Journey Of Vande Mataram: क्या आप जानते हैं कि भारत के राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् की रचना ब्रिटिश फरमान ‘गॉड! सेव द क्वीन’ के विरोध में हुई थी? 1870 के दशक में ब्रिटिश हुकूमत ने सरकारी समारोहों में यह गीत अनिवार्य कर दिया था। बंगाल से आए इस फरमान ने कई भारतीय अधिकारियों को आहत किया, खासकर एक डिप्टी कलक्टर को, जिन्होंने इस आदेश के प्रति गहरी अशांति महसूस की।
यही डिप्टी कलक्टर थे महान लेखक, विचारक और पत्रकार बंकिम चंद्र चटर्जी। सियालदह से नैहाटी की रेल यात्रा के दौरान उनके मन में उमड़ते विचारों ने शब्दों का रूप लिया और जन्मा वंदे मातरम्। यह सिर्फ एक गीत नहीं था, बल्कि राष्ट्र के प्रति प्रेम, श्रद्धा और क्रांति का प्रतीक बन गया।
कैसे दो पद के गीत ने मातृभूमि को दर्शाया
शुरुआत में गीत के केवल दो पद संस्कृत में रचे गए थे, जो मातृभूमि की वंदना प्रस्तुत करते थे। इसे सबसे पहले उनकी पत्रिका ‘बंग दर्शन’ में प्रकाशित किया गया। बाद में 1882 में अपने उपन्यास ‘आनंदमठ’ में उन्होंने इसे शामिल किया। उपन्यास में आगे के पद बांग्ला में थे, जिनमें भारत माता की दुर्गा रूप में स्तुति की गई। गीत की रचना रविवार, कार्तिक सुदी नवमी, 7 नवम्बर 1875 को हुई।
क्या है वंदे मातरम् की विशेषता
वंदे मातरम् की विशेषता यह है कि इसमें भारत माता को सर्वोपरि स्थान दिया गया और यह मातृभूमि की महानता, संस्कृति और परंपराओं का प्रतीक बन गया। ब्रिटिशर्स ने इसे डर के मारे प्रतिबंधित कर दिया, लेकिन आज यह स्वतंत्र भारत का प्रेरणास्त्रोत और राष्ट्रगीत बन चुका है। इस गीत ने अंग्रेजी फरमान का विरोध कर एक नई चेतना जगाई और क्रांतिकारी भावनाओं को पुष्ट किया। बंकिम चंद्र चटर्जी का यह रचना इतिहास में उस समय की भारतीय भावना का प्रतीक बनकर आज भी जीवित है।

