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त्वचा के रोग नहीं, मन पर भी घाव छोड़ जाते हैं! करौली मेडिकल कॉलेज का शोध “न्यूरोक्वांटोलॉजी” जर्नल में प्रकाशित

Rajasthan News: राजस्थान के करौली मेडिकल कॉलेज के वरिष्ठ संकाय सदस्यों ने एक ऐसा शोध कार्य किया है जिसने चिकित्सा जगत में नई सोच को जन्म दिया है। असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. प्रेमराज मीना (मनोचिकित्सा विभाग), डॉ. जीतेन्द्र मीना (चर्म रोग विभाग) और डॉ. शिशुपाल मीना (मेडिसिन विभाग) द्वारा किए गए इस सिस्टेमिक रिव्यू आधारित शोध को प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल “न्यूरोक्वांटोलॉजी” में प्रकाशित किया गया है।

शोध का विषय है “पुराने त्वचा रोगों का मानसिक स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता पर प्रभाव”। यह अध्ययन इस तथ्य को उजागर करता है कि त्वचा के पुराने रोग केवल शारीरिक तकलीफ ही नहीं देते, बल्कि मानसिक रूप से भी गहरा असर छोड़ते हैं।

क्या है रिसर्च

अध्ययन के अनुसार, सोरायसिस, एटॉपिक डर्मेटाइटिस, विटिलिगो जैसे त्वचा रोगों से ग्रस्त युवाओं और वयस्कों में अवसाद 16 से 30% तक, चिंता 30% तक, और कई मामलों में आत्महत्या की प्रवृत्ति तक देखी गई है। विशेष रूप से किशोरों में मुँहासों के कारण और वयस्कों में सोरायसिस के चलते यह प्रवृत्ति अधिक पाई जाती है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि त्वचा रोगों से जुड़ी सामाजिक असहजता और दूसरों की प्रतिक्रिया के डर से लोग सामाजिक गतिविधियों से दूरी बनाने लगते हैं, जिससे उनका आत्मविश्वास और जीवन की गुणवत्ता दोनों प्रभावित होते हैं। यह सामाजिक अलगाव धीरे-धीरे मानसिक तनाव, अनिद्रा और आत्मग्लानि की ओर धकेल सकता है।

शरीर और दिमाग का बैलेंस

शोध दल ने यह भी सुझाव दिया है कि ऐसे मामलों में केवल दवाओं से नहीं, बल्कि एक एकीकृत उपचार दृष्टिकोण (Multidisciplinary Approach) अपनाने की आवश्यकता है। इसमें त्वचा विशेषज्ञों, फिजिशियन और मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों को मिलकर मरीज का इलाज करना चाहिए, ताकि शारीरिक और मानसिक दोनों पहलुओं को संतुलित तरीके से संभाला जा सके।

अंत में अध्ययन यह संकेत देता है कि भविष्य में ऐसे दीर्घकालिक अनुसंधानों की आवश्यकता है, जो त्वचा रोगों के साथ-साथ उनके मनोवैज्ञानिक परिणामों को भी गहराई से समझ सकें। यह शोध न केवल मेडिकल साइंस बल्कि समाज को भी यह सोचने पर मजबूर करता है कि त्वचा के घाव तो दिखते हैं, पर मन के घाव अक्सर अनदेखे रह जाते हैं।

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