Bihar Election 2025 : बिहार में चुनावी बिगुल बज चुका है और नामांकन प्रक्रिया शुरू होते ही उन दावेदारों की धड़कनें तेज हो गई हैं जो अब तक एक पार्टी से टिकट कटने पर दूसरी पार्टी का दरवाजा खटखटाते रहे थे। लेकिन इस बार हालात बिल्कुल अलग हैं। न तो ‘जुगाड़’ काम आएगा, न ही दल बदलने के लिए वक्त मिलेगा।
पहले चरण का नामांकन शुरू हो गया है, जबकि अब तक गठबंधनों के बीच सीट बंटवारे पर पूरी तस्वीर साफ नहीं हुई है। ऐसे में टिकट के दावेदार बेहद तनाव में हैं। कई नेता टिकट की उम्मीद में पटना और दिल्ली दौड़ लगा चुके हैं, लेकिन शीर्ष नेतृत्व ने साफ संदेश दे दिया है। “नाम सूची में है, क्षेत्र में रहो। अगर यही घूमते दिखे तो टिकट रद्द समझो।”
SIR ने बिगाड़ा जुगाड़ का खेल
इस बार उम्मीदवारों की सबसे बड़ी चुनौती बनी है विशेष मतदाता पुनरीक्षण (SIR)। जहां पहले चुनावी घोषणा के बाद दावेदारों के पास टिकट के लिए सेटिंग और दूसरी पार्टी से संपर्क का समय होता था, वही इस बार पूरा शेड्यूल ही बेहद टाइट है।
2010, 2015 और 2020 के आंकड़े बताते हैं कि तब नामांकन के लिए दावेदारों को कम से कम एक हफ्ते से लेकर 20 दिन तक का समय मिला करता था। लेकिन इस बार 6 अक्टूबर को चुनाव की घोषणा हुई और महज चार दिन बाद, यानी 10 अक्टूबर से नामांकन शुरू हो गया। दूसरा चरण भी तीन दिन बाद, 13 अक्टूबर से शुरू हो जाएगा।
राजनीतिक दलों में नहीं मचेगी भगदड़
राजनीतिक विश्लेषक डॉ. विवेक हिंद (तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय) का कहना है कि इस बार SIR के चलते राजनीतिक गतिविधियों की टाइमिंग पूरी तरह बदल गई है। आम तौर पर जून-जुलाई से शुरू होने वाली सरगर्मी, इस बार SIR के कारण जुलाई में ही दूसरे मोर्चों पर उलझ गई।
अब जब नामांकन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, तो दल बदल का समय ही नहीं बचा है। इसीलिए इस बार बड़ी पार्टियों में भगदड़ के आसार कम हैं। हां, कुछ असंतुष्ट उम्मीदवार निर्दलीय रूप में उतर सकते हैं, लेकिन इसमें भी जोखिम हैं क्योंकि इससे भविष्य की राजनीतिक हैसियत पर असर पड़ता है।
निर्दलीयों का गिरता प्रदर्शन
पिछले चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि निर्दलीय उम्मीदवारों की जीत लगातार घट रही है। 2010 में 6, 2015 में 4 और 2020 में मात्र 2 निर्दलीय उम्मीदवार विधानसभा पहुंच सके। ऐसे में दावेदारों के सामने या तो अपनी पार्टी में बने रहने या फिर चुनावी दौड़ से बाहर होने का ही विकल्प बचेगा।
SIR बनी पार्टी नेतृत्व के लिए राहत
कहलगांव के एक बड़े राष्ट्रीय दल के नेता बताते हैं कि SIR ने पार्टी नेतृत्व के सिरदर्द को काफी हद तक कम कर दिया है। अब हर दिन पटना-दिल्ली में भीड़ नहीं लग रही और जो टिकट के लिए आ भी रहे हैं, उन्हें सीधे क्षेत्र में जाकर वोटर जोड़ने की सलाह दी जा रही है।
एक किस्सा सुनाते हुए वह बताते हैं कि एक नेता टिकट के लिए पटना पहुंचा तो उसे डांट पड़ गई”अभी सब SIR में व्यस्त हैं और आप टिकट मांगने आ गए? पहले जाकर देखिए, कितने वोटर जोड़े, नामों की सूची लाईए, तभी अगली बार टिकट की बात करिए।”
लोजपा और AIMIM जैसे दलों ने पिछली बार दिए थे मौके
2020 के विधानसभा चुनाव में लोजपा, वीआईपी और ‘हम’ जैसी पार्टियों ने कई नए चेहरों को मौका दिया था। लोजपा ने 135 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, जिनमें से कई भाजपा और जदयू के असंतुष्ट दावेदार थे। सीमांचल में AIMIM और अन्य दलों ने भी वैकेंसी खोली थी।
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बिहार विधानसभा चुनाव 2025 (Bihar Election 2025) की सियासी तस्वीर तेजी से बदल रही है। इस बार न तो टिकट के लिए बहुत समय है, न ही दूसरी पार्टियों में ‘एडजस्टमेंट’ की गुंजाइश। जो नेता अब भी भ्रम में हैं, उन्हें जल्द ही हकीकत का सामना करना होगा। क्योंकि अब राजनीति में भी समय और तैयारी ही सबसे बड़ा जुगाड़ है।

