Dwijapriya Sankashti Chaturthi 2026: सनातन धर्म में चतुर्थी तिथि का विशेष महत्व माना जाता है। हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है, जिसे विघ्नहर्ता भगवान गणेश को समर्पित व्रत के रूप में मनाया जाता है। फाल्गुन माह में पड़ने वाली संकष्टी चतुर्थी को द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। इस दिन विधि-विधान से गणेश जी की पूजा और व्रत करने से जीवन में सुख, समृद्धि और शांति का आशीर्वाद मिलता है।
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का महत्व
इस दिन केवल गणेश जी की ही नहीं, बल्कि चंद्रदेव की भी पूजा की जाती है। खासतौर पर महिलाएं अपनी संतान की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हुए व्रत रखती हैं। मान्यता है कि व्रत और पूजा करने से जीवन के सभी संकट दूर होते हैं और सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं।
शुभ मुहूर्त
ब्रह्म मुहूर्त: 05:22 बजे से 06:15 बजे तक
शुभ-उत्तम मुहूर्त: 07:07 बजे से 08:29 बजे तक
अभिजीत मुहूर्त: 12:13 बजे से 12:57 बजे तक
लाभ-उन्नति मुहूर्त: 12:35 बजे से 01:57 बजे तक
चंद्रोदय का समय
द्रिक पंचांग के अनुसार इस दिन रात 09:35 बजे चंद्रमा का उदय होगा। व्रत पूर्ण करने के लिए इस समय चंद्रमा को अर्घ्य देना अनिवार्य है।
पूजा विधि
सुबह स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनें और मंदिर या घर में पूजा के लिए स्थान तैयार करें। पीले कपड़े पर गणेश जी की मूर्ति स्थापित करें। सिंदूर, चंदन, अक्षत, फल, फूल और दूर्वा अर्पित करें। घी का दीपक जलाएं और मोदक का भोग लगाएं। इसके बाद संकष्टी चतुर्थी कथा पढ़ें और आरती करें। दिनभर फलाहार करें और रात में चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रत का पारण करें।
व्रत के नियम
किसी से वाद-विवाद न करें।
दिन में सोने से बचें।
बुजुर्गों और महिलाओं का सम्मान करें।
धन की बर्बादी न करें।
घर और मंदिर को स्वच्छ रखें।
चंद्रमा को अर्घ्य देने से पहले व्रत का पारण न करें।
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी के मंत्र
ॐ गं गणपतये नमः
ॐ वक्रतुण्डाय हुं
ॐ एकदंताय नमः
ॐ लंबोदराय नमः
ॐ विघ्ननाशाय नमः
इस व्रत के पालन से व्यक्ति के जीवन में सुख-समृद्धि आती है, परिवार में खुशहाली रहती है और सभी कार्य सफल होते हैं।
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