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Navratri 2025 : बांग्लादेश में ढाका का ढाकेश्वरी मंदिर ; जहां मां सती का मुकुट रत्न गिरकर बना ‘शक्ति पीठ’

Navratri 2025 : देशभर में शारदीय नवरात्र का पर्व धूमधाम से मनाया जा रहा है। देवी मंदिरों में भक्तों का तांता लगा हुआ है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत ही नहीं, बल्कि बांग्लादेश में भी एक ऐसा प्राचीन मंदिर है, जो देवी सती से सीधे जुड़ा हुआ है? हम बात कर रहे हैं ढाका स्थित ढाकेश्वरी मंदिर की, जो दुनियाभर के करोड़ों हिंदुओं के लिए आस्था का बड़ा केंद्र है।

पौराणिक मान्यता

किंवदंती के अनुसार, जब माता सती का शरीर भगवान शिव के तांडव के दौरान खंड-खंड होकर पृथ्वी पर गिरा था, तब उनका मुकुट का रत्न इसी स्थान पर आ गिरा। इसी कारण ढाकेश्वरी मंदिर को शक्ति पीठों में गिना जाता है। यहां देवी को शक्ति का स्वरूप मानकर “मां ढाकेश्वरी” के नाम से पूजा जाता है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

इतिहासकारों का मानना है कि इस मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में राजा बल्लाल सेन ने करवाया था। समय-समय पर मंदिर ने आक्रमण, विनाश और पुनर्निर्माण के दौर देखे। आज भी इसकी दीवारें और प्रांगण बीते युग की कहानियों के साक्षी हैं।

स्थापत्य कला

ढाकेश्वरी मंदिर की वास्तुकला मध्यकालीन बंगाल की झलक पेश करती है। मुख्य गर्भगृह में देवी की प्रतिमा विराजमान है और इसके चारों ओर छोटे-छोटे मंदिर बने हैं। विशेष रूप से उत्तरी हिस्से में भगवान शिव के चार मंदिर स्थित हैं, जिनमें शिवलिंग स्थापित हैं।

स्वतंत्रता संग्राम और पुनर्निर्माण

1971 के बांग्लादेश स्वतंत्रता संग्राम के दौरान पाकिस्तानी हमलों में मंदिर को भारी नुकसान हुआ। इसके बावजूद आस्था डगमगाई नहीं। बाद में मंदिर का नवीनीकरण किया गया। विभाजन के समय मूल प्रतिमा सुरक्षा कारणों से पश्चिम बंगाल ले जाई गई थी। वर्तमान में यहां महिषासुरमर्दिनी रूप में प्रतिकृति स्थापित है, जिनके साथ लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश और कार्तिक की मूर्तियां भी विराजमान हैं।

सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक

1996 में ढाकेश्वरी मंदिर को ‘राष्ट्रीय मंदिर’ का दर्जा मिला। आज यह केवल पूजा-पाठ का स्थान नहीं, बल्कि बांग्लादेश की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक भी है। नवरात्र और अन्य पर्वों के दौरान यहां विशेष अनुष्ठान होते हैं, जिनमें हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं।

ढाका का ढाकेश्वरी मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति और आस्था का जीवंत प्रतीक है। 12वीं सदी से लेकर आज तक यह मंदिर हिंदू समुदाय की आस्था का केंद्र बना हुआ है और ढाका शहर की पहचान से गहराई से जुड़ा हुआ है।

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