Indian state and city renaming: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कैबिनेट नए प्रधानमंत्री ऑफिस सेवा तीर्थ से पहली कैबिनेट मीटिंग में केरल का नाम बदलकर केरलम् करने का प्रस्ताव पारित कर दिया। इसके बाद अब एक बार दिल्ली का नाम बदलकर इंद्रप्रस्थ करने की मांग ने जोर पकड़ लिया है। इससे पहले भी कई बार दिल्ली को इंद्रप्रस्थ करने की मांग की गई थी। आपको बता दें कि केरल से पहले भी कई शहरों के नाम बदले गए हैं, जिनमें इलाहाबाद का नाम प्रयागराज किया गया था। अब दिल्ली का नाम इंद्रपस्थ करने पर क्यों पकड़ रही जोर, दिल्ली का क्या है प्राचीन इतिहास और दिल्ली का नाम कब दिल्ली पड़ा था। क्या है प्रधानमंत्री का गुलामी की निशानियों से निकलकर भारत के गौरव को वापस लाने का सपना? आपके मन भी अगर ऐसे सवाल हैं तो चलिए हम आपको सभी सवालों के देंगे यहां जवाब…
दिल्ली का नाम इंद्रपस्थ करने पर क्यों पकड़ रही जोर?
दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लालिकले की प्राचीर से एक नारा दिया था कि देश को गुलामी की मानसिकता से बाहर निकालना है। इसके लिए उन्होंने दिल्ली के लुटियन्स जोन में कई पुराने नामों को बदलने का काम किया है। उदाहरण के लिए राष्ट्रपति भवन से इंडिया गेट तक जाने वाला करीब 3 किमी का रास्ता, जिसे राजपथ के नाम से जाना जाता था। वर्ष 2022 में राजपथ का नाम बदलकर कर्तव्य पथ कर दिया गया। इतना ही नहीं इससे पहले औरंगजेब रोड का नाम बदलकर भारत के पूर्व राष्ट्रपति और मिसाइल मैन डॉ. एपीजे अब्दुल के नाम पर रखा गया। इसके साथ ही नरेंद्र मोदी ने पीएमओ का नाम बदलकर सेवातीर्थ कर दिया है। देश के सभी राजभवन का नाम बदलकर लोकभवन कर दिया गया है। इसकी शुरूआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पीएम आवास 7 लोकल्याण मार्ग से की, जो पहले 2 रेसकोर्स के नाम से जाना जाता था।
किन किन शहरों का बदला गया नाम?
उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज और मुगलसराय का नाम पंडित दीन दयाल उपाध्याय नगर किया गया था। इसके अलावा महाराष्ट्र के औरंगाबाद और उस्मानाबाद का नाम बदलकर छत्रपति संभाजीनकर और धाराशिव कर दिया गया। अब हाल ही में केरल राज्य का नाम बदलकर केरलम् कर दिया गया है।
क्या है दिल्ली का प्राचीन इतिहास
माना जाता रहा है कि दिल्ली का नाम दिल्ली से पहले इंद्रप्रस्थ था, जो महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। महाभारत के अनुसार, इंद्रप्रस्थ को पांडवों ने भगवान श्री कृष्ण की सलाह पर खांडवप्रस्थ नामक जंगली और बंजर भूमि पर बसाया था। राक्षस शिल्पी मयदानव और भगवान विश्वकर्मा ने इसे स्वर्ग जैसी भव्यता प्रदान की, जिसमें जादुई महल, चौड़ी सड़कें और सुंदर बाग थे। यह यमुना नदी के किनारे स्थित एक अत्यंत सुंदर और सुदृढ़ शहर के रूप में निर्मित हुआ। इस भव्य शहर को इंद्र के स्वर्ग जैसा बनाए जाने के कारण इसे इंद्रप्रस्थ नाम दिया गया। बाद में यह हस्तिनापुर की राजधानी बन गया। इंद्रप्रस्थ हस्तिनापुर और कुरुक्षेत्र के बीच में बसाया गया था। ऐतिहासिक रूप से इसे दिल्ली के पुराना किला के आसपास का क्षेत्र माना जाता है, जहां खुदाई में 1000 ईसा पूर्व के अवशेष मिले हैं।
दिल्ली का नाम कब दिल्ली पड़ा
मौर्य और गुप्त काल: प्राचीन बौद्ध साहित्य में इसे ‘इन्दपत्त’ कहा गया है। अशोक के शिलालेख और गुप्त काल के अवशेष (जैसे कुतुब परिसर का लौह स्तंभ) इस क्षेत्र की निरंतरता को दर्शाते हैं।
तोमर और ‘ढिल्ली’ का उदय: 8वीं से 12वीं शताब्दी के बीच तोमर राजाओं (विशेषकर अनंगपाल तोमर) ने यहाँ शासन किया। माना जाता है कि राजा धिल्लू के नाम पर या लौह स्तंभ के ‘ढीले’ होने की कहानी से इसका नाम ढिल्ली या ‘ढिल्लिका’ पड़ा, जो बाद में ‘दिल्ली’ बन गया।
चौहान और दिल्ली सल्तनत: पृथ्वीराज चौहान ने यहाँ लाल कोट और ‘किला राय पिथोरा’ का विस्तार किया। उनके बाद मुस्लिम शासकों ने सिरी, तुगलकाबाद और फिरोजाबाद जैसे शहर बसाए, जिससे दिल्ली ‘सात शहरों की नगरी’ कहलाई।
मुगल और शाहजहानाबाद: मुगलों ने दिल्ली को अपनी मुख्य शक्ति बनाया। शाहजहां ने 17वीं सदी में शाहजहानाबाद (पुरानी दिल्ली) बसाया, जहाँ लाल किला और जामा मस्जिद स्थित हैं।
ब्रिटिश काल और नई दिल्ली: 1911 में अंग्रेजों ने राजधानी को कोलकाता से दिल्ली स्थानांतरित किया। एडविन लुटियन्स और हर्बर्ट बेकर ने एक आधुनिक नियोजित शहर डिजाइन किया, जिसका उद्घाटन 1931 में नई दिल्ली के रूप में हुआ।
क्या है प्रधानमंत्री का सपना?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लालकिले की प्राचीर देश को जब संबोधित करते हैं तो वह अपने संबोधन में इस बात का जिक्र जरूर करते हैं कि देश को गुलामी की मानसिकता से बाहर निकालना है। दरअसल, इसके पीछे का उनका एक मकसद है कि मुगल साम्राज्य और ब्रिटिश शासनकाल के दौरान जिन सड़कों और इमारतों को बनाया गया या फिर उनका नामकरण किया गया। इन सभी का नाम बदलकर भारत के वीरों या फिर भारत के महापुरुषों के नाम पर रखा जाए।
अब अन्य शहरों और राज्यों का नाम बदलने की मांग पकड़ सकती है जोर
केरल का नाम बदलने के साथ ही अब अन्य राज्यों के नाम बदलने की मांग जोर पकड़ सकती है। इसमें उत्तराखंड का नाम उत्तरांचल करना हो या फिर पश्चिम बंगाल को बांग्ला करने की मांग जोर पकड़ सकती है। दरअसल, 2016 में पश्चिम बंगाल सरकार ने तीन नामों का प्रस्ताव रखा था. बंगाली में बांग्ला, अंग्रेजी में बेंगाल और हिंदी में बंगाल करने का प्रस्ताव दिया है।

