AI Impact Summit 2026: दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित AI Impact Summit 2026 का मकसद भारत की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस क्षमता को दुनिया के सामने दिखाना था। यहां सरकारी एजेंसियां, स्टार्ट-अप्स, विश्वविद्यालय और विदेशी टेक कंपनियां नई-नई AI तकनीकें प्रदर्शित कर रहे थे। लेकिन तीसरे ही दिन एक स्टॉल को लेकर ऐसा विवाद खड़ा हुआ जिसने पूरे समिट की दिशा बदल दी। मामला था ग्रेटर नोएडा की गलगोटिया यूनिवर्सिटी द्वारा प्रदर्शित ORION नाम के रोबोट डॉग का, जिसे लेकर दावा, सवाल, कार्रवाई, राजनीति और सोशल मीडिया ट्रोलिंग सब एक साथ देखने को मिला। आसान तरीके से समझिए पूरे घटनाक्रम को…
विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
समिट के दौरान गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने अपने स्टॉल पर एक रोबोटिक डॉग और ड्रोन मॉडल प्रदर्शित किए। प्रस्तुति में बताया गया कि यह उनके AI इकोसिस्टम और सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की इन-हाउस इनोवेशन है। यूनिवर्सिटी ने पहले यह भी कहा कि उसने लगभग 350 करोड़ रुपये के निवेश से AI सिस्टम विकसित किया है, जिसके तहत ये रोबोट बनाए गए हैं। समस्या तब शुरू हुई जब कार्यक्रम के वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो गईं। तकनीकी विशेषज्ञों और कुछ यूजर्स ने दावा किया कि रोबोट डॉग बाजार में पहले से उपलब्ध विदेशी मॉडल से मिलता-जुलता है। यह चीनी डिवाइस है। इसे खुद विकसित करने का दावा सही नहीं है। यहीं से विवाद भड़क गया।
प्रशासन ने क्या कार्रवाई की?
जैसे ही मामला बढ़ा, समिट प्रशासन ने इसे गंभीर नियम उल्लंघन माना। बताया गया कि तीसरे दिन गलगोटिया यूनिवर्सिटी के पवेलियन की बिजली काट दी गई। इससे पहले स्टॉल खाली करने का आदेश दिया गया और प्रतिनिधियों को परिसर छोड़ने को कहा गया। हालांकि शुरू में स्टॉल टीम ने कहा था कि उन्हें औपचारिक रूप से हटाए जाने की जानकारी नहीं दी गई। लेकिन बाद में गलगोटिया की टीम स्टॉल खाली करती नजर आई।
यूनिवर्सिटी की सफाई
विवाद बढ़ने पर गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने प्रतिक्रिया दी। यूनिवर्सिटी की कम्युनिकेशन्स प्रोफेसर नेहा सिंह ने कहा कि इंटरनेट पर गलतफहमी फैल गई। उन्होंने कहा कि हमने कभी यह दावा नहीं किया कि उन्होंने रोबोट डिजाइन और मैन्युफैक्चर किया। हम इसे खरीदकर लाए थे ताकि छात्रों को AI तकनीक के बारे में समझाया जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि “डेवलपमेंट” का मतलब हमेशा खुद मशीन बनाना नहीं होता, बल्कि उस पर प्रोग्रामिंग, इंटीग्रेशन और प्रयोग भी होता है।
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संस्थान की आधिकारिक प्रतिक्रिया
यूनिवर्सिटी का कहना था कि छात्रों को प्रैक्टिकल AI सीखाने के लिए ग्लोबल टेक्नोलॉजी का उपयोग किया गया। संस्थान दुष्प्रचार से आहत है। इसका मकसद नवाचार और कौशल विकास था, न कि झूठा दावा।
गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने मांगी माफी
इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट से सार्वजनिक रूप से बाहर निकलने के बाद, गलगोटिया विश्वविद्यालय ने अपने पवेलियन में प्रदर्शित एक चीनी निर्मित रोबोटिक कुत्ते को लेकर हुई भ्रम की स्थिति के लिए माफी मांगी है. यूनिवर्सिटी की ओर से कहा गया है कि एक प्रतिनिधि ने कैमरे पर होने के उत्साह में तथ्यात्मक रूप से गलत जानकारी दी थी।
विश्वविद्यालय ने 18 फरवरी को जारी एक बयान में कहा कि हम गैल्गोटिया विश्वविद्यालय में हाल ही में आयोजित एआई शिखर सम्मेलन में हुई गड़बड़ी के लिए तहे दिल से माफी मांगते हैं। पवेलियन में मौजूद हमारी एक प्रतिनिधि को उत्पाद की तकनीकी जानकारी नहीं थी और कैमरे के सामने होने के उत्साह में उन्होंने गलत जानकारी दे दी, जबकि उन्हें प्रेस से बात करने का अधिकार नहीं था।
दूसरा विवाद: ड्रोन सॉकर
रोबोट डॉग विवाद शांत भी नहीं हुआ था कि एक और आरोप सामने आया। यूथ कांग्रेस ने दावा किया कि यूनिवर्सिटी जिस भारत के पहले ड्रोन सॉकर का श्रेय ले रही है, वह वास्तव में कोरिया का स्ट्राइकर V3 ARF मॉडल है। इसके बाद मुद्दा सीधे आत्मनिर्भर भारत बनाम विदेशी तकनीक की बहस में बदल गया।
सरकार की प्रतिक्रिया
केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि अगर किसी ने गलत किया है तो तुरंत कार्रवाई हुई है। लेकिन इस वजह से अन्य अच्छे AI समाधानों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
विपक्ष का हमला
कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि इससे देश की छवि को नुकसान हुआ है। राहुल गांधी ने समिट को “पीआर इवेंट” बताते हुए कहा कि विदेशी उत्पादों को भारतीय बताकर दिखाया जा रहा है।
सोशल मीडिया और बॉलीवुड की एंट्री
मामला सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ और मनोरंजन जगत भी इसमें कूद पड़ा। गीतकार स्वानंद किरकिरे ने मजाकिया पोस्ट किया, “गला घोंट दिया यूनिवर्सिटी”। अभिनेता रणवीर शौरी ने तंज कसते हुए लिखा कि टेक्नोलॉजी अपनाने को लेकर दुनिया भर में ऐसा होता रहा है। इसके बाद मीम्स और ट्रोलिंग की बाढ़ आ गई।
असल विवाद क्या है?
दरअसल इस पूरे मामले का मूल मुद्दा तकनीकी है। AI और रोबोटिक्स में तीन अलग-अलग चीजें होती हैं। मैन्युफैक्चरिंग, डिजाइन/इंजीनियरिंग और इंटीग्रेशन और प्रोग्रामिंग तैयार मशीन पर AI सिस्टम विकसित करना। यूनिवर्सिटी का कहना है कि वह तीसरा काम कर रही थी यानी छात्रों को प्लेटफॉर्म पर AI प्रोग्रामिंग सिखा रही थी। आलोचकों का आरोप है कि प्रस्तुति इस तरह की गई जिससे लगा कि मशीन भी वही बना रहे हैं। यहीं से भ्रम की स्थिति पैदा हुई।
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यह विवाद इतना बड़ा क्यों बना? इस घटना के बड़े होने की तीन वजहें हैं-
राष्ट्रीय प्रतिष्ठा
AI समिट अंतरराष्ट्रीय स्तर का कार्यक्रम था, इसलिए मामला भारत की टेक छवि से जुड़ गया।
आत्मनिर्भर भारत बहस
यदि विदेशी मशीन को भारतीय बताकर पेश किया गया, तो यह नीति-स्तर का मुद्दा बनना स्वाभाविक था।
सोशल मीडिया
वायरल वीडियो ने तकनीकी चर्चा को तुरंत राजनीतिक और भावनात्मक बहस में बदल दिया।
आगे क्या असर हो सकता है?
यह विवाद कुछ महत्वपूर्ण सवाल छोड़ गया है। क्या शैक्षणिक संस्थान डेमो प्लेटफॉर्म का उपयोग करते समय स्पष्ट डिस्क्लेमर दें? ‘AI रिसर्च’ और ‘AI प्रोडक्ट’ के दावों के लिए मानक तय होंगे? सरकारी टेक एक्सपो में वेरिफिकेशन प्रक्रिया कड़ी होगी? संभव है कि भविष्य में ऐसे आयोजनों में टेक्निकल ऑडिट और प्रमाणन अनिवार्य कर दिए जाएं।

