America Vs Iran Army: ईरान में हालिया विरोध प्रदर्शनों के बाद तेहरान और वॉशिंगटन के रिश्तों में जबरदस्त तनाव देखने को मिल रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कड़ी चेतावनियों के बीच अमेरिका ने ईरान के नजदीक अपना सबसे खतरनाक नौसैनिक बेड़ा तैनात कर दिया है। ऐसे हालात में अमेरिका और ईरान की सैन्य ताकत की तुलना एक बार फिर चर्चा में आ गई है। जहां अमेरिका को दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति माना जाता है, वहीं ईरान मध्य-पूर्व में एक मजबूत और प्रभावशाली क्षेत्रीय ताकत है। दोनों देशों की सैन्य क्षमताएं, रणनीति और संसाधन एक-दूसरे से काफी अलग हैं।
रक्षा बजट में जमीन-आसमान का अंतर
सैन्य खर्च के मामले में अमेरिका और ईरान के बीच भारी फासला है। अमेरिका हर साल करीब 850 से 900 अरब डॉलर अपने रक्षा बजट पर खर्च करता है, जो वैश्विक सैन्य खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा है। इसके उलट ईरान का रक्षा बजट लगभग 15 से 25 अरब डॉलर के बीच रहता है। यही वजह है कि अमेरिका अत्याधुनिक हथियारों और नई सैन्य तकनीक में लगातार निवेश करता है, जबकि ईरान सीमित संसाधनों में अपनी सुरक्षा नीति तैयार करता है।
सैनिकों की संख्या और संगठन
अमेरिकी सेना में करीब 13 लाख सक्रिय सैनिक हैं। रिजर्व और नेशनल गार्ड को जोड़ दिया जाए तो यह संख्या 20 लाख से ज्यादा हो जाती है। वहीं ईरान के पास लगभग 6 लाख सक्रिय जवान हैं, जिनमें नियमित सेना के साथ-साथ रिवोल्यूशनरी गार्ड (IRGC) भी शामिल हैं। इसके अलावा ‘बसीज’ जैसे अर्धसैनिक संगठन संकट के समय बड़ी भूमिका निभाते हैं।
थल सेना की ताकत
अमेरिकी थल सेना आधुनिक टैंक, बख्तरबंद वाहन और हाई-टेक हथियार प्रणालियों से लैस है। हजारों उन्नत टैंक और ऑटोमेटेड आर्टिलरी सिस्टम उसकी ताकत हैं। दूसरी ओर, ईरान की थल सेना संख्या में मजबूत जरूर है, लेकिन तकनीकी रूप से अपेक्षाकृत पुरानी मानी जाती है। हालांकि ईरान की सबसे बड़ी ताकत उसका भौगोलिक लाभ और रक्षात्मक रणनीति है।
वायु शक्ति में अमेरिका आगे
हवाई ताकत के मामले में अमेरिका का पलड़ा बेहद भारी है। उसके पास 13,000 से अधिक सैन्य विमान हैं, जिनमें F-35 और F-22 जैसे स्टील्थ फाइटर जेट शामिल हैं। ईरान के पास करीब 400 से 600 लड़ाकू विमान हैं, जिनमें से कई पुराने मॉडल के हैं। हालांकि ईरान ने हाल के वर्षों में ड्रोन तकनीक पर खासा जोर दिया है, जो उसकी वायु रणनीति का अहम हिस्सा बन चुकी है।
नौसेना की तुलना
अमेरिकी नौसेना को दुनिया की सबसे शक्तिशाली नौसेना माना जाता है। इसके पास 11 से अधिक एयरक्राफ्ट कैरियर, परमाणु पनडुब्बियां और सैकड़ों आधुनिक युद्धपोत हैं, जिनकी तैनाती पूरी दुनिया में की जा सकती है। इसके विपरीत ईरान की नौसेना मुख्य रूप से पर्शियन गल्फ और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज तक सीमित है और उसकी रणनीति छोटे, तेज और अप्रत्याशित हमलों पर आधारित है।
मिसाइल ताकत में ईरान की खास पहचान
ईरान की सबसे बड़ी सैन्य ताकत उसकी मिसाइल क्षमता मानी जाती है। उसके पास हजारों शॉर्ट और मीडियम रेंज बैलिस्टिक मिसाइलें हैं, जो मध्य-पूर्व में मौजूद अमेरिकी ठिकानों के लिए गंभीर खतरा बन सकती हैं। अमेरिका के पास भी अत्याधुनिक क्रूज और बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम हैं, जिनकी सटीकता और रेंज कहीं ज्यादा है।
ड्रोन और अप्रत्यक्ष युद्ध की रणनीति
ईरान ने ड्रोन युद्ध में विशेष दक्षता हासिल की है। कम लागत वाले लेकिन असरदार ड्रोन उसकी सैन्य नीति का अहम हिस्सा हैं। इसके साथ ही ईरान अप्रत्यक्ष युद्ध की रणनीति अपनाता है, जिसमें प्रॉक्सी समूहों और सीमित हमलों का इस्तेमाल किया जाता है। अमेरिका की रणनीति इसके उलट सीधी, तकनीक आधारित और तेज सैन्य कार्रवाई पर केंद्रित रहती है।
वैश्विक बनाम क्षेत्रीय प्रभाव
अमेरिका की सैन्य पहुंच वैश्विक स्तर पर फैली हुई है। यूरोप, एशिया और मध्य-पूर्व में उसके सैन्य अड्डे हैं और नाटो जैसे मजबूत सैन्य गठबंधन उसका समर्थन करते हैं। ईरान की पहुंच मुख्य रूप से मध्य-पूर्व तक सीमित है, लेकिन इस क्षेत्र में उसका प्रभाव काफी गहरा माना जाता है।
रणनीति और ताकत का अंतर
अमेरिका की सैन्य नीति दुनिया के किसी भी हिस्से में ताकत दिखाने यानी ‘फोर्स प्रोजेक्शन’ पर आधारित है। वहीं ईरान की रणनीति ‘डिटरेंस’ यानी दुश्मन को नुकसान पहुंचाने की क्षमता दिखाकर युद्ध से रोकने की है। पारंपरिक युद्ध की स्थिति में अमेरिका तकनीक, संसाधन और वैश्विक समर्थन के कारण कहीं अधिक शक्तिशाली है, जबकि ईरान मिसाइल, ड्रोन और अप्रत्यक्ष युद्ध के जरिए उसे चुनौती देने की क्षमता रखता है।
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