MGNREGA Name Change: देश में सबसे बड़ी ग्रामीण रोजगार योजना मनरेगा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। वजह है मोदी सरकार द्वारा इसका नाम और स्वरूप बदलने की तैयारी। केंद्र सरकार मौजूदा महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) की जगह एक नया कानून लाने जा रही है, जिसका नाम होगा Viksit Bharat- Guarantee for Rozgar and Ajeevika Mission (Gramin) Bill 2025, जिसे संक्षेप में VB-G RAM-G (जी राम जी) कहा जा रहा है।
सरकार के दावे
सरकार का कहना है कि यह बदलाव विकसित भारत 2047 के विजन के तहत किया जा रहा है। यानी केवल नाम ही नहीं बदलेगा, बल्कि रोजगार के दिनों, भुगतान प्रणाली और फंडिंग पैटर्न में भी बदलाव संभव है। यही कारण है कि गांवों में रहने वाले करोड़ों परिवारों के मन में सवाल हैं क्या बदलेगा और इससे उन्हें क्या फायदा होगा?
विपक्ष का सवाल
इस बिल के संसद में पेश होते ही विपक्ष भड़क गया। कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार नाम बदलने की राजनीति में जनता के पैसे की बर्बादी कर रही है। सवाल उठ रहा है कि आखिर एक योजना का नाम बदलने में इतना खर्च क्यों होता है?
कहां-कहां आएगा खर्च
मनरेगा दुनिया की सबसे बड़ी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में से एक है, जिससे करीब 25 करोड़ मजदूर जुड़े हैं और 2.69 लाख ग्राम पंचायतों तक इसकी पहुंच है। ऐसे में बदलाव का असर और खर्च दोनों बड़े होंगे।
जॉब कार्ड: करोड़ों पुराने जॉब कार्ड बदलने या उन पर नए नाम के स्टिकर लगाने में अनुमानित 300-400 करोड़ रुपये खर्च हो सकते हैं।
सूचना बोर्ड और दीवार लेखन: पंचायतों और कार्यस्थलों पर लगे बोर्ड बदलने में करीब 200 करोड़ रुपये का खर्च आ सकता है।
स्टेशनरी और मुहरें: रजिस्टर, फॉर्म, लेटरहेड और स्टांप बदलने में 50–100 करोड़ रुपये तक खर्च का अनुमान है।
डिजिटल सिस्टम: वेबसाइट, ऐप, सॉफ्टवेयर और भुगतान सिस्टम अपडेट करने में आईटी संसाधनों पर बड़ा खर्च होगा।
प्रचार-प्रसार: नई योजना को पहचान दिलाने के लिए विज्ञापनों पर पहले ही साल 200 करोड़ रुपये या उससे ज्यादा खर्च हो सकता है।
पहले भी हो चुके हैं ऐसे बदलाव
2009 में नरेगा से मनरेगा और 2014 में निर्मल भारत से स्वच्छ भारत मिशन इन बदलावों के दौरान भी करोड़ों रुपये खर्च हुए थे। अब सवाल यही है क्या ‘जी राम जी’ सिर्फ नाम का बदलाव है या ग्रामीण रोजगार की दिशा में वाकई कोई बड़ा सुधार? इसका जवाब तो कानून लागू होने के बाद ही साफ होगा, लेकिन इतना तय है कि इस फैसले का असर गांव-गांव तक दिखेगा।
ये भी पढ़े: नीतीश कुमार का हिजाब विवाद: अरब मीडिया में भी छाया, भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि पर उठे सवाल

