18 लाख नए नाम जुड़े। जनता ने इसे वोटर लिस्ट की सफाई माना, साजिश नहीं। नतीजा NDA को भारी बहुमत मिला और विपक्ष का नैरेटिव नहीं चला।
बिहार की गलती दोहराने से बचना
टीएमसी इस बार कोई रिस्क नहीं लेना चाहती। पार्टी ने अपने कार्यकर्ताओं को 100% एन्यूमरेशन फॉर्म जमा कराने और हर बूथ पर नजर रखने के निर्देश दिए हैं। BLA को BLO से अलग न होने की हिदायत दी गई है और ‘वोट चोरी’ को बंगाली अस्मिता से जोड़कर बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश हो रही है। सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को बीजेपी की हार बताकर टीएमसी इसे चुनावी हथियार बना रही है, ताकि ग्रासरूट स्तर पर भावनात्मक माहौल तैयार किया जा सके।
सबसे बड़ा विरोधाभास
यह टीएमसी की राजनीति का सबसे कमजोर पक्ष है। बंगाल में सरकार टीएमसी की है और SIR प्रक्रिया को अंजाम देने वाले BLO भी राज्य सरकार के ही कर्मचारी हैं। ऐसे में बीजेपी पर साजिश का आरोप लगाना पार्टी के लिए आसान नहीं है। TMC को प्रशासनिक नियंत्रण का फायदा जरूर है, लेकिन यही उसकी सीमा भी है क्योंकि वह यह नहीं कह सकती कि उसकी अपनी सरकार के अधिकारी बीजेपी के इशारे पर काम कर रहे हैं।
जीत का दावा
सुप्रीम कोर्ट के आदेशों से टीएमसी को नैरेटिव सेट करने का मौका जरूर मिला है, लेकिन इसे कानूनी जीत कहना गलत होगा। SIR जारी है, फर्जी नाम हटेंगे और चुनाव आयोग की प्रक्रिया चलती रहेगी।
अब असली सवाल यह है की क्या टीएमसी इस आदेश को जनता के मुद्दे में बदल पाएगी? या फिर बिहार की तरह यह मुद्दा भी पारदर्शिता के सामने फीका पड़ जाएगा? बंगाल में SIR की लड़ाई अदालत से निकलकर अब सीधे जनता के बीच पहुंच चुकी है और फैसला वहीं होगा।
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