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SIR विवादः पश्चिम बंगाल में ममता सरकार की ढाई चाल, CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ शिकायत दर्ज

पश्चिम बंगाल पुलिस ने शुक्रवार को दक्षिण 24 परगना जिले में मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कई शिकायतें दर्ज कीं। ये शिकायतें राज्य में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के शासन के दौरान चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान कथित उत्पीड़न से जुड़ी हैं। चुनाव आयोग ने आगामी कुछ महीनों में होने वाले चुनावों से पहले मतदाता सूची को अपडेट करने के लिए एसआईआर लागू किया था।

एसआईआर को लेकर विवाद

विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का उद्देश्य मतदाता सूची में तार्किक विसंगति वाले नामों की जांच करना है। पिछले साल 4 नवंबर को बंगाल में इसे लागू किया गया था। इसके तहत 16 दिसंबर को प्रकाशित मसौदा मतदाता सूची में लगभग 58 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए गए और 116 लाख मतदाताओं को “तार्किक विसंगति” के तहत चिह्नित किया गया। इस प्रक्रिया के दौरान कई लोगों ने उत्पीड़न और अन्य परेशानियों की शिकायत की।

सुप्रीम कोर्ट का आदेश

एसआईआर को लेकर विवाद बढ़ने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में न्यायिक अधिकारियों को नियुक्त करने का निर्णय लिया। इसका उद्देश्य चल रही मतदान प्रक्रिया में सूचीबद्ध मतदाताओं के दावों का निष्पक्ष निपटारा करना था। हालांकि, इसके बावजूद विवाद और गतिरोध जारी हैं, क्योंकि कई मतदाता अपनी शिकायतों के समाधान की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

शिकायतकर्ताओं को टीएमसी का समर्थन

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी से जुड़े कैनिंग पुरबा के विधायक सौकत मोल्ला शिकायतकर्ताओं के साथ जिबंतला पुलिस स्टेशन पहुंचे। उन्होंने इन लोगों के पक्ष में शिकायत दर्ज कराई और आरोप लगाया कि मतदाता सूची की समीक्षा के दौरान राज्य में लोगों के साथ दुर्व्यवहार किया गया। पुलिस ने इस संबंध में कहा कि उन्हें एसआईआर के दौरान उत्पीड़न से संबंधित सात शिकायतें मिली हैं, जिनकी जांच की जाएगी। हालांकि, इन शिकायतों के आधार पर अभी तक एफआईआर दर्ज नहीं की गई है।

आगे क्या होगा?

पुलिस ने स्पष्ट किया कि जांच प्रक्रिया शुरू की जाएगी और तथ्य सामने आने के बाद उचित कार्रवाई की जाएगी। इस कदम से यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है कि मतदाता सूची का अद्यतन और एसआईआर प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी रहे। चुनाव आयोग और राज्य प्रशासन की भूमिका इस मामले में अहम होगी, ताकि मतदाता अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके और आगामी चुनावों में किसी प्रकार की गड़बड़ी न हो।

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