होम = देश = शकील अहमद ने बताई कांग्रेस की अंदरूनी कहानी, राणा यशवंत के साथ एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में किए विस्फोटक खुलासे

शकील अहमद ने बताई कांग्रेस की अंदरूनी कहानी, राणा यशवंत के साथ एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में किए विस्फोटक खुलासे

India News 24X7 Exclusive Interview: कांग्रेस पार्टी के भीतर लंबे समय से सुलग रहा असंतोष एक बार फिर खुलकर सामने आ गया है। इंडिया न्यूज़ 24X7 पर एडिटर-इन-चीफ़ राणा यशवंत के साथ एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री शकील अहमद ने पार्टी नेतृत्व, खासकर राहुल गांधी पर कई खुलासे किए। शकील अहमद ने आरोप लगाया कि कांग्रेस में अब न तो आंतरिक लोकतंत्र बचा है, न संवाद का कल्चर और न ही वरिष्ठ नेताओं के लिए सम्मान। यही वजह है कि कांग्रेस बिहार और दिल्ली जैसे अहम राज्यों में लगातार कमजोर होती गई।

राजनीति के फैसले और आत्मसम्मान की लड़ाई

शकील अहमद का कहना है कि राजनीति में कुछ फैसले केवल सत्ता या पद से जुड़े नहीं होते, बल्कि आत्मसम्मान और वैचारिक प्रतिबद्धता से भी जुड़े होते हैं। पार्टी से अलग होने का उनका फैसला भी ऐसा ही था। तीन बार विधायक, दो बार सांसद और कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता रह चुके शकील अहमद ने कहा कि उन्होंने यह कदम किसी गुस्से या आवेश में नहीं उठाया, बल्कि लंबे समय से मिल रही उपेक्षा और अनदेखी ने उन्हें मजबूर किया।

उनके शब्दों में, “जब आपको लगातार यह एहसास कराया जाए कि पार्टी में आपकी कोई भूमिका नहीं रही, तब आत्मसम्मान के लिए निर्णय लेना पड़ता है।”

“कमजोरी बाहर नहीं, पार्टी के अंदर है”

राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए शकील अहमद ने कहा कि उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बाहरी विरोधी नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर के वरिष्ठ नेता हैं।
उन्होंने तंज कसते हुए कहा, “जिस व्यक्ति को जन्म से ज़ेड प्लस सुरक्षा मिली हो, वह बाहर के लोगों से क्यों डरेगा? असली डर अंदर का है।” उनका आरोप है कि राहुल गांधी वरिष्ठ, अनुभवी और स्वतंत्र राय रखने वाले नेताओं से असहज महसूस करते हैं। वे ऐसे लोगों से घिरे रहना पसंद करते हैं जो केवल उनकी हां में हां मिलाएं। इससे पार्टी में एक तरह का “क्लोज़ सर्कल” बन गया है, जहां असहमति की कोई जगह नहीं बची।

सोनिया बनाम राहुल

शकील अहमद ने इस दौरान सोनिया गांधी और राहुल गांधी की कार्यशैली की तुलना भी की। उनके अनुसार, सोनिया गांधी का नेतृत्व समावेशी था। वे रोज़ नेताओं से मिलती थीं, ज़मीनी हालात जानती थीं और असहमति को भी गंभीरता से सुनती थीं। इसके उलट, राहुल गांधी पर आरोप है कि वे केवल “फिल्टर्ड” लोगों से ही मिलते हैं। जो व्यक्ति उनके करीबी सलाहकारों की पसंद में फिट नहीं बैठता, उसकी बात नेतृत्व तक पहुंच ही नहीं पाती। यही वजह है कि पार्टी और ज़मीन के बीच दूरी बढ़ती चली गई।

दिल्ली में कांग्रेस का पतन और केजरीवाल फैक्टर

दिल्ली कांग्रेस की मौजूदा स्थिति पर शकील अहमद ने खुलकर कहा कि इसके लिए पार्टी के गलत रणनीतिक फैसले जिम्मेदार हैं। उन्होंने 2013 का ज़िक्र करते हुए बताया कि कांग्रेस ने बाहर से समर्थन देकर अरविंद केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनने का मौका दिया, लेकिन यह नहीं समझ पाई कि इससे उसका पूरा वोट बैंक आम आदमी पार्टी की ओर शिफ्ट हो जाएगा।

उनके शब्दों में, “आज दिल्ली में कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिलती। इसकी नींव उसी समय रख दी गई थी।”

बिहार: जहां अनदेखी ने हद पार की

बिहार कांग्रेस को लेकर शकील अहमद की पीड़ा और गहरी दिखाई दी। उन्होंने कहा कि वे राज्य के वरिष्ठतम नेताओं में से एक रहे हैं, इसके बावजूद उन्हें पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया। उनका दावा है कि जिन दो विधानसभा सीटों पर कांग्रेस को जीत मिली, वहां भी उनसे कोई राय नहीं ली गई। उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी बैठकों में बुलाना बंद कर दिया गया, राहुल गांधी की बिहार यात्राओं में उन्हें जानबूझकर नजरअंदाज किया गया और यह संदेश दिया गया कि अब पार्टी में उनकी कोई हैसियत नहीं रही।

कांग्रेस में लोकतंत्र बनाम केंद्रीकरण

शकील अहमद का एक बड़ा आरोप यह भी है कि कांग्रेस में अब वास्तविक लोकतंत्र खत्म हो चुका है। कागज़ों पर भले ही पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे हों, लेकिन सभी अहम फैसले राहुल गांधी के इर्द-गिर्द ही होते हैं। उनका कहना है कि टिकट बंटवारे, संगठनात्मक नियुक्तियां और रणनीति सब कुछ एक ही केंद्र से तय किया जाता है। इससे न केवल वरिष्ठ नेताओं की भूमिका खत्म हुई, बल्कि संगठन में असंतोष भी बढ़ा।

अल्पसंख्यक नेतृत्व और ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की बहस

शकील अहमद ने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस में अल्पसंख्यक नेताओं को धीरे-धीरे साइडलाइन किया जा रहा है। हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट किया कि वे राहुल गांधी को “एंटी-मुस्लिम” नहीं मानते, लेकिन उनका कहना है कि राजनीतिक रणनीति के तहत यह सब हो रहा है।

उनके मुताबिक, “बीजेपी शुद्ध घी की दुकान खोलकर बैठी है। कांग्रेस अगर सॉफ्ट हिंदुत्व करेगी तो न सेकुलर रहेगी, न भरोसेमंद।”

अंतिम संदेश: दूरी राहुल से, कांग्रेस से नहीं

इतनी कड़ी आलोचना के बावजूद शकील अहमद ने यह साफ कर दिया कि वे कांग्रेस की विचारधारा से अलग नहीं हुए हैं। उन्होंने कहा, “मैं राहुल गांधी से दूर हुआ हूं, कांग्रेस से नहीं। मेरा आखिरी वोट कांग्रेस को ही जाएगा।” उनका मानना है कि राहुल गांधी पढ़े-लिखे और संवेदनशील हैं, लेकिन उनकी नेतृत्व शैली, सीमित सलाहकारों की घेराबंदी और संवाद की कमी ने कांग्रेस को लगातार कमजोर किया है।

अनुभव बनाम नई टीम

शकील अहमद का यह इंटरव्यू सिर्फ एक नेता की नाराज़गी नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर चल रहे उस गहरे संघर्ष की तस्वीर है, जहां अनुभव बनाम नई टीम, लोकतंत्र बनाम केंद्रीकरण और विचारधारा बनाम चुनावी रणनीति आमने-सामने खड़े हैं। अब सवाल यह नहीं है कि शकील अहमद सही हैं या राहुल गांधी, सवाल यह है कि क्या कांग्रेस इन आरोपों को गंभीरता से लेकर आत्ममंथन करेगी, या फिर यह आवाज़ भी बाकी असंतोष की तरह अनसुनी रह जाएगी।

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