Parliament Winter Session : लोकसभा में बुधवार को चर्चा के दौरान भाजपा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने कई ऐतिहासिक घटनाओं का ज़िक्र करते हुए कांग्रेस पर तीखे आरोप लगाए। उन्होंने डॉ. भीमराव अंबेडकर की 1952 की चुनावी हार, जवाहरलाल नेहरू की प्रतिक्रिया और इंदिरा गांधी के चुनाव निरस्त होने तक की घटनाओं को विस्तार से रखा। साथ ही, उन्होंने चुनाव सुधार और EVM के इतिहास पर भी बात की।
अंबेडकर की हार का मुद्दा उठाया
त्रिवेदी ने सदन में कहा कि डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर को 1952 के चुनाव में 74,333 वोट रद्द होने के बाद 14,000 वोटों से हराया गया। उन्होंने दावा किया कि यह पूरी प्रक्रिया बेहद संदिग्ध थी। इसके बाद उन्होंने जवाहरलाल नेहरू की एक चिट्ठी का ज़िक्र किया।
नेहरू की चिट्ठी पर गंभीर आरोप
सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि 16 जनवरी 1952 को नेहरू ने लखनऊ से प्रशासक मोहन भेतन को पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने अंबेडकर की हार पर खुशी जताई थी।
त्रिवेदी के अनुसार, नेहरू ने लिखा था—
“मुझे बहुत खुशी है कि डॉ. अंबेडकर चुनाव हार गए।”
“मैंने अंबेडकर का साथ दिया, इसलिए उनका खंडन विफल हो गया।”
सांसद ने कहा कि यह चिट्ठी ‘जवाहरलाल नेहरू के चयनित कार्य, श्रृंखला-2, खंड-17, पृष्ठ 37’ में दर्ज है।
इंदिरा गांधी का चुनाव अमान्य होने का मुद्दा भी छेड़ा
आगे बढ़ते हुए त्रिवेदी ने कहा कि भारत के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ था कि अनियमितताओं के कारण किसी प्रधानमंत्री का चुनाव अमान्य घोषित हुआ—और वह थीं इंदिरा गांधी। उन्होंने कहा कि यह घटना भारत के चुनावी इतिहास का सबसे बड़ा उदाहरण है कि सत्ता का दुरुपयोग किस तरह हुआ।
चुनाव सुधार 1977 से शुरू हुए: त्रिवेदी
भाजपा सांसद ने कहा कि जब तक कांग्रेस सत्ता में थी, चुनाव सुधार को लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। उन्होंने बताया कि 1977 में पहली बार चुनाव आयोग ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग विकल्प पर विचार शुरू किया।
EVM का सफर: इंदिरा से राजीव गांधी तक
सुधांशु त्रिवेदी ने EVM के विकास क्रम को भी सदन में रखा—
1982 — इंदिरा गांधी का कार्यकाल
अनुच्छेद 324 के तहत 50 मतदान केंद्रों पर पहली बार EVM इस्तेमाल किया गया।
1988 — राजीव गांधी सरकार में बदलाव
अनुच्छेद 61A में संशोधन कर EVM के उपयोग को मंज़ूरी दी गई।
15 मार्च 1989 — संवैधानिक अनिवार्यता
राजीव गांधी सरकार ने EVM के उपयोग को औपचारिक और संवैधानिक रूप से अनिवार्य किया।
सदन में गरमा गया माहौल
सुधांशु त्रिवेदी के इन ऐतिहासिक संदर्भों और आरोपों से सदन का माहौल काफी गरम हो गया। उन्होंने कहा कि इन उदाहरणों से साबित होता है कि चुनाव सुधार कांग्रेस की इच्छा से नहीं, बल्कि परिस्थितियों के दबाव में शुरू हुए।

