होम = Others = पाकिस्तान में सब फर्जी है…फेक डिग्री के सहारे वकील बना जज, पांच साल बाद खुली पोल

पाकिस्तान में सब फर्जी है…फेक डिग्री के सहारे वकील बना जज, पांच साल बाद खुली पोल

by | Feb 25, 2026 | Others

Islamabad High Court judge removal: इस्लामाबाद हाईकोर्ट (IHC) ने अपने ही एक जज को पद से हटाते हुए 116 पृष्ठों का फैसला जारी किया है। अदालत ने पाया कि जज तारिक महमूद जहांगीरी ने जिस कानून डिग्री के आधार पर वकालत और बाद में जज पद की जिम्मेदारी संभाली, वह प्रारंभ से ही अमान्य थी। अदालत के अनुसार, उनकी शैक्षणिक योग्यता फर्जी दस्तावेजों पर आधारित थी, जिससे उनकी नियुक्ति कानूनी रूप से टिक नहीं सकती।

नियुक्ति और निलंबन की वजह

रिपोर्ट के मुताबिक, जहांगीरी को दिसंबर 2020 में हाईकोर्ट का जज नियुक्त किया गया था। हालांकि, सितंबर 2024 में उन्हें न्यायिक कार्यों से रोक दिया गया था, जब उनकी डिग्री को लेकर गंभीर सवाल उठे। अब अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि उनकी नियुक्ति शुरुआत से ही शून्य थी, क्योंकि जिस बुनियाद पर वे वकालत कर रहे थे, वही अवैध पाई गई।

कराची विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड से खुलासा

अदालत का निर्णय कराची विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार द्वारा उपलब्ध कराए गए मूल रिकॉर्ड पर आधारित था। इन अभिलेखों से पता चला कि जहांगीरी ने 1988 में परीक्षा देने के लिए फर्जी नामांकन संख्या का उपयोग किया था। परीक्षा के दौरान नकल करते पकड़े जाने पर 1989 में विश्वविद्यालय ने उन पर तीन वर्षों का प्रतिबंध लगाया था।

फैसले में कहा गया कि सजा स्वीकार करने के बजाय उन्होंने धोखाधड़ी का रास्ता चुना। अगले वर्ष उन्होंने एक अन्य छात्र, इम्तियाज अहमद, को आवंटित नामांकन संख्या का उपयोग करते हुए “तारिक जहांगीरी” नाम से परीक्षा दी। अदालत ने इसे सुनियोजित प्रतिरूपण और शैक्षणिक धोखाधड़ी माना।

लॉ कॉलेज में प्रवेश का भी अभाव

मामले की सुनवाई के दौरान गवर्नमेंट इस्लामिया लॉ कॉलेज के प्रिंसिपल ने भी अदालत को बताया कि जहांगीरी का संस्थान में कभी वैध प्रवेश दर्ज नहीं हुआ। इस तथ्य ने उनकी विधि शिक्षा पर और गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया। अदालत ने माना कि जब मूल शैक्षणिक आधार ही संदिग्ध है, तो उस पर आधारित पूरी पेशेवर यात्रा भी वैध नहीं मानी जा सकती।

अदालत में बचाव की कोशिशें

फैसले में यह भी उल्लेख किया गया कि जहांगीरी को कई अवसर दिए गए कि वे अपने मूल दस्तावेज और लिखित स्पष्टीकरण प्रस्तुत करें। लेकिन वे ठोस साक्ष्य देने में असफल रहे। इसके बजाय उन्होंने विभिन्न याचिकाएं दायर कर कार्यवाही को टालने की कोशिश की। उन्होंने यह तर्क दिया कि संबंधित मामला सिंध उच्च न्यायालय में लंबित है, इसलिए यहां सुनवाई रोकी जाए।

उन्होंने पूर्ण पीठ गठित करने, मुख्य न्यायाधीश के खुद को मामले से अलग करने और अनिश्चितकालीन स्थगन की भी मांग की। हालांकि, अदालत ने इन याचिकाओं को “विलंबकारी हथकंडे” करार दिया और कहा कि जब याचिकाकर्ता पर्याप्त साक्ष्य पेश कर चुका है, तो प्रतिवादी पर अपनी योग्यता साबित करने की जिम्मेदारी आ जाती है।

न्यायपालिका की साख पर सवाल

पीठ ने स्पष्ट किया कि सबूत पेश न कर पाने की स्थिति में फैसला विरोध में जाना स्वाभाविक है। अदालत ने दो टूक कहा कि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर की गई नियुक्ति को वैध नहीं ठहराया जा सकता।

यह मामला पाकिस्तान की न्यायपालिका में पारदर्शिता और नियुक्ति प्रक्रिया की विश्वसनीयता को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। एक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का वर्षों तक फर्जी डिग्री के आधार पर पद पर बने रहना संस्थागत जांच-प्रणाली पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है। अदालत के इस फैसले के साथ ही यह प्रकरण एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है, जो भविष्य में नियुक्तियों की जांच को और कड़ा कर सकता है।

Tags :

बंगाल