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संस्कृत शिक्षा और सनातन संस्कृति का महत्व : डॉ. राजनंद शास्त्री

by | Oct 7, 2025 | राजस्थान

Gyanodaya Conclave : डॉ. राजनंद शास्त्री ने कहा कि संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है। उन्होंने बताया कि वर्तमान समय में संस्कृत शिक्षा को कई कारणों से नजरअंदाज किया जा रहा है। कुछ सरकार के संसाधनों की कमी, कुछ युवा वर्ग में जागरूकता की कमी और कुछ लोगों की धारणा कि संस्कृत पढ़ने के बाद करियर सीमित हो जाता है, इसकी बड़ी वजह है।

डॉ. शास्त्री ने स्पष्ट किया कि संस्कृत पढ़ने के बाद करियर के कई अवसर उपलब्ध हैं। युवा केवल व्याख्याता तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे आरएसी, आईएएस और अन्य सरकारी विभागों में भी अपनी योग्यता दिखा सकते हैं। संस्कृत पढ़ने से व्यक्ति वेद, उपनिषद और अन्य शास्त्रों को समझ सकता है और इसे दैनिक जीवन और प्रबंधन में उपयोग कर सकता है।

ज्योतिष और एस्ट्रोलॉजी के विषय पर डॉ. शास्त्री ने कहा कि ज्योतिष विज्ञान है, पाखंड नहीं। उन्होंने बताया कि केवल सरकारी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से ज्योतिष में एमए करने वाले ही आचार्य बन सकते हैं। बिना अध्ययन के ज्योतिष का अभ्यास करने वाले केवल भ्रम पैदा करते हैं।

उन्होंने युवा पीढ़ी को संस्कृत और सनातन संस्कृति की ओर आकर्षित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। डॉ. शास्त्री ने कहा कि सनातन शाश्वत है, जिसका कोई आरंभ और अंत नहीं। युवाओं को यह समझना चाहिए कि हमारी संस्कृति और भाषा हमारी धरोहर हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि रामायण काल में हनुमान जी ने ‘माते’ शब्द का प्रयोग किया था, जो संस्कृत का शब्द है।



डॉ. शास्त्री ने राम मंदिर निर्माण में अपनी भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि संस्कृत और वेद ज्ञान ने पंडितों की चयन प्रक्रिया में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे संस्कृत और सनातन संस्कृति को अपनाएं, इसे समझें और इसकी सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध रहें।

डॉ. शास्त्री ने निष्कर्ष में कहा कि शिक्षा समाज को बदलने और विकास की राह पर आगे बढ़ाने का सबसे मजबूत माध्यम है। संस्कृत और सनातन की सही शिक्षा से युवा न केवल अपने ज्ञान का विकास करेंगे, बल्कि अपने समाज और संस्कृति की सुरक्षा में भी योगदान देंगे।

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