एक मजबूत और स्वस्थ लोकतंत्र में, राष्ट्र से जुड़े गंभीर विषयों पर विपक्ष द्वारा किया गया आंदोलन सदैव उचित माना जाता है। यह सरकार की मनमानी पर अंकुश लगाने और लोकतांत्रिक संतुलन बनाए रखने का एक आवश्यक माध्यम है।
लेकिन सत्ता के सिंहासन की प्राप्ति के लिए, विदेश से आयातित या देश में कृत्रिम रूप से निर्मित मुद्दों पर हर समय आंदोलनरत रहने वाले नेताओं और पार्टियों के लिए ही हमारे प्रधानमंत्री ने संसद में “आंदोलनजीवी” शब्द का सृजन किया था। इसके माध्यम से उन्होंने राष्ट्र को ऐसे सत्ता-पिपासु तत्वों के प्रति सजग किया।
जनता द्वारा सत्ता से दूर किए जाने और सत्ता में वापसी के प्रत्येक प्रयास में असफल रहने के बाद, हताशा, निराशा और कुंठा से ग्रस्त इन नेताओं और पार्टियों ने अब विषयविहीन आंदोलनों का मार्ग अपना लिया है। बार-बार जनता द्वारा अस्वीकार किए जाने के बाद इन्हें यह गलतफहमी हो गई है कि देश की प्रगति और विकास को अस्थिर करना, हिंसा फैलाना, अराजकता उत्पन्न करना और संसद को बार-बार बाधित करना ही इन्हें सत्ता तक पहुँचा देगा।
ऐसे नेताओं और पार्टियों पर यह कहावत पूरी तरह चरितार्थ होती है—
“जब सास बहू से कहती है कि आटा गूँथते हुए हिलती क्यों है।”
इन आंदोलनजीवियों को तो केवल आंदोलन करने का बहाना चाहिए। भारत में जनसंख्या विस्फोट के कारण, कुछ पैसे बाँटकर भीड़ जुटाना इनके लिए कोई कठिन कार्य नहीं है। यह तब स्पष्ट हो जाता है जब आंदोलनकारियों के बीच जाकर उनसे पूछा जाए कि आंदोलन किस विषय पर है—तो वे इधर-उधर मुँह छिपाते नज़र आते हैं। इससे साफ़ समझ आता है कि यह निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा किया गया विषयविहीन आंदोलन है।
इन आंदोलनजीवी नेताओं और पार्टियों के मंतव्य और गंतव्य का पर्दाफाश एक बार फिर तब हो गया, जब राहुल गांधी के नेतृत्व में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान अधिकांश विपक्षी दलों ने पिछले दस दिनों से संसद को ठप कर रखा। लगातार शोर-शराबा, बैनर-पोस्टर लहराना, कुर्सियों पर चढ़ना और आसन की ओर काग़ज़ फाड़कर फेंकना—ये सब लोकतांत्रिक मर्यादाओं के खुले उल्लंघन हैं।
हद तो तब हो गई जब प्रधानमंत्री के उत्तर से पहले, एक अघोषित हमले जैसी साजिश के तहत महिला सांसदों को प्रधानमंत्री की सीट तक पहुँचाने और सत्ता पक्ष की सीटों पर जाकर एक अप्रत्याशित घटना को अंजाम देने का प्रयास किया गया।
अब अमेरिका के साथ संभावित ट्रेड डील को किसानों के अहित का बहाना बनाकर, किसानों को गुमराह करने के उद्देश्य से योगेंद्र यादव और राकेश टिकैत जैसे आंदोलनकारियों को आगे कर, संपूर्ण इंडी गठबंधन एक नए, स्व-निर्मित आंदोलन की तैयारी में जुटा हुआ है। यह एक पूरी तरह काल्पनिक और स्वप्निल मुद्दा है, जिसके माध्यम से विपक्ष यह सोच रहा है कि शायद किसानों को भड़काकर सड़कों पर उतार लिया जाए और सरकार को सत्ताच्युत किया जा सके।
मैंने इस आंदोलन को “विषय-शून्य” इसलिए कहा है क्योंकि सरकार और उसके मंत्री अनगिनत बार स्पष्ट कर चुके हैं कि अमेरिका के साथ किसी भी ट्रेड डील में भारतीय किसानों और उनके उत्पादों के हितों का पूरा ध्यान रखा गया है, और ऐसी कोई डील किसानों के अहित में न तो की जा रही है और न ही प्रस्तावित है।
इन आंदोलनजीवियों को भ्रम है कि किसानों को भावनात्मक रूप से भड़काकर वे अतीत की तरह विदेशी प्रायोजित टूलकिट आधारित किसान आंदोलन, सीएए–एनआरसी पर आधारित शाहीनबाग आंदोलन, जातीय जनगणना, भाषा विवाद, ईवीएम-वोट चोरी जैसे आधारहीन आरोप, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थगित यूजीसी नियम, पेगासस, हिंडनबर्ग, बीबीसी जैसे विदेश-निर्मित मुद्दों के सहारे देश को अस्थिर करने के अपने कुचक्र में सफल हो जाएँगे।
लेकिन भारत की जनता अब बहुत समझदार हो चुकी है। वह सब समझ रही है। विपक्ष बार-बार आह्वान कर यह चाहता है कि भारत में भी बांग्लादेश, श्रीलंका या नेपाल जैसी स्थिति उत्पन्न हो और वर्तमान सरकार अपदस्थ हो जाए—पर जनता जानती है कि “विकसित भारत” की नींव अब मजबूत हो चुकी है और वह सत्ता प्राप्ति के इन कुत्सित प्रयासों में आने वाली नहीं है।
पिछले आम चुनाव में एक बार “संविधान और लोकतंत्र खतरे में है” जैसे झाँसे में जनता आ गई थी, लेकिन शीघ्र ही विपक्ष के हथकंडों को समझते हुए हरियाणा, दिल्ली, महाराष्ट्र और बिहार के विधानसभा चुनावों में उन्हें करारी शिकस्त देकर इस मुद्दे की हवा निकाल दी।
आजकल विपक्ष का एक और प्रयास यह भी है कि वर्तमान सरकार को हिंदू-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी ठहराया जाए। लेकिन जनता भली-भाँति समझ चुकी है कि भारत का हर धर्म और राष्ट्र किसके हाथों में सुरक्षित है और कौन तुष्टिकरण की राजनीति कर देश की जड़ों को खोखला करता है। यही कारण है कि जनता बार-बार एनडीए गठबंधन को सत्ता के शीर्ष पर बैठाकर “विकसित भारत” की संरचना को साकार होते देखना चाहती है।
-राकेश शर्मा

