BSP Supremo Mayawati: बहुजन समाज पार्टी मुश्किल दौर से गुजर रही है, लेकिन पार्टी सुप्रीमो मायावती के तेवर अब भी पहले जैसे सख्त और आक्रामक नजर आ रहे हैं। अपने 70वें जन्मदिन के मौके पर मायावती ने कार्यकर्ताओं और समर्थकों को संबोधित करते हुए साफ संदेश दिया कि संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि दलितों, पिछड़ों और उपेक्षित वर्गों के सम्मान के लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन समर्पित किया है और जब तक जीवित रहेंगी, यह लड़ाई जारी रहेगी।
इशारों-इशारों में कई साजिशों का जिक्र
मायावती ने अपने भाषण में न सिर्फ अपनी सेहत को लेकर फैली अटकलों को खारिज किया, बल्कि खुद को बसपा संस्थापक कांशीराम का एकमात्र राजनीतिक उत्तराधिकारी बताते हुए पार्टी पर अपनी मजबूत पकड़ भी जाहिर कर दी। उन्होंने इशारों-इशारों में उन साजिशों का जिक्र किया, जिनके जरिए बसपा को कमजोर करने की कोशिशें हो रही हैं। उनका कहना था कि वह किसी दबाव, डर या लालच के आगे झुकने वाली नहीं हैं और पार्टी की कमान पूरी मजबूती से उनके हाथों में ही रहेगी।
गुटबाजी और विरोधियों को सख्त संदेश
मायावती ने पार्टी के भीतर हाल के दिनों में सामने आई गुटबाजी पर भी अप्रत्यक्ष रूप से नाराजगी जताई। उन्होंने स्पष्ट कहा कि कुछ लोग पार्टी को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन वे इसमें सफल नहीं होंगे। उन्होंने भरोसा जताया कि बसपा के सच्चे कार्यकर्ता उन्हें निराश नहीं करेंगे और आंदोलन को आगे बढ़ाएंगे।
सोशल इंजीनियरिंग का फिर संकेत
अपने संबोधन में मायावती ने पारंपरिक दलित वोट बैंक के साथ-साथ उन जातियों का भी उल्लेख किया, जो हाल के दिनों में राजनीतिक चर्चा के केंद्र में रही हैं। माना जा रहा है कि यह बसपा के पुराने सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूले की ओर लौटने का संकेत है, जिसने पार्टी को पहले कई चुनावी सफलताएं दिलाई थीं। मंच से मायावती की ‘आयरन लेडी’ वाली छवि साफ दिखाई दी, जिसने कार्यकर्ताओं में नया जोश भरने का काम किया।
सपा के पीडीए पर तीखा हमला
मायावती ने समाजवादी पार्टी के पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) मॉडल पर भी तीखा प्रहार किया। उन्होंने आरोप लगाया कि सपा शासन में पिछड़े वर्गों के आरक्षण का लाभ सीमित समाज तक ही सिमट कर रह गया, जबकि मुस्लिम समुदाय भी खुद को उपेक्षित महसूस करता रहा। उन्होंने दावा किया कि आगामी चुनावों में दलित, पिछड़ा और अल्पसंख्यक समाज का समर्थन पहले से कहीं ज्यादा बसपा को मिलेगा और सपा का पीडीए प्रयोग कमजोर साबित होगा।
सबसे कठिन दौर से गुजर रही बसपा
फिलहाल बसपा कई मोर्चों पर चुनौतियों का सामना कर रही है। राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा खतरे में है, राज्यसभा में पार्टी का प्रतिनिधित्व नहीं रहेगा और विधानसभा में केवल एक विधायक बचा है। इन हालात में पार्टी अपने अस्तित्व को बचाने की जंग लड़ रही है। हालांकि, मायावती ने यह भी गिनाया कि कुछ राज्यों के निकाय चुनावों में पार्टी ने बेहतर प्रदर्शन किया है और संगठन को मजबूत करने के लिए प्रदेश प्रभारियों और अध्यक्षों में बदलाव किए गए हैं।
स्पष्ट है कि मायावती ने अपने जन्मदिन को सिर्फ औपचारिक आयोजन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे राजनीतिक संदेश देने और पार्टी में नई जान फूंकने का मंच बना दिया। अब देखना होगा कि यह जोश और रणनीति आने वाले विधानसभा चुनाव में कितना असर दिखा पाती है।

