Delhi Loha Pul Story: दिल्ली की पहचान रहे पुराने लोहा पुल का 150 साल पुराना इतिहास अब अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच रहा है। यमुना नदी पर बना यह पुल जल्द ही बंद किया जा सकता है, क्योंकि इसकी जगह अब एक आधुनिक और मजबूत नया पुल तैयार हो चुका है, जो राजधानी की रेल कनेक्टिविटी को नई दिशा देगा।
पुराने पुल से नए युग की शुरुआत
दिल्ली के इस ऐतिहासिक पुल ने लंबे समय तक पुरानी दिल्ली और पूर्वी दिल्ली को जोड़ने का काम किया। लेकिन अब रेलवे ने इसके विकल्प के रूप में नया पुल (पुल नंबर 249) तैयार कर लिया है, जिसे मुख्य नेटवर्क से जोड़ दिया गया है। हाल ही में इस नए पुल पर एक ईएमयू ट्रेन से ट्रायल रन किया गया, जो सफल रहा। अब आगे और भी ट्रायल किए जाएंगे ताकि सुरक्षा और तकनीकी सिस्टम की पूरी तरह जांच हो सके।
ट्रायल के बाद जल्द होगा उद्घाटन
रेलवे अधिकारियों के अनुसार, दिसंबर में रेलवे सुरक्षा आयुक्त ने नए पुल का निरीक्षण किया था। इसके बाद अब परीक्षण प्रक्रिया शुरू की गई है। फिलहाल पुराने पुल से ट्रेनों की आवाजाही जारी है, लेकिन आने वाले समय में इसका उपयोग धीरे-धीरे बंद कर दिया जाएगा। उम्मीद है कि जल्द ही इसका उद्घाटन बड़े स्तर पर किया जाएगा, जिसे प्रधानमंत्री द्वारा किए जाने की योजना है।

क्यों खास था पुराना लोहा पुल?
1866 में बना यह पुल न सिर्फ एक इंजीनियरिंग का नमूना था, बल्कि दिल्ली की ऐतिहासिक पहचान भी था।
• करीब 850 मीटर लंबा यह डबल-डेकर पुल
• ऊपरी हिस्से पर रेल और नीचे सड़क मार्ग
• 1933 में इसे डबल लाइन में बदला गया
• निर्माण में करीब 3 साल लगे
• इसे कोलकाता की कंपनी ने तैयार किया था
• पुल के लोहे के ढांचे इंग्लैंड से लाए गए थे
इस पुल ने कई पीढ़ियों को दिल्ली से जोड़ने का काम किया और समय के साथ एक महत्वपूर्ण ट्रांजिट पॉइंट बन गया।
बाढ़ और पुल का गहरा रिश्ता
यह पुल सिर्फ यातायात का माध्यम नहीं, बल्कि यमुना की बाढ़ का गवाह भी रहा है। 1978 की भीषण बाढ़ में यमुना का पानी इस पुल के ऊपर से बहने लगा था। यह घटना दिल्ली में बाढ़ की गंभीरता को मापने का एक मानक बन गई। कई बार जब नदी का जलस्तर बढ़ा, तो पुल को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा।
नया पुल: आधुनिक तकनीक का उदाहरण
पुराने पुल की जगह बना नया पुल अत्याधुनिक तकनीक से लैस है।
• लगभग 227 करोड़ रुपये की लागत
• 865 मीटर लंबा डबल लाइन पुल
• 25 टन एक्सल लोड क्षमता
• अधिक ऊंचाई और मजबूत संरचना
• तेज गति और भारी ट्रेनों के लिए उपयुक्त
यह पुल अब विशेष रूप से पूर्वांचल, बिहार और उत्तर प्रदेश जाने वाली ट्रेनों के लिए बड़ा राहत साबित होगा।
क्यों जरूरी था नया पुल?
पुराना पुल समय के साथ कमजोर हो चुका था और कई बार सुरक्षा को लेकर सवाल उठे।
• कम ऊंचाई के कारण बाढ़ में बार-बार बंद करना पड़ता था
• सड़क और रेल दोनों का संयुक्त उपयोग, जिससे दबाव बढ़ता था
• जर्जर संरचना और बढ़ती ट्रैफिक जरूरतें
इन्हीं कारणों से नए पुल की आवश्यकता महसूस हुई।
20+ साल की मेहनत का नतीजा
इस नए पुल की योजना 1997-98 में बनी थी, लेकिन निर्माण कार्य 2003 में शुरू हुआ। बीच-बीच में कई बार काम रुका, और आखिरकार 2016 में इसे तेजी से पूरा किया गया। करीब 22 साल की लंबी प्रक्रिया के बाद यह प्रोजेक्ट अब पूरी तरह तैयार है।
इतिहास बनकर रह जाएगा पुराना पुल
एक समय दिल्ली की लाइफलाइन रहा यह पुल अब इतिहास के पन्नों में दर्ज होने की ओर बढ़ रहा है। आने वाले समय में यह सिर्फ एक हेरिटेज और यादों का प्रतीक बनकर रह जाएगा।
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