NATO or Trump Update: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की जिद्द और आक्रामक रवैये के चलते NATO के खत्म होने की चर्चाएं चल रही हैं। खासकर, डेनमार्क की पीएम मेटे फ्रेडरिक्सन के उस बयान के बाद जिसमें उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति को चेताया था कि अगर वह ग्रीनलैंड पर कब्जे की कार्रवाई करते हैं तो NATO टूट जाएगा। गौरतलब है, डेनमार्क इस संगठन के शुरुआती सदस्यों में से एक है।
दूसरी बार राष्ट्रपति बने ट्रंप ने ग्रीनलैंड पर प्रतिबद्धता जताई थी
4 मार्च 2025 को वॉशिंगटन डीसी की एक शाम में अमेरिकी कांग्रेस का संयुक्त सत्र चल रहा था। ट्रंप मंच पर खड़े बोल रहे थे। उन्होंने अचानक कहा कि अमेरिका को हर हाल में ग्रीनलैंड लेना पड़ेगा। बात इतनी बेहिचक थी कि संसद में बैठे सांसद हंस पड़े, लेकिन ट्रंप मजाक नहीं कर रहे थे। इसके बाद 14 जनवरी 2026 को ट्रंप ने डेनमार्क और ग्रीनलैंड के विदेश मंत्री से साफ कह दिया- ग्रीनलैंड नेशनल सिक्योरिटी का मसला है। उस पर पूरी तरह अमेरिकी अधिकार चाहिए। फिर उन्होंने चेतावनी की तरह वेनेजुएला का नाम लिया, जिसके राष्ट्रपति मादुरो को उन्होंने उठवा लिया था। मतलब साफ था कि जरूरत पड़ी तो ताकत का इस्तेमाल करने में हिचक नहीं होगी।
ट्रंप से बयानों ने यूरोपीय नेताओं में खलबली मचाई
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के बयानों ने यूरोप के डिफेंस हेडक्वार्टर्स में भी हलचल मचा दी। डेनमार्क ने ग्रीनलैंड में अतिरिक्त सैनिक तैनात किए। जर्मनी, स्वीडन, फ्रांस, नॉर्वे, नीदरलैंड और फिनलैंड ने भी अमेरिका के खिलाफ एकजुटता दिखाई। कनाडा के पीएम मार्क कार्नी ने धमकी भरे लहजे में कह दिया- ‘दोस्तों, अब तख्तियां उतार देने का समय आ गया है।’
12 देशों से बने NATO की ऐसी है कहानी
नाटो के 76 साल के इतिहास में यह दृश्य कभी नहीं देखा गया था। एक ऐसा सैन्य गठबंधन, जो इस वादे पर खड़ा था कि ‘एक पर हमला, सब पर हमला’। अब उसके सदस्य एक-दूसरे पर हमलावर हैं। नाटो का जन्म द्वितीय विश्व युद्ध के मलबे से उपजी एक कड़वी मजबूरी थी। 3.65 करोड़ लोगों की मौत के बाद यूरोप एक कब्रिस्तान बन चुका था। सोवियत रूस के राष्ट्रपति जोसेफ स्टालिन को इस तबाही में एक अवसर नजर आया। उनका मानना था कि पूंजीवादी व्यवस्था यूरोप को इस हाल तक लाई है और अब सिर्फ कम्युनिस्ट विचारधारा ही इस डूबते महाद्वीप को बचा सकती है।
इसी बीच वॉशिंगटन में बैठे अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने एक ऐसा फैसला लिया, जो इतिहास बन गया- बर्लिन एयरलिफ्ट। अमेरिकी विमान महीनों तक आसमान के रास्ते बर्लिन में खाना, दवाइयां और ईंधन पहुंचाते रहे। यह केवल राहत अभियान नहीं था, यह सोवियत दबाव के खिलाफ खुली चुनौती थी। यूरोप समझ चुका था कि सोवियत संघ एक-एक करके देशों को झुकाने की कोशिश कर रहा है। और यह भी साफ था कि बिना सामूहिक सुरक्षा के वह टिक नहीं पाएगा। इसी मजबूरी में 4 अप्रैल 1949 को वॉशिंगटन में 12 देशों ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए और नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन यानी NATO का जन्म हुआ।
NATO का मकसद रूसियों को बाहर रखना
इस दौरान मौजूद ब्रिटिश जनरल और नाटो के पहले महासचिव लॉर्ड इस्मे ने इसके मकसद को एक ही वाक्य में समेट दिया- ‘रूसियों को बाहर रखना, अमेरिकियों को अंदर रखना और जर्मनों को दबाकर रखना।’ इसे ‘इस्मे डॉक्ट्रिन’ के नाम से जाना जाता है। इस पूरे समझौते की आत्मा थी नाटो का आर्टिकल 5। इसके तहत एक सदस्य पर हमला, सभी पर हमला माना जाएगा। नाटो के जन्म के महज पांच महीने बाद, 29 अगस्त 1949 की सुबह, कजाखस्तान के सेमिपालातिंस्क मैदान में जमीन कांप उठी। एक जबरदस्त धमाका हुआ- सोवियत संघ ने अपना पहला परमाणु परीक्षण कर दिया था। इसी के साथ परमाणु हथियारों पर अमेरिका का एकाधिकार खत्म हो गया। 1950 के दशक की शुरुआत में नाटो ने खुद को एक संगठित मिलिट्री मशीन में बदलना शुरू किया। 19 दिसंबर 1950 को अमेरिका के राष्ट्रपति ड्वाइट डी. आइजनहावर को नाटो का पहला सुप्रीम कमांडर नियुक्त किया गया, लेकिन आइजनहावर इस भूमिका से उत्साहित नहीं थे।
NATO क्यों परमाणु बम जमा करता चला गया
MAD नीति के तहत नाटो ने हजारों परमाणु हथियार रखने का लक्ष्य तय किया था। रणनीति साफ थी- इतनी क्षमता होना कि सोवियत संघ की लगभग 30% आबादी और 70% औद्योगिक ढांचे को नष्ट किया जा सके। यह सुरक्षा की भाषा नहीं थी, यह विनाश के संतुलन की भाषा थी।
फ्रांस NATO से निकला था
7 मार्च 1966 को फ्रांस के राष्ट्रपति चार्ल्स द गॉल ने नाटो से बाहर निकलने की घोषणा कर दी थी। डी गॉल का सवाल सीधा था- अगर सोवियत मिसाइलें पेरिस की ओर बढ़ें, तो क्या अमेरिका न्यूयॉर्क को दांव पर लगाकर फ्रांस को बचाएगा? उन्हें इस पर जरा भी भरोसा नहीं था। डी गॉल ने अमेरिकी सैनिकों को फ्रांस छोड़ने का आदेश दे दिया। कहा जाता है कि उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन बी. जॉनसन ने व्यंग्य में पूछा था- ‘क्या हमें फ्रांस में दफन अपने सैनिकों की कब्रें भी साथ ले जानी होंगी?’ यह तंज नाटो के भीतर मौजूद गहरी भावनात्मक और रणनीतिक दरारों को उजागर करता है।
NATO का दोबारा सदस्य बना फ्रांस
कई दशकों की दूरी के बाद, साल 2009 में फ्रांस दोबारा नाटो की इंटिग्रेटेड मिलिट्री स्ट्रक्चर का हिस्सा बना, लेकिन चार्ल्स द गॉल का सवाल आज भी हवा में तैर रहा है- सुरक्षा के वादे पर कितना भरोसा किया जा सकता है? दिसंबर 1991 की एक बर्फीली शाम, मॉस्को के क्रेमलिन में इतिहास ने चुपचाप करवट बदली। जिस किले से दशकों तक दुनिया की किस्मत तय होती रही थी, वहां से सोवियत संघ का लाल झंडा हमेशा के लिए उतार लिया गया। 40 साल से चला आ रहा शीत युद्ध, जिसमें देशों को मोहरे बनाकर खेला गया, आखिरकार खत्म हो गया। ऐसा लगा मानो नाटो का काम पूरा हो चुका हो।
इन देशों से NATO का हुआ विस्तार
7 मई 2000 को जब व्लादिमीर पुतिन सत्ता में आए, तब तक पोलैंड, हंगरी और चेक गणराज्य नाटो में शामिल हो चुके थे। इसके बावजूद पुतिन शुरुआती वर्षों में पश्चिम से टकराव से बचते रहे। उन्होंने यहां तक कहा कि रूस नाटो की सदस्यता की संभावना से इनकार नहीं करता, लेकिन नाटो रूस को बराबरी का भागीदार मानने को तैयार नहीं था- उसे सिर्फ एक थर्ड रेट पावर समझा गया। साल 2004 में नाटो ने एस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया समेत सात पूर्व सोवियत गणराज्यों को अपने साथ जोड़ लिया। यह केवल विस्तार नहीं था- यह रूस की दहलीज तक सीधी दस्तक थी। पुतिन ने इसे रणनीतिक घेराबंदी के रूप में देखा।
जब पुतिन NATO विरोधी बने
नाटो के विस्तार से 10 फरवरी 2007 की शाम, म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में पुतिन का संयम टूट गया था। मंच से उन्होंने नाटो देशों से तीखे शब्दों में पूछा- ‘उन वादों का क्या हुआ कि नाटो एक इंच भी आगे नहीं बढ़ेगा? आखिर रूस के करीब आप अपने आप को किसके खिलाफ फैला रहे हैं?’ यहीं से सहयोग की बची-खुची उम्मीद भी खुली दुश्मनी में बदलने लगी थी। 2008 के बुखारेस्ट शिखर सम्मेलन शुरू होने से पहले ही अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने ऐलान कर दिया कि जॉर्जिया और यूक्रेन भी ‘नाटो के सदस्य बनेंगे।’
लीबिया में NATO के हवाई हमले
साल 2011 में, लीबिया के शासक मुअम्मर गद्दाफी को सत्ता से हटाने के लिए नाटो ने हवाई हमले किए। रूस ने इसे केवल एक अमानवीय हस्तक्षेप नहीं माना, बल्कि अपने रणनीतिक हितों, खासतौर पर तेल और गैस व्यापार पर सीधा हमला समझा। अविश्वास और गहराता चला गया। फिर 2014 आया। यूक्रेन में पश्चिम समर्थक सरकार के सत्ता में आते ही पुतिन ने क्रीमिया का विलय रूस में कर लिया। यहीं से नाटो और रूस के बीच ‘छद्म युद्ध’ की शुरुआत मानी जाती है। अमेरिका और नाटो के देश यूक्रेन को हथियार देने लगे और रूस युद्ध के मौके तलाशने लगा।
NATO के खिलाफ ट्रंप के बयानबाजी शुरू
साल 2017। राष्ट्रपति बनते ही डोनाल्ड ट्रम्प ने नाटो सहयोगियों को साफ शब्दों में सुना दिया- अपने हिस्से का पैसा खर्च करो, नहीं तो सुरक्षा भूल जाओ। उनके लिए नाटो कोई विचारधारा नहीं था, बल्कि एक कारोबारी सौदा था। इसी सोच ने नाटो की सबसे बड़ी कमजोरी उजागर कर दी।
ट्रंप के बाद मैक्रों भी NATO की कर चुके हैं आलोचना
नवंबर 2019 में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने एक ऐसी बात कही, जिसने पूरी अटलांटिक दुनिया को झकझोर दिया- ‘नाटो ब्रेन-डेड है।’ असल में अमेरिका ने नाटो सहयोगियों से सलाह किए बिना ही सीरिया से अपनी सेना वापस बुला ली थी। दरअसल, वो यह बता रहे थे कि अगर गठबंधन में संवाद और भरोसा मर जाए, तो शरीर जीवित तो दिख सकता है, पर वो कुछ कर नहीं सकता।
ट्रंप के बयानों ने NATO सदस्य देशों की बढ़ाई चुनौती
अक्टूबर 2018 में यूरोप की ठंड अचानक और गहरी हो गई। ट्रम्प ने कहा कि अगर कोई छोटा नाटो देश रूस से उलझता है, तो ‘सोचना पड़ेगा’ कि अमेरिका उसकी मदद करे या नहीं। लिथुआनिया, लातविया और एस्टोनिया जैसे देशों के लिए यह बयान किसी अलार्म से कम नहीं था। नीदरलैंड्स के शहर द हेग में मई 2025 की एक सुबह। दुनिया के सबसे ताकतवर देशों के नेता यहां जमा थे। माहौल में नाटो के 75 साल पूरे होने का जश्न नहीं, बल्कि गहरी बेचैनी थी। सम्मेलन कक्ष के भीतर एक मेज पर एक पतली-सी फाइल रखी थी, जिस पर लिखा था- अमेरिका की नई नेशनल सिक्योरिटी स्ट्रैटजी 2025।
NATO में अमेरिका की हिस्सेदारी
अखिरकार नाटो की सैन्य ताकत में अमेरिका अकेले 42% का हिस्सेदार है। नाटो के करीब 35 लाख सैनिकों में अकेले अमेरिका के 13 लाख हैं। कुल 22400 विमानों में अमेरिका के 14000 हैं। अमेरिका निकला तो नाटो सच में ‘पेपर नाटो’ हो जाएगा।
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