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बिहार विधानसभा चुनाव में मुस्लिम उम्मीदवारों पर सभी दलों ने खींची लगाम, किसने दिया कितना प्रतिनिधित्व? जानिए पूरी खबर

by | Oct 25, 2025 | बिहार

Bihar Election: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में इस बार मुस्लिम उम्मीदवारों को लेकर लगभग सभी राजनीतिक दलों ने बेहद सतर्क रुख अपनाया है। 17.7% मुस्लिम आबादी वाले राज्य में इस बार टिकट बंटवारे में मुसलमानों की भागीदारी पहले के मुकाबले काफी कम दिखाई दी है। 2020 के चुनावों से तुलना करें तो 2025 में लगभग हर पार्टी ने मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देने में ‘कंजूसी’ बरती है।

AIMIM ने जताया भरोसा

सबसे पहले बात करते हैं AIMIM की असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ने 25 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं, जिनमें से 23 मुस्लिम हैं। यानी AIMIM ने हमेशा की तरह अपने कोर वोट बैंक पर ही भरोसा जताया है। वहीं, जन सुराज पार्टी ने 243 में से 34 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया है, जो लगभग जनसंख्या अनुपात के बराबर है।

कांग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवार

कांग्रेस, जो 61 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, उसने केवल 10 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं। यह लगभग 18% के आसपास है। राजद, जो MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण की राजनीति के लिए जानी जाती है, उसने 141 में से सिर्फ 19 मुस्लिम प्रत्याशी उतारे हैं। जबकि, जनसंख्या के अनुपात से उसे कम से कम 25 मुस्लिम उम्मीदवार देने चाहिए थे।

JDU के मुस्लिम फेस

नीतीश कुमार की JDU ने मात्र 4 मुस्लिम चेहरों को टिकट दिया है। वहीं, चिराग पासवान की LJP (रामविलास) ने 29 सीटों में से सिर्फ 1 मुस्लिम प्रत्याशी उतारा है। उपेंद्र कुशवाहा की RLM और जीतनराम मांझी की HAM ने एक भी मुसलमान को टिकट नहीं दिया। पूरा NDA मिलाकर देखा जाए तो सिर्फ 5 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में हैं, जबकि बीजेपी ने हमेशा की तरह एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारा है।

मुस्लिमों को राजनीतिक हिस्सेदारी में कमी

जन सुराज प्रवक्ता सैयद मसीह उद्दीन ने कहा कि, “हमारी पार्टी ने आबादी के अनुपात में मुसलमानों को टिकट देकर न्याय किया है।” वहीं, JDU प्रवक्ता अभिषेक कुमार ने कहा कि नीतीश कुमार ने उम्मीदवार चयन में योग्यता को प्राथमिकता दी है, धर्म को नहीं। ऐतिहासिक तौर पर देखें तो 1985 में सबसे अधिक 34 मुस्लिम विधायक चुने गए थे, जब बिहार की कुल सीटें 324 थीं। 2020 में यह आंकड़ा घटकर सिर्फ 19 पर आ गया। यानी आबादी के हिसाब से मुस्लिमों को अब भी राजनीतिक हिस्सेदारी नहीं मिल रही।

बीजेपी को हराने के उद्देश्य

विश्लेषकों का मानना है कि बिहार में मुस्लिम वोटर अब तक बीजेपी को हराने के उद्देश्य से एकजुट होकर वोट डालते आए हैं, लेकिन इससे उन्हें राजनीतिक प्रतिनिधित्व का लाभ नहीं मिल पाया। अब देखना यह है कि 14 नवंबर को आने वाले नतीजों में यह ‘गुमनाम वोट बैंक’ किसके पक्ष में फैसला करता है — क्या इतिहास दोहराया जाएगा या इस बार कुछ नया होगा?

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