Varanasi Holi 2026: रंगों की होली से ठीक पहले काशी में आस्था, वैराग्य और मृत्यु-दर्शन का अद्भुत संगम देखने को मिला। शनिवार को मणिकर्णिका घाट पर मसाने की होली खेली गई जहां जलती चिताएं, शवयात्राएं और चिता की राख के बीच नागा साधु-संन्यासी भक्ति में लीन दिखे।
भस्म से शुरू हुआ रंगोत्सव
डमरू की थाप के साथ साधु-संन्यासी घाट पर पहुंचे। पूजन के बाद भस्म, गुलाल और अबीर बाबा मसान नाथ को अर्पित किए गए। जैसे ही डमरू गूंजा, होली का अनोखा रंग चढ़ गया चिताओं की राख से होली खेली गई। जिस भस्म से आमतौर पर लोग दूरी बनाते हैं, उसी में आज श्रद्धा और विश्वास के साथ लोग सराबोर नजर आए।
नरमुंड, त्रिशूल और वैराग्य
नागा संन्यासी गले में नरमुंडों की माला, हाथों में त्रिशूल और चेहरे पर भस्म लगाए दिखे। “हर-हर महादेव”, “बम-बम भोले” और “नमः पार्वती” के जयकारों से घाट गूंज उठा। कई साधु जलती चिता के शांत होने का इंतजार करते रहे और फिर उसी राख से भस्म होली खेली।
शवयात्राओं के बीच उत्सव
घाट पर जश्न जारी रहा और उसी बीच शवयात्राएं भी गुजरती रहीं। रंग, गुलाल और भस्म की उड़ान के साथ यह दृश्य जितना रहस्यमय था, उतना ही आध्यात्मिक। साधुओं ने शिवभक्तों के चेहरों पर बारी-बारी से चिता की राख लगाई और फिर एक-दूसरे पर जमकर भस्म उड़ाई।
विदेशी पर्यटक भी झूमे
रंग और भस्म में सराबोर होकर विदेशी पर्यटक भी डमरू की धुन पर झूमते नजर आए। घाट की गलियों में जबरदस्त भीड़ रही हर तरफ भस्म उड़ती दिखी और डमरू की गूंज देर तक सुनाई देती रही।
रिकॉर्ड भीड़
इस अनोखे रंगोत्सव को देखने और इसमें शामिल होने के लिए 3 लाख से ज्यादा श्रद्धालु और पर्यटक काशी पहुंचे। मसाने की होली ने एक बार फिर साबित कर दिया कि काशी में मृत्यु भी उत्सव है और भक्ति, वैराग्य के रंगों से जीवन का सबसे गहरा दर्शन कराती है।
मणिकर्णिका घाट की मसाने की होली सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि काशी की आत्मा है जहां राख में रंग, मृत्यु में उत्सव और वैराग्य में भक्ति दिखाई देती है।
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