MVA Alliance: महाराष्ट्र की राजनीति इन दिनों लगातार हलचल और उथल-पुथल के बीच है। जैसे-जैसे नगर निगम चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, राजनीतिक गलियारों में अटकलें तेज हो गई हैं कि क्या शरद पवार और उनके भतीजे अजित पवार अलग-अलग धड़ों में बंटे NCP फिर से एक हो जाएगी? महाराष्ट्र विकास अघाड़ी (MVA) के सहयोगी दलों में खींचतान साफ दिखाई दे रही है। बीएमसी चुनावों में कांग्रेस अलग लड़ने का ऐलान कर चुकी है, जबकि ठाकरे बंधु राजनीतिक मोर्चे पर एकजुट दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में भाजपा ने अपने पुराने साथी एनसीपी के बजाय दोस्ताना मुकाबला करने का मन बना लिया है।
राजनीति के चाणक्य
राज्य की राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले शरद पवार की रणनीति को समझना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है। पिछले ढाई साल से अजित पवार और शरद पवार के बीच दूरी रही, लेकिन अब अचानक दोनों धड़े फिर से नगर निगम चुनावों के लिए साथ दिखाई दे रहे हैं। अजित पवार की अगुवाई वाली NCP और शरद पवार की NCP (SP) पुणे और पिंपरी-चिंचवाड़ नगर निगम चुनावों के लिए गठबंधन में आ गए हैं। ये दोनों क्षेत्र पारंपरिक रूप से पवार परिवार का गढ़ माने जाते हैं।
हालांकि दोनों पक्ष यह स्पष्ट कर रहे हैं कि यह गठबंधन केवल अगले महीने होने वाले नगर निगम चुनावों तक सीमित है और भविष्य में इसे आगे बढ़ाने का कोई ठोस योजना नहीं है। बावजूद इसके, शरद पवार और उनकी बेटी सुप्रिया सुले के हालिया राजनीतिक कार्यक्रम और बयान बताते हैं कि पवार परिवार NDA से दूरी कम कर सकता है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि पहला कदम एनसीपी के मर्जर की दिशा में हो सकता है।
क्यों हुआ यह गठबंधन?
नगर निगम चुनावों में भाजपा ने शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट) के साथ गठबंधन कर लिया है, जबकि कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ने का निर्णय लिया है। ऐसे समय में NCP के दो धड़ों के लिए यह गठबंधन रणनीतिक फैसला बन गया। पुणे और पिंपरी-चिंचवाड़ जैसे पवार परिवार के गढ़ों में भाजपा की बढ़ती पकड़ को रोकने के लिए यह कदम आवश्यक था।
नागरिक निकाय चुनावों में यह गठबंधन केवल सीटों पर राजनीतिक दबदबा बनाने के लिए है। पुणे में NCP 125 सीटों पर और NCP (SP) 40 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। दोनों पक्षों के लिए यह गठबंधन केवल स्थानीय चुनावों तक सीमित, लेकिन प्रभावशाली रणनीति साबित हो सकती है।
पिछले स्थानीय चुनावों का असर
दिसंबर 2025 में महाराष्ट्र में हुए स्थानीय निकाय चुनावों ने राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया। कुल 288 निकायों में से महायुति ने 211 सीटें जीतकर अपनी मजबूती दिखाई, जबकि MVA केवल 46 सीटों पर सिमट गई। यह आंकड़ा स्पष्ट करता है कि एमवीए की स्थिति कमजोर है और विपक्षी दलों की रणनीति में सुधार की आवश्यकता है।
शरद पवार के धड़े के लिए यह झटका था। कई कार्यकर्ताओं ने अब अजित पवार गुट के साथ सहयोग की मांग शुरू कर दी। MVA में भी कमजोर प्रदर्शन हुआ, क्योंकि कांग्रेस और उद्धव ठाकरे की शिवसेना ने संतोषजनक परिणाम नहीं दिखाए। ऐसे में अजित पवार का कदम पुणे और पिंपरी-चिंचवाड़ में गठबंधन करना रणनीतिक रूप से समझा गया।
गठबंधन की रणनीति और पवार परिवार का मकसद
इस गठबंधन का मूल उद्देश्य भाजपा को शहरों में चुनौती देना है। पवार परिवार की राजनीतिक पकड़ मजबूत करना और स्थानीय कार्यकर्ताओं का उत्साह बनाए रखना इसका मुख्य लक्ष्य है। अजित पवार ने इसे “परिवार की मजबूती” बताया है। हालांकि, दोनों पक्ष अपने चुनाव चिन्ह पर ही चुनाव लड़ेंगे, यानी कोई एकीकृत चिन्ह नहीं होगा।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस गठबंधन के पीछे भविष्य की मर्जर की चर्चाएं भी हैं। संभावना है कि मर्जर के बाद अजित पवार राज्य स्तर पर नेतृत्व संभालेंगे, जबकि सुप्रिया सुले केंद्र और दिल्ली में पार्टी की कमान संभालेंगी। यह फॉर्मूला शरद पवार के रिटायरमेंट के बाद लागू किया जा सकता है।
चुनौतियां और संभावनाएं
हालांकि गठबंधन को लेकर कई चुनौतियां हैं। कई नेता अजित पवार के नेतृत्व में काम नहीं करना चाहते, क्योंकि उन्होंने पहले भाजपा के साथ तालमेल बिठाया था। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम भाजपा की रणनीति का भी हिस्सा हो सकता है। इसके अलावा, गठबंधन के बाद कार्यकर्ताओं और नेताओं में संतुलन बनाए रखना आसान नहीं होगा। शरद पवार के गुट के कुछ विधायक असंतुष्ट हैं। भविष्य में मर्जर हो या न हो, यह राजनीतिक समीकरण पर गहरा असर डालेगा।
भविष्य की दिशा
अगर पुणे और पिंपरी-चिंचवाड़ में दोनों NCP धड़े अच्छा प्रदर्शन करते हैं, तो जनवरी 2026 के ज़िला परिषद और पंचायत समिति चुनावों में भी इसी तरह के गठबंधन की मांग उठ सकती है। यह गठबंधन महाराष्ट्र की राजनीति के परिदृश्य को बदल सकता है। MVA पहले ही कमजोर है, और कांग्रेस संघर्ष कर रही है। पवार परिवार का पुनर्मिलन संभवत: भाजपा की बढ़ती ताकत को चुनौती देने का एक पहला बड़ा कदम हो सकता है। अगले महीनों में नतीजे और राजनीतिक फॉर्मूले स्पष्ट होंगे। पर यह तय है कि महाराष्ट्र की राजनीति में पवार परिवार की रणनीति अब किसी के लिए भी हल्के में नहीं ली जा सकती।
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