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35 साल बाद फिर चला टी.एन. शेषन का ‘गुप्त आदेश’, अब ऐसे होगी बुर्का-घूंघट में आने वाली वोटर्स की पहचान

by | Oct 16, 2025 | बिहार

Bihar Election: बिहार विधानसभा चुनाव और देश के सात राज्यों में होने वाले उपचुनावों में इस बार महिला वोटर्स की पहचान सुनिश्चित करने के लिए चुनाव आयोग ने 35 साल पुराना नियम फिर से लागू कर दिया है। यह वही आदेश है जो देश के कड़क और ईमानदार मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन ने साल 1994 में जारी किया था। अब एक बार फिर वही “शेषन वाला नियम” महिलाओं की पहचान तय करेगा वो भी उनकी गरिमा और निजता का सम्मान करते हुए।

क्या है “शेषन वाला नियम” ?

चुनाव आयोग ने साफ निर्देश दिए हैं कि मतदान केंद्रों पर बुर्का, नक़ाब, हिजाब या घूंघट में आने वाली महिलाओं की पहचान उनके चेहरे को सार्वजनिक रूप से उजागर किए बिना की जाएगी। इसके लिए हर मतदान केंद्र पर महिला कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई जाएगी और उनके लिए अलग कतारें और कमरे बनाए जाएंगे, ताकि पहचान सत्यापन की प्रक्रिया शालीनता और सुरक्षा के माहौल में पूरी हो सके।

संविधान के अनुच्छेद 326 पर आधारित

टी.एन. शेषन का आदेश भारत के संविधान के अनुच्छेद 326 पर आधारित है, जो यह सुनिश्चित करता है कि लोकसभा और विधान सभा के चुनाव “सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार” के सिद्धांत पर होंगे। यानी, हर वह भारतीय नागरिक जो 18 वर्ष या उससे अधिक आयु का है और किसी कारणवश निरर्हित नहीं है, उसे मतदान का अधिकार प्राप्त है। वहीं, अनुच्छेद 325 यह भी गारंटी देता है कि धर्म, जाति, लिंग या मूलवंश के आधार पर किसी को भी मतदाता सूची से वंचित नहीं किया जा सकता।

पर्दानशीन महिलाओं के वोट डालने में दिक्कतें

शेषन ने 1994 में यह आदेश इसलिए दिया था क्योंकि कुछ इलाकों में पर्दानशीन महिलाओं के वोट डालने में दिक्कतें आती थीं। पहचान के नाम पर सार्वजनिक रूप से चेहरा दिखाने की मजबूरी के कारण कई महिलाएं मतदान केंद्र तक नहीं पहुंच पाती थीं। अब आयोग ने फिर स्पष्ट किया है कि किसी भी महिला की पहचान महिला अधिकारी ही सत्यापित करेंगी और उनकी प्राइवेसी का पूरा ध्यान रखा जाएगा।

महिला मतदाताओं के सम्मान की रक्षा

चुनाव आयोग का यह फैसला न सिर्फ महिला मतदाताओं के सम्मान की रक्षा करता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि देश की हर महिला चाहे वह बुर्के में हो या घूंघट में लोकतंत्र के इस सबसे बड़े पर्व में बराबरी से हिस्सा ले सके। अब देखना यह होगा कि क्या “शेषन वाला हुक्म” इस बार बिहार और बाकी राज्यों में महिला वोटिंग प्रतिशत बढ़ाने में कामयाब होता है या नहीं। लोकतंत्र के इस नए अध्याय में पर्दे के पीछे से निकलकर महिलाओं की मजबूत आवाज गूंजने को तैयार है।

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