Holika Dahan: होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। फाल्गुन पूर्णिमा की रात को अग्नि प्रज्वलित कर लोग पूजा-अर्चना करते हैं और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस अग्नि में नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है। हालांकि आस्था के साथ कुछ सावधानियां भी जरूरी होती हैं, क्योंकि हर व्यक्ति के लिए जलती अग्नि के पास रहना उपयुक्त नहीं होता।
छोटे बच्चे
छोटे बच्चों की त्वचा और आंखें संवेदनशील होती हैं। तेज धुआं, चिंगारी और भीड़भाड़ उनके लिए असुविधाजनक हो सकती है। यदि बच्चों को लेकर जाएं तो सुरक्षित दूरी बनाए रखें और अधिक समय तक धुएं में न रुकें।
गर्भवती महिलाएं
गर्भावस्था के दौरान तेज धुआं या भीड़ में अधिक देर तक खड़े रहना असहजता पैदा कर सकता है। इसलिए गर्भवती महिलाओं को दूर से दर्शन करना या घर पर ही पूजा करना अधिक सुरक्षित माना जाता है।
श्वसन संबंधी रोग से पीड़ित लोग
जिन लोगों को अस्थमा, एलर्जी या सांस से जुड़ी समस्या है, उन्हें जलती होलिका के धुएं से परेशानी हो सकती है। ऐसे लोग मास्क का उपयोग करें और आग से दूरी बनाए रखें।
बुजुर्ग व्यक्ति
उम्रदराज लोगों के लिए लंबे समय तक खड़े रहना या भीड़ में रहना थकावट का कारण बन सकता है। उन्हें बैठने की व्यवस्था और सुरक्षित स्थान चुनना चाहिए।
मानसिक रूप से असहज या भयभीत व्यक्ति
कुछ लोग तेज आग और शोर से घबराहट महसूस करते हैं। ऐसे में खुद को असहज स्थिति में डालने के बजाय शांत वातावरण में पूजा करना बेहतर होता है।
आस्था के साथ सावधानी क्यों जरूरी है
होलिका दहन का मुख्य संदेश सकारात्मकता और बुराई के अंत का है। इस अवसर पर अग्नि की परिक्रमा, पूजा और प्रार्थना की जाती है, लेकिन सुरक्षा नियमों का पालन करना भी उतना ही आवश्यक है। सूती वस्त्र पहनना, आग से दूरी रखना और बच्चों पर नजर बनाए रखना जरूरी है। धार्मिक परंपराएं हमें एकजुट करती हैं, लेकिन विवेक और सावधानी हमें सुरक्षित रखते हैं। इसलिए होलिका दहन में शामिल हों, पर अपनी और अपनों की सेहत को प्राथमिकता जरूर दें।
ये भी पढ़ें: Why is Holi celebrated: क्यों मनाई जाती है होली? जानिए धार्मिक परंपरा और महत्व

