Holika Dahan 2026 Mahakal Ujjain: होलिका दहन फाल्गुन पूर्णिमा की रात को किया जाता है। यह बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। मध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग में होलिका दहन की एक विशेष परंपरा है। मान्यता है कि यहां सबसे पहले भगवान महाकाल के दरबार में विधि-विधान से अग्नि प्रज्वलित की जाती है, उसके बाद ही शहर में अन्य स्थानों पर होलिका दहन होता है।
क्या है इसके पीछे धार्मिक मान्यता
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार उज्जैन को प्राचीन काल से ही धार्मिक और आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र माना जाता है। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक महाकालेश्वर यहां विराजमान हैं। ऐसी मान्यता है कि महाकाल की अनुमति और आशीर्वाद के बिना कोई भी शुभ कार्य पूर्ण नहीं माना जाता। इसलिए होलिका दहन की अग्नि पहले मंदिर परिसर में प्रज्वलित कर भगवान शिव से समस्त नगर की सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।
भस्म आरती और होली का संबंध
महाकाल मंदिर अपनी प्रसिद्ध भस्म आरती के लिए जाना जाता है। होलिका दहन के अवसर पर भी विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। भक्त मानते हैं कि महाकाल की कृपा से नकारात्मक शक्तियां नष्ट होती हैं और जीवन में नई ऊर्जा का संचार होता है।
पौराणिक संदर्भ
होलिका दहन की कथा प्रह्लाद और हिरण्यकश्यप से जुड़ी है, जिसमें अग्नि में बैठने के बाद भी भक्त प्रह्लाद सुरक्षित रहे। यह कथा आस्था, भक्ति और सत्य की शक्ति को दर्शाती है। महाकाल के दरबार में इस अग्नि को प्रज्वलित करना उसी विजय का प्रतीक माना जाता है।
क्यों खास है उज्जैन की होली
महाकाल मंदिर में विशेष पूजा, पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन, आध्यात्मिक वातावरण, हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति। होलिका दहन के अवसर पर महाकाल के दरबार में सबसे पहले अग्नि प्रज्वलित करने की परंपरा उज्जैन की धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती है। यह परंपरा बताती है कि हर शुभ कार्य से पहले ईश्वर का स्मरण और आशीर्वाद कितना महत्वपूर्ण माना जाता है। महाकाल की नगरी में मनाई जाने वाली यह होली भक्ति, आस्था और परंपरा का अद्भुत संगम है।
ये भी पढ़ें: रंग खेलते हैं, पर नहीं जलती होलिका; यूपी के इस गांव की है अनोखी परंपरा

