Mohan Bhagwat Yogi meeting: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से गुरुवार की सुबह एक बड़ी खबर निकलकर सामने आई. यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ अचानक आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत से मिलने पहुंच गए. इसके बाद डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्या और डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने भी मुलाकात की। तीनों नेताओं की इस सीक्रेट मीटिंग के बाद राजनीति में हलचल बढ़ गई है. राजनीति के लिहाज से यह मीटिंग बेहद अहम बताई जा रही है। बता दें कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत दो दिन के लखनऊ दौरे पर हैं.
मोहन भागवत और सीएम योगी की मुलाकात के क्या हैं मायने, इस मीटिंग में क्या हुआ? दोनों डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्या और ब्रजेश पाठक ने मिलकर क्या कहा? यूजीसी नियमों पर उठ रहे सवालों पर कोई मंथन हुआ, कैबिनेट में फेरबदल को लेकर चर्चा हुई या फिर अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर तैयारियों पर हुआ गहन मंथन…हम इस खबर में करेंगे पूरा विश्लेषण
मोहन भागवत के साथ सीएम योगी की 40 मिनट की मुलाकात
दरअसल, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत दो दिवसीय लखनऊ दौरे पर थे. वैसे तो उन्हें लखनऊ में कई कार्यक्रमों में हिस्सा लेना था, जिसमें युवाओं के साथ संवाद भी शामिल था. लेकिन 19 फरवरी की सुबह यानी गुरुवार को सीएम योगी और मोहन भागवत की मुलाकात हुई। यह मुलाकात करीब 40 मिनट तक चली। रिपोर्ट्स की मानें तो इस बैठक में प्रदेश सरकार की योजनओं, संगठनात्मक गतिविधियों और जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं की भूमिका को लेकर चर्चा हुई। राजनीति के नजरिए से देखें तो यह बैठक बेहद अहम है क्योंकि अगले साल 2027 में राज्य में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा था।
कब-कब हुई भागवत और सीएम योगी की मुलाकात?
25 नवंबर 2025: अयोध्या राम मंदिर में धर्मध्वजा के ध्वजारोहण कार्यक्रम के बाद सीएम योगी और मोहन भागवत की मुलाकात हुई थी। यह बैठक अयोध्या के साकेत निलमय में हुई और करीब डेढ़ घंटे तक चर्चा हुई। इस बैठक में राजनीति और आगामी चुनावों को लेकर मंथन हुआ था।
16 जून 2024 को लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद मोहन भागवत से गोरखपुर में 2 मुलाकातें हुईं। इसमें लोकसभा चुनाव के परिणामों को लेकर चर्चा हुई।
20 अक्टूबर 2022 को प्रयागराज में मिले सीएम योगी
सीएम योगी आदित्यनाथ ने 2022 में मोहन भागवत से प्रयागराज में मुलाकात की, जहां उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण और सामाजिक मुद्दों पर चर्चा की और सीएम ने उन्हें अयोध्या दीपोत्सव के लिए आमंत्रित किया था।
RSS और बीजेपी का रिश्ता क्यों अहम?
भारतीय जनता पार्टी का वैचारिक आधार संघ है। संघ सीधे चुनाव नहीं लड़ता, लेकिन संगठन, कैडर, बूथ नेटवर्क और सामाजिक पहुंच के जरिए चुनावी रणनीति में अहम भूमिका निभाता है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में संघ की सक्रियता और समन्वय सरकार की स्थिरता के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। जब संघ प्रमुख खुद मुख्यमंत्री और पूरी शीर्ष राजनीतिक टीम से मिलें, तो यह सिर्फ शिष्टाचार नहीं बल्कि फीडबैक और रणनीति समीक्षा भी होती है।
संघ आमतौर पर तीन चीजों पर चर्चा करता है:
1. सरकार के कामकाज पर जमीनी रिपोर्ट
2.कार्यकर्ताओं की नाराज़गी या संगठनात्मक शिकायतें
3.सामाजिक समीकरण और चुनावी तैयारी
क्या यह 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारी है?
सबसे मजबूत कयास यही लगाया जा रहा है कि यह बैठक 2027 यूपी विधानसभा चुनाव की शुरुआती रणनीति से जुड़ी है। यूपी बीजेपी के लिए सिर्फ एक राज्य नहीं बल्कि राष्ट्रीय राजनीति की धुरी है। लोकसभा चुनाव के बाद अब पार्टी का अगला बड़ा लक्ष्य 2027 विधानसभा चुनाव है। भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में आना चाहती है।
संघ आमतौर पर चुनाव से काफी पहले तैयारी शुरू कर देता है। बूथ स्तर पर कार्यकर्ता सक्रिय करना, सामाजिक समूहों तक पहुंच बढ़ाना और असंतोष कम करना। इस मुलाकात को अर्ली इलेक्शन ऑडिट भी कहा जा सकता है, यानी अभी से स्थिति का आकलन।
क्या अंदरूनी असंतोष पर चर्चा हुई?
बीजेपी में यूपी के अंदर लंबे समय से यह चर्चा चलती रही है कि संगठन और सरकार के बीच तालमेल हमेशा सहज नहीं रहता। कई विधायकों और कार्यकर्ताओं की शिकायतें भी सामने आती रही हैं। खासकर अधिकारियों की कार्यशैली और स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं की अनदेखी को लेकर।
कैबिनेट फेरबदल की संभावना?
राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात की है कि क्या यूपी में कैबिनेट विस्तार या फेरबदल हो सकता है। ऐसा इसलिए माना जा रहा है क्योंकि कई मंत्रियों के कामकाज पर सवाल उठते रहे हैं। क्षेत्रीय और जातीय संतुलन की जरूरत है। 2027 से पहले नए चेहरों को मौका देना जरूरी है। यदि संघ ने सरकार को फीडबैक दिया है कि कुछ क्षेत्रों में पार्टी कमजोर हो रही है, तो उसे मजबूत करने के लिए मंत्री बदलना या नए चेहरों को लाना एक राजनीतिक कदम हो सकता है।
क्या यह डैमेज कंट्रोल मीटिंग थी?
हाल के समय में शिक्षा, भर्ती, विश्वविद्यालय और युवाओं से जुड़े मुद्दे लगातार चर्चा में रहे हैं। युवाओं का वर्ग चुनाव में निर्णायक माना जाता है और यूपी में बड़ी संख्या में छात्र-युवा मतदाता हैं। संघ का फोकस हमेशा समाज के इस वर्ग पर रहता है। इसलिए यह भी संभव है कि बैठक में छात्र असंतोष, भर्ती परीक्षाएं, विश्वविद्यालय प्रशासन जैसे विषयों पर सरकार को सुझाव दिए गए हों।
सामाजिक और जातीय समीकरण
उत्तर प्रदेश की राजनीति में सामाजिक समीकरण सबसे निर्णायक कारक है। बीजेपी की जीत का आधार सिर्फ हिंदुत्व नहीं बल्कि विस्तृत सामाजिक गठबंधन भी रहा है। ओबीसी, गैर-यादव पिछड़े, गैर-जाटव दलित, सवर्ण और नए वोटर। संघ लगातार समाज के विभिन्न वर्गों से संपर्क रखता है और उनकी राय सरकार तक पहुंचाता है। इस बैठक का एक बड़ा उद्देश्य भी यही रहा होगा। किन वर्गों में असंतोष है? किन वर्गों में समर्थन बढ़ाना है? विपक्ष किन मुद्दों पर बढ़त ले सकता है?
विपक्ष के सामने चुनौती
इस मुलाकात का राजनीतिक संदेश विपक्ष के लिए भी है। जब संघ प्रमुख, मुख्यमंत्री और पूरी शीर्ष टीम एक साथ दिखती है तो यह संगठनात्मक एकजुटता का संकेत होता है। दरअसल, बीजेपी 2027 के लिए अभी से मोड में आ चुकी है। यह संदेश खास तौर पर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के लिए अहम है, क्योंकि यूपी में मुख्य मुकाबला इन्हीं दलों से माना जाता है।
RSS भाजपा को नहीं चलाता
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने स्पष्ट कहा कि संघ को भाजपा का “रिमोट कंट्रोल” बताना गलत धारणा है। उनके मुताबिक संघ के कई स्वयंसेवक राजनीति में जाकर भाजपा में काम करते हैं और आगे बढ़ते भी हैं, लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं कि संघ ही सरकार या पार्टी को निर्देश देता है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि जो लोग भाजपा का विरोध करते हैं, अक्सर वही संघ की आलोचना भी करते दिखाई देते हैं।
अमेरिकी टैरिफ पर प्रतिक्रिया
भागवत ने अमेरिका की व्यापारिक नीतियों और टैरिफ के मुद्दे पर कहा कि दबाव बनाकर अपनी बात मनवाना उनकी पुरानी रणनीति रही है। उन्होंने दावा किया कि हथियारों और आर्थिक ताकत के जरिए झुकाने की कोशिशें होती हैं, लेकिन भारत अब पहले जैसा कमजोर नहीं है। देश की जनता और व्यवस्था दोनों सक्षम हैं, इसलिए ऐसे कदमों का भारत पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा।
UGC विवाद और कानून
शिक्षा से जुड़े विवाद पर उन्होंने कहा कि मामला फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में है और अंतिम निर्णय अदालत ही देगी। अदालत जो तय करेगी, उसी के आधार पर आगे की दिशा तय होगी। साथ ही उन्होंने कहा कि यदि कोई कानून समाज के हित में न हो तो उसे संवैधानिक तरीके से बदला भी जा सकता है।
छुआछूत खत्म करने पर जोर
भागवत ने सामाजिक समरसता पर जोर देते हुए कहा कि सभी भारतीय एक ही राष्ट्र के परिवार का हिस्सा हैं। रंग, रूप और जाति अलग हो सकती है, लेकिन अपनापन बना रहना चाहिए। उनके अनुसार समाज में बराबरी और भाईचारे की भावना मजबूत होगी तो छुआछूत जैसी कुरीतियां स्वतः समाप्त हो सकती हैं।
जाति व्यवस्था अब प्रासंगिक नहीं
उन्होंने कहा कि जाति पहले पेशे के आधार पर बनी थी, लेकिन समय के साथ उसका स्वरूप बदल गया। अब समाज को इस विभाजन से बाहर निकलना चाहिए। उनके मुताबिक हिंदू समाज में शक्ति तो है, मगर वह बिखरा हुआ है और निजी स्वार्थों में उलझा हुआ है। यदि समाज एकजुट हो जाए तो देश तेजी से आगे बढ़ सकता है।
आधुनिकता बनाम पश्चिमीकरण
भागवत ने कहा कि नई चीजों को अपनाने में कोई बुराई नहीं, लेकिन अंधाधुंध पश्चिमी जीवनशैली की नकल ठीक नहीं है। आधुनिक बनते हुए अपनी संस्कृति और परंपराओं को भी संजोकर रखना जरूरी है।
परिवारों में संस्कार की अहमियत
उन्होंने संयुक्त परिवारों के कम होते चलन पर चिंता जताई, लेकिन रिश्तों के भाव को बनाए रखने की अपील की। उनका सुझाव था कि परिवार के सदस्य सप्ताह में कम से कम एक बार साथ बैठें और समय बिताएं। बच्चों के संस्कार केवल स्कूल से नहीं बल्कि घर के माहौल से भी बनते हैं, इसलिए परिवार की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है।

