Bihar Chura Politics: मकर संक्रांति के मौके पर बिहार की राजनीति में दही-चूड़ा सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि सियासी ताकत का पैमाना बनता दिखा। इसी कड़ी में बिहार कांग्रेस द्वारा पटना स्थित सदाकत आश्रम में आयोजित दही-चूड़ा भोज उस वक्त चर्चा में आ गया, जब पार्टी के एक भी विधायक इसमें शामिल नहीं हुआ।
हालांकि भोज में बिहार कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम, संगठन के वरिष्ठ नेता और पदाधिकारी मौजूद रहे, लेकिन विधानसभा में पार्टी का प्रतिनिधित्व करने वाले सभी छह विधायक पूरी तरह नदारद रहे। इस गैर-हाजिरी ने राजनीतिक गलियारों में सवालों और कयासों की झड़ी लगा दी है।
विधायकों की दूरी पर कांग्रेस नेतृत्व खामोश
कार्यक्रम के दौरान जब कांग्रेस अध्यक्ष राजेश राम से विधायकों की गैर-मौजूदगी पर सवाल किया गया, तो उन्होंने इसे टालते हुए कहा कि मकर संक्रांति के शुभ अवसर पर पार्टी नेतृत्व राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे को यह संदेश देना था कि बिहार में संगठन मजबूत है। हालांकि जवाब से असंतोष खत्म नहीं हुआ और विधायकों की अनुपस्थिति को लेकर अंदरूनी खींचतान की अटकलें तेज हो गईं।
JDU का तंज: ‘दही फट गया, चूड़ा बासी हो गया’
कांग्रेस के दही-चूड़ा भोज पर जनता दल (यूनाइटेड) ने करारा हमला बोला है। जेडीयू ने इसे कांग्रेस में आंतरिक कलह और संभावित टूट का संकेत बताया।
जेडीयू नेताओं ने तंज कसते हुए कहा कि “चूड़ा बासी हो गया और दही फट गया। खरमास के बाद कांग्रेस में बड़ी टूट तय है।” इस बयान के बाद सियासी बयानबाज़ी और तेज हो गई है।
दही-चूड़ा बना राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन
उधर, बिहार में दही-चूड़ा भोज को लेकर सियासी सरगर्मी चरम पर है। डिप्टी सीएम विजय कुमार सिन्हा 13 जनवरी को दही-चूड़ा भोज आयोजित कर रहे हैं, जिसमें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और एनडीए के तमाम मंत्री शामिल होंगे। इसके अलावा, तेज प्रताप यादव और चिराग पासवान भी अलग-अलग तारीखों पर दही-चूड़ा भोज के जरिए शक्ति प्रदर्शन की तैयारी में हैं।
पार्टी की एकजुटता पर बड़ा सवाल
कांग्रेस के दही-चूड़ा भोज में विधायकों की गैर-हाजिरी ने पार्टी की एकजुटता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। अब देखना यह होगा कि यह सिर्फ संयोग था या बिहार कांग्रेस में किसी बड़े सियासी बदलाव का संकेत। बिहार की राजनीति में फिलहाल एक ही सवाल गूंज रहा है, क्या दही-चूड़ा ने कांग्रेस की अंदरूनी दरार को उजागर कर दिया है?

