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राजनीति में ‘लेफ़्ट विंग’ और ‘राइट विंग’ क्या हैं ? कबसे हुई शुरुआत…

by | Oct 25, 2025 | State

Left vs Right: लेफ्ट और राइट इन दोनों विचारधाराओं का जन्म कैसे हुआ ? दोनों में क्या समानताएं हैं ? क्या अंतर हैं ? क्या सिर्फ भारत में ये सिस्टम है या पूरी दुनिया में ऐसा ही है। “लेफ्ट” और “राइट” शब्द सुनते ही दो अलग-अलग दिशाओं का बोध होता है — एक तरफ सामाजिक समानता की पुकार, तो दूसरी तरफ परंपरा और राष्ट्र की सुरक्षा की बात। मगर असल में ये विभाजन सिर्फ दिशा का नहीं, बल्कि विचार का, दर्शन का और व्यवस्था की समझ का है।

लेफ्ट और राइट की नींव कैसे पड़ी ?


1789 में फ्रांसीसी क्रांति (French Revolution) के दौरान जब संसद में राजा का समर्थन करने वाले लोग स्पीकर की दाईं ओर बैठे और जनसत्ता, समानता व क्रांति की मांग करने वाले बाईं ओर — तब से ये शब्द राजनीति की भाषा में दर्ज हो गए।

Left (बाएँ): समानता, सामाजिक न्याय, जनता की भागीदारी और राज्य के नियंत्रण में विश्वास रखने वाली विचारधारा।
Right (दाएँ): परंपरा, राष्ट्रवाद, धर्म, पूँजी और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्राथमिकता देने वाली विचारधारा।

लेफ्ट की सोच का मूल वाक्य है: “हर इंसान को बराबरी का हक़ मिलना चाहिए, चाहे वो किसी भी वर्ग या जाति का हो।”
इनकी राजनीति आम तौर पर मज़दूरों, किसानों, गरीबों और वंचित वर्गों की बात करती है।
लेफ्ट राज्य से अपेक्षा रखता है कि सरकार education, healthcare, employment और wealth distribution को नियंत्रित करे ताकि सामाजिक असमानता घट सके।
सोवियत रूस, चीन, क्यूबा जैसी व्यवस्थाएँ इसी सोच से प्रेरित हुईं।

राइट का दर्शन कहता है: “राज्य की शक्ति सीमित रहनी चाहिए, पर राष्ट्र का गौरव सर्वोपरि।”
ये व्यक्तिगत स्वतंत्रता, धार्मिक आस्था, पूँजी और राष्ट्रीय अस्मिता को प्राथमिकता देते हैं।
इनके लिए राष्ट्र सिर्फ एक राजनीतिक इकाई नहीं, बल्कि सांस्कृतिक जीव है — जिसके अस्तित्व में धर्म, इतिहास और गौरव जुड़ा है।
राइट इस बात का पक्षधर है कि बाज़ार और व्यक्ति, दोनों को आज़ादी हो ताकि राष्ट्र मजबूत बने।
लेकिन जब यही विचार अंधराष्ट्रवाद में बदलता है, तो दूसरों की पहचान के प्रति असहिष्णुता बढ़ जाती है।

भारत में लेफ़्ट और राइट विंग की क्या स्थिति है ?


कांग्रेस पारंपरिक रूप से लेफ्ट ऑफ सेंटर (सामाजिक लोकतंत्रवादी) रही है, जबकि भारतीय जनता पार्टी (BJP) राइट ऑफ सेंटर (राष्ट्रवादी व पूँजी समर्थक) विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती है।
कांग्रेस का झुकाव हमेशा समाज कल्याण, आरक्षण, समानता, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय की ओर रहा।
वहीं, बीजेपी की जड़ें राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक गौरव, आत्मनिर्भरता और आर्थिक उदारीकरण में हैं।

कांग्रेस कहती है — “गरीबी हटाओ।”
बीजेपी कहती है — “गरीबी से निकलने की शक्ति खुद में जगाओ।”

कांग्रेस धर्म को व्यक्तिगत मामला मानती है,
बीजेपी उसे सांस्कृतिक पहचान के रूप में पेश करती है।

लेफ्ट की राजनीति में करुणा है, संवेदना है, इंसान के दर्द को पहचानने की कला है।
लेकिन इसकी सबसे बड़ी विफलता यह है कि जिस समानता की लड़ाई यह लड़ता है, वही समानता अक्सर कागज़ों में सिमटकर रह जाती है।
दूसरी ओर राइट खुद को राष्ट्र का प्रहरी मानता है
धर्म, गौरव और राष्ट्र के नाम पर समाज में डर, असहमति और विभाजन की रेखाएँ खींची जाने लगती हैं।

लेफ़्ट और राइट में कौन सही कौन ग़लत ?


हर देश की राजनीति लेफ्ट और राइट के बीच झूलती रहती है। कभी समाज को सुधारने के लिए लेफ्ट की जरूरत पड़ती है, तो कभी राष्ट्र को बचाने के लिए राइट की। पर असली राजनीति न तो बाएँ है, न दाएँ — वो है “संतुलन” — जहाँ समानता और स्वतंत्रता, दोनों एक साथ चलें।
“राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि बायाँ हाथ बराबरी चाहता है, और दायाँ हाथ शक्ति — जबकि असली ताकत तब आती है, जब दोनों हाथ साथ मिलकर काम करते हैं।”

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