Women Reservation Bill: बीते दिन शुक्रवार को लोकसभा के विशेष सत्र में महिला आरक्षण बिल पर वोटिंग हुई। जहां सांसदों ने वोट किया। इसके पक्ष में 298 और विपक्ष में 230 वोट पड़े। लेकिन बिल को पारित कराने के लिए दो-तिहाई वोटों की जरूरत थी। जिसके चलते सरकार बिल को पारित नहीं करा पाई। इस बीच न्यूज इंडिया 24X7 के पोडकास्ट में फिलॉसोफर और लेखक आचार्य प्रशांत ने संबंधित बिल पर आपने विचार रखे। यहां देखें पूरा इंटरव्यू 👇
उन्होंने कहा कि ये जो 100 से ऊपर अतिरिक्त महिलाएं अब पहुंचेंगी लोकसभा में विशेषकर तो ये कहां से आएंगी? जमीन से उसको उठने नहीं दे रहे और आसमान पर उसको आरक्षण दे रहे हो। यह कौन सी बात है? भाई तुमको वो सरपंच फिनोमिना पता है ना? वो ताकतवर बाहुबली पुरुषों की पत्नियां बेटियां बहुएं होंगी जो यहां पर आ जाएंगी या फिर लेकिन दो चार आठ 10 सशक्त और जागृत महिलाओं के संसद में पहुंचने से बात नहीं बनती है। हमें और ज्यादा महिलाएं चाहिए जो नई हो विद्रोही हो खुद ताकतवर हो। पुरुषों की बैसाखियों पर चलकर के संसद में ना पहुंचिए।
क्या केवल आरक्षण से आएगा बदलाव?
वास्तविक बात यह है कि यहां जमीन से, हमारे घरों से, हमारे मोहल्लों से, हमारे परिवारों से ऐसी लड़कियां हम पैदा तो होने दें, उभरने तो दें, निकलने तो दें। हम अपने आप को बता देंगे कि हम तो महान हैं। क्योंकि हमारी संसद में 33% महिलाएं हैं। वहां संसद में महिलाएं बैठी होंगी और जमीन पर हिंसक क्रूर रक्त रंजित भ्रूण हत्या का कुकृत चलता रहेगा। लाखों करोड़ों की तादाद में होता रहेगा। दहेज हत्याएं होती रहेंगी। यद्यपि मैं बहुत खुश रहूंगा। 33% क्या वहां पर 40 50 60% हो जाए महिलाएं? नमस्ते आचार्य जी। महिला आरक्षण बिल पर अभी संसद में चर्चा चल रही है। तो मैं सोच रहा था एक और तो हमारा समाज है, हमारी व्यवस्था है, हमारी संस्कृति है और इसी संस्कृति के कुछ प्रचलित गुरु लोग हैं। अगर हम इन गुरु लोगों को इस संस्कृति का प्रतिनिधि माने तो पिछले एक साल में खासकर उत्तर भारत में लगातार हम इनकी ओर से महिलाओं के प्रति पिछड़ी और आपत्तिजनक टिप्पणियां सुनते आए हैं।
परिवारवाद का बढ़ सकता है असर
तो यही व्यवस्था है जो एक तरफ इस तरह की टिप्पणियां करती है और यही व्यवस्था यही समाज यही संस्कृति महिला आरक्षण की भी बात कर रही है और उसका समर्थन भी करती हुई दिख रही है तो मैं समझ नहीं आ रहा मुझे ये बात मैं समझना चाहूंगा आपसे आप इस पर क्या कहना चाह नहीं तुम्हें विरोधाभास दिख रहा है तुम इसलिए उलझ रहे हो विरोधाभास है नहीं ना देखो 1215% लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व रहता है और यह वो है जो चुनकर आ पाती हैं और टिकट भी जो सब बड़ी पार्टियां है ना वो इसी अनुपात में देती हैं 12 13 15% इसी रेंज में और बल्कि जो वर्तमान लोकसभा है इसमें तो पिछली लोकसभा से कम महिलाएं हैं।
अब क्या होने वाला है अब अचानक से यह जो 60 70 महिलाएं रहती आई हैं लोकसभा में आमतौर पर इनकी संख्या हो जानी है लगभग 180 नंबर बढ़ाने की बात चल रही है सीटों में मैं भी मान रहा हूं कि 545 ही है 545 भी है तो 180 हो जानी है तो रहती कितनी है आमतौर पर 60 70 अब वो हो जानी है 180 तो बाकी ये जो 100 से ऊपर महिलाएं हैं। ये कहां से आएंगी लोकसभा में? कहां से आएंगी? अचानक से तो नहीं पैदा होंगी। चलो मैं तुम्हें एक हिंट देता हूं।
जमीनी हकीकत और सामाजिक विरोधाभास
जो पुरुष एमपी होते हैं उनमें बस 25% ऐसे होते हैं जिनको आप किसी डायनेस्टिक लीनिएज से आया बोल सकते हैं। जिनको आप वंशवाद या परिवारवाद का परिणाम बोल सकते हो। ठीक है? कि यह पुरुष एमपी है और यह अभी लोकसभा में इसलिए मौजूद है क्योंकि इसके पिता या इसके ताऊ या कोई और पहले से ही नेता हैं या पार्टी में हैं या एमपी हैं वगैरह-वगैरह कुछ। तो पुरुषों में वो अनुपात रहता है 25% का। महिलाओं में वो अनुपात रहता है लगभग 50% का। जो महिला एमपी हैं जो चुनकर आती हैं वह लगभग 50% माने लगभग आधी ऐसी होती हैं जो किसी राजनैतिक परिवार से ही उठकर आ रही होती हैं। वो किसी राजनैतिक परिवार की पत्नी बेटी बहू वगैरह हैं। ठीक है? तो ये मैंने तुम्हें हिंट दे दिया।
अब बताओ कि अगर यह 33% आरक्षण हो गया तो यह जो 100 से ऊपर अतिरिक्त महिलाएं अब पहुंचेंगी संसद में लोकसभा में विशेषकर तो ये कहां से आएंगी? यही अनुपात और बढ़ेगा। इन्हीं फैमिली से इन्हीं फैमिली से आएंगी। तो ये जो इन फैमिली से आ रही हैं ये कोई महिला सशक्तिकरण की मिसाल तो है नहीं। यह तो बल्कि जो पुराना पारंपरिक ढांचा रहा है पितृसत्तात्मक यह तो उसी का उदाहरण भी है और उसी को आगे बढ़ाने का काम भी करने वाली हैं। तो यही लोग हैं जो और पहुंचेंगे। तुमको विरोधाभास यह दिख रहा था कि एक ओर तो जो यह व्यवस्था है और संस्कृति है और सत्ता है यह तमाम तरीकों से महिलाओं को दबाने का काम करती है। ठीक है? यही कहा ना तुमने और तुमने उसके पक्ष में उदाहरण दिया।
ये सब जो गुरु लोग हैं कि देखो यही संस्कृति यही अवस्था इन गुरुओं का प्रत्यक्ष परोक्ष रूप से इतना समर्थन करती रहती है और गुरु लोग अभद्र टिप्पणियां करते रहते हैं महिलाओं के ऊपर और पिछड़ी बातें करते रहते हैं महिलाओं को लेकर के तो एक और तो व्यवस्था इन गुरुओं को प्रोत्साहित करती है और गुरुओं को नमन करती है और गुरु महिलाओं को लेकर के पिछड़ी बातें करते हैं और दूसरी ओर तुमने यह देखा कि यही व्यवस्था है जो अब ये आरक्षण का विधेयक लेकर के आ रही है और समाज उसका समर्थन कर रहा है और इतनी इतनी आवाजें उठ रही हैं जो कह रहे हैं हां ये अच्छा काम हो रहा है। तो तुम्हें इसमें कंट्राडिक्शन नजर आया और वहां से तुम्हारा ये सवाल उठ रहा है कि भाई ये कैसे हो सकता है कि ये व्यवस्था अगर वास्तव में महिलाओं की पक्षधर होती तो महिलाओं को लेकर के ये इतनी पिछड़ी बातें क्यों करती और लेकिन अब देखो ये तो रिजर्वेशन भी लेकर के आ रहे हैं। इसमें कोई कंट्राडिक्शन नहीं है।
‘सरपंच पति’ जैसी स्थिति का डर
अच्छे से समझ लो ये महिलाओं को बिल्कुल एक चेहरे की तरह मौजूद रखा जा सकता है संसद में बिना किसी भी तरह के महिला सशक्तिकरण के। भाई तुमको सरपंच फिनोमिना पता है ना? जी जी सुना है मैंने कि जो सीटें पंचायतों में आरक्षित हो जाती है महिलाओं के लिए तो वहां पर जो पुराने रसूखदार लोग होते हैं वो अपनी बेटी पत्नी बहू किसी को खड़ा कर देते हैं वो सरपंच बन जाती है कागजी तौर पर वास्तविक सरपंच तो पुरुष ही रहता है। इसी तरीके से तुम को अभी मैंने आंकड़ा दिया कि 50% तो जो महिलाएं संसद पहुंच रही हैं वह पहुंची ही इसीलिए रही है क्योंकि उनको पुरुषों ने भेजा हुआ है। उनके उनके पिता के कारण पहुंच रही है।
उनके पति के कारण पहुंच रही हैं। और और यह 50% का आंकड़ा पुरुषों में 25% ही है। वंशवाद वहां भी चलता है। पर इतना तगड़ा नहीं चलता वहां पर। और यही सब जो पितृसत्तात्मक वंशवाद है, यह और बढ़ जाएगा इस रिजर्वेशन के बाद। तो इसमें जो पुरानी परंपरा और व्यवस्था है उसको किसी तरह की हानि नहीं होने वाली बल्कि वह तो और प्रसन्न हो जाएगी क्योंकि अब उसको यह कहने को भी मिल जाएगा कि देखो हम तो कितने उदारवादी हैं और हम महिलाओं के पक्षधर हैं। हमने उनको 33% आरक्षण दिया। इतना ही नहीं विदेशों में भी अब जाकर के डुगडुगी बजाई जा सकती है कि देखो भारत में तो संसद में महिलाओं की 33% उपस्थिति है। लेकिन वो महिलाएं होंगी वही सब जो कहीं से भी हम किसी तरह का कोई डिसरप्शन नहीं लाने वाली पुरानी व्यवस्था में।
हम वो ताकतवर बाहुबली पुरुषों की पत्नियां बेटियां बहुएं होंगी जो यहां पर आ जाएंगी या फिर कई बार सजावटी शोपीस हम जैसे अभिनेत्रियां वगैरह उनको लाकर के संसद में रख दिया जाएगा। मैं मैं सब प्रकार की कलाओं का सम्मान करता हूं। अभिनेत्रियों का भी सम्मान करता हूं। लेकिन अभिनेत्री और अभिनेत्री में भी अंतर होता है। एक अभिनेत्री होती है जो संसद में इसलिए पहुंचती है क्योंकि उसके भीतर कोई वास्तविक इच्छा होती है समाज कल्याण की देश को आगे बढ़ाने की और एक अभिनेत्री होती है जिसको संसद सिर्फ इसलिए पहुंचाया जा जाता है क्योंकि वो कद काठी से आकर्षक है और एक तरह का ग्लैमर पॉइंट है। यह सुनने में थोड़ी सी कड़वी लग सकती है बात पर जो तथ्य है उसको बोलना पड़ेगा। तो यही सब है महिलाओं के नाम पर इस प्रकार के ही एक झुंड को संसद पहुंचाया जा सकता है और मुझे बड़ी आशंका है इसकी और कहने को यह भी हो जाएगा कि देखो अब भारत की संसद में इतनी महिलाएं आ गई हैं। हम तो वास्तव में बड़े उदार लोग हैं। बड़े अच्छे लोग हैं। लेकिन वह सब महिलाएं वो गड़बड़ वाली ही होंगी।
सब नहीं तो उसमें से 70 80% मैं सब क्यों बोलूं? अपवाद हमेशा होते हैं। भारतीय संसद में कुछ बहुत अच्छी महिलाएं भी पहुंचती रही हैं। हमें उनका सम्मान करना चाहिए। मैं उनका सम्मान भी करता हूं। लेकिन दो चार 8 10 सशक्त और जागृत महिलाओं के संसद में पहुंचने से बात नहीं बनती है। हमें और ज्यादा महिलाएं चाहिए जो नई हो, विद्रोही हो। खुद ताकतवर हो। पुरुषों की बैसाखियों पर चलकर के संसद में ना पहुंची हो। हमें ऐसी महिलाएं चाहिए। और वैसी महिलाएं तब तक नहीं पहुंचेंग जब तक समाज वैसी महिलाओं को जन्मने ही नहीं देगा और पनपने ही नहीं देगा। भाई इसी मिट्टी से वो महिला उठनी है ना जो कुछ भी करेगी आगे जाकर के।
अब ऊपर वहां आसमान में आपने संसद बैठाई है। वह तो एक वर्टिकल डेस्टिनेशन है। आप कह रहे हो मैं वहां पर बैठा देना चाहता हूं 33% महिलाओं को। लेकिन वहां कैसे बैठा दोगे जब वो जमीन से उठ ही नहीं रही है। एक पेड़ है। ठीक है? आप कह रहे हो वहां 33% जो फल हैं वो वो वो स्त्री फल लगने चाहिए। ठीक है? और उस पेड़ की आप जो जड़े हैं वह कांटे दे रहे हो। जमीन से जब सशक्त महिला उठेगी ही नहीं तो संसद में भी जो महिला पहुंचेगी भले ही वो 33% आरक्षण हो तो संसद में भी जो महिला पहुंचेगी वो अशक्त ही होगी, दुर्बल ही होगी। पुरुषों पर आश्रित ही महिला होगी जो वहां पर पहुंच जाएगी। उसको भी एक तरह की कृपा दिखा के वहां पहुंचा दिया जाएगा। और यह जो कृपा है यह तो पुरानी पितृसत्ता की पहचान है ही कि महिला को हम बहुत कुछ दे सकते हैं पर हम देंगे। हमारी कृपा से उसको मिलेगा।
तो भाई वो कोई पुरानी पार्टी कैडर थी तो सीट भरने के लिए उसको टिकट दे दिया। आप देखो ना आप बड़े-बड़े नाम जो आज भी संसद में हैं महिला नाम उनमें आप जरा सा याद करोगे और दिख जाएगा। तो यह तो सब वही है। पत्नियां बेटियां ही है जो वहां पर हैं। तो वह तो पुरुषों का ही वर्चस्व है जो अभी आगे बढ़ा जा रहा है स्त्रियों के माध्यम से। है ना? वास्तविक बदलाव वहां आ ही नहीं सकता। वास्तविक बदलाव ऊपर नहीं आ सकता आरक्षण देने से। यद्यपि मैं बहुत खुश होऊंगा। 33% क्या वहां पर 40 50 60% हो जाए महिलाएं। 60% से याद आया रोहंडा वहां 60% से ज्यादा हैं महिलाएं संसद में। लेकिन फिर भी वह देश महिलाओं के प्रति अपराध के मामले में बहुत पिछड़ा हुआ देश है। तो वहां ऊपर महिलाओं को बैठा देने से कुछ नहीं होता।
सामाजिक सुधार की जरूरत
वास्तविक बात यह है कि यहां जमीन से, हमारे घरों से, हमारे मोहल्लों से, हमारे परिवारों से ऐसी लड़कियां हम पैदा तो होने दें, उभरने तो दें, निकलने तो दें जो इस लायक हो कि अपने बूते पर दुनिया में, जिंदगी में, समाज में, संसद में कुछ करके दिखाएं। और वैसी बेटियां हम जमीन से उठने नहीं दे रहे हैं। अब वहां पर वह फिर वह परंपरा, संस्कृति और गुरु लोग आ जाते हैं क्योंकि उनकी पहुंच सीधे घर के अंदर तक होती है। तो घरों से तो आप पैदा कर रहे हो बिल्कुल शांत आज्ञाकारिणी सुशील कन्याएं। हम ये क्या चुनाव लड़ पाएंगी? ये क्या अपने बूते पर समाज की कुरीतियों से और दमनकारी पुरुषों से क्या ये लोहा ले पाएंगी अपने दम पर? जब आप उनको कह रहे हो कि तुम्हें बाहर नहीं निकलना, तुम्हें यह नहीं करना, तुम्हें वह नहीं करना, तुम्हारी अपनी कोई आवाज नहीं, तुम्हारी अपनी कोई पहचान नहीं। तुम्हारे जीवन के सारे निर्णय तुम्हारा परिवार लेगा।
तुम कहां पढ़ोगी, कहां जाओगी, क्या पहनोगी, किससे विवाह करोगी? ये तुम्हारे सारे निर्णय कोई और लेगा। इस तरह की लड़कियां तो आप समाज से चाह रहे हो कि पैदा हो। और इसी को फिर आप कहते हो कि हमारी संस्कृति की महानता है कि लड़की तो दबी हुई ही रहे। कभी वो पिता पर आश्रित रहे, कभी पति पर आश्रित रहे, कभी, पुत्र पर आश्रित रहे। इसको आप कहते हो ये हमारी संस्कृति की महानता है। ऐसी लड़कियां तो आप जमीन से पैदा कर रहे हो और आपने अब ये व्यवस्था कर दी कि संसद में 33% महिलाएं होंगी। तो ये तो विचारणीय है फिर कि जब जमीन से ऐसी महिलाएं उठेंगी ही नहीं तो संसद में वो 33% पहुंच कौन रही हैं? वो कोई नहीं पहुंच रही है। वो पुरुषों द्वारा ही नॉमिनेटेड पुरुषों द्वारा ही तैनात महिलाएं हैं जो वहां पहुंच जाएंगी। जिनको पुरुषों ने ही नियुक्त कर दिया है कि तुम वहां पर जाकर के अब बैठ जाओ। तो दिखाई ऐसा देगा कि महिला बैठी हुई है। पर वो महिला कुछ नहीं होगी।
वो कठपुतली होगी और उस कठपुतली की डोर पुरुषों के ही हाथ में होगी या पुरानी परंपरा के ही हाथ में होगी। हां जब वो वहां बैठ जाएगी तो नजारा अच्छा लगेगा। ऑप्टिक्स अच्छी हो जाएंगी। देखने में ऐसा लगेगा कि देखो इतनी सारी महिलाएं वहां संसद में पहुंच गई पर वो महिलाएं अपने आप में जागृत महिलाएं नहीं होंगी। वो अपने आप में ऐसी नहीं होंगी कि जिनको आप कह सको कि वो किसी भी पुराने ढांचे को गिरा करके एक नई ताजी खुशबू लाने में यकीन रखती हैं। जी देखा भैया जो महिलाओं के वास्तविक मुद्दे होते हैं उस पर जो अभी भी महिला एमपीज हैं उनका जो रवैया रहता है वो ऐसा कुछ नहीं रहता। समर्थन ही नहीं करती है। पहले तो उठती नहीं है। इस तरह के मुद्दे हैं।
देखो एक स्वतंत्र महिला को भारतीय व्यवस्था स्वीकार ही नहीं करेगी। ना समाज स्वीकार करता है ना परिवार स्वीकार करता है और यह जो राजनैतिक दल हैं यह तो कतई स्वीकार नहीं करेंगे। एक आत्मनिर्भर जागरूक स्वतंत्र महिला के लिए संसद पहुंचना ही बड़ा मुश्किल है। और दूसरी ओर ऐसी महिला हो जो खुद ही पुरुषों से दबके रहती हो। पुरुष सत्ता के सामने झुक कर रहती हो। उसको पुरस्कार के तौर पर सांसद बना देगी पुरुष सत्ता। उसको पुरस्कार दिया जा रहा है कि तुम हमारे सामने झुक कर रहती हो तो पुरस्कार के तौर पे आओ अब तुमको एमपी बना देते हैं। मैं नहीं कह रहा हूं कि सारी जो वुमेन एमपीज हैं वो ऐसी होती हैं। बिल्कुल ऐसा नहीं कह रहा हूं। लेकिन उनका एक बड़ा अनुपात ऐसा होता आया है और वो अनुपात इस आरक्षण के बाद और बढ़ जाएगा। यही देश को लेकर के मेरी आशंका है।
राजनीति और वोट बैंक का समीकरण
तो वास्तविक चर्चा अभी संसद में यदि कोई चर्चा करनी है देखो संसद में तो सशक्त महिला अपने आप पहुंच जाएगी ना अगर पहले समाज में सशक्त महिला हो अगर समाज में और सड़क पर जो महिला है वो अगर सशक्त हो तो संसद की तो महिलाएं अपने आप सशक्त हो जाएंगी। आरक्षण की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। अब हम कर क्या रहे हैं? हम कह रहे हैं मैं उसे घर में, परिवार में, समाज में और सड़क पर सशक्त होने नहीं दूंगा। लेकिन एक डेकोरेटिव आइटम की तरह संसद में 33% कर दूंगा। ये बात तो कुछ जमी नहीं। ये बात तो बेईमानी की हो गई। और इतना ही नहीं है। जब आप ये 33% कर दोगे तो इतने लोग तालियां बजाने लग जाएंगे। खुद महिलाएं ताली बजाना शुरू कर देंगी। महिलाओं को लगेगा देखो हमारे लिए कितना अच्छा काम किया जा रहा है। हमें वहां 33% आरक्षण दे दिया गया है। पर उस 33% में वहां पहुंचेंग कौन? तुम यह तो देखो कोई बुलंद आवाज हो क्या वो खुद वहां पहुंच पाएगी? उसको घर में ही बुलंदी से बोलने नहीं दिया जाता। और एक अब नया टूल भी आ गया है।
महिला की आवाज को बिल्कुल जमीन पर ही रोक देने के लिए दम घोट दो। वो कुछ बोले। पुरानी दमनकारी व्यवस्था के खिलाफ तो उसको बोल दो यह तो पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित है। यह तो वेस्टर्नाइज्ड है या एक और कि एंटी हिंदू है एंटी नेशनल है। घर में ही वो चुनाव नहीं कर सकती। उसका सबोर्डिनेशन हो रहा है। उसके पास रिप्रोडक्टिव चॉइस नहीं है। घर के ही जो कामकाज है उसमें उसकी आवाज नहीं है। पर अगर वो किसी तरीके से अपनी आवाज उठाना शुरू करे। मान लो जाकर सोशल मीडिया पर कुछ लिख दे तो तमाम उसके नीचे कमेंट आ जाएंगे कि यह तो पश्चिमी संस्कृति का कुप्रभाव पड़ रहा है। देखो हमारी बेटियों पर वो कैसे आकर के यहां पर बोल रही हैं और फिर कुछ और आ जाएंगे वो कह देंगे कि ये तो हिंदू विरोधी बात चल रही है यहां पर और वो जो पूरा माहौल किया जाता है तैयार वो इसी व्यवस्था द्वारा तैयार किया जाता है। वही एक ही व्यवस्था है, एक ही केंद्र है, एक ही ताकत है, एक ही सत्ता है। जो घर के भीतर महिलाओं का दमन करना चाहती है। पर एक डेकोरेटिव आइटम की तरह उनको संसद में 33% की संख्या में रखना चाहती है।
ये बात कुछ जमी नहीं। वास्तविक सशक्तिकरण इसमें है कि वो पढ़ पाए, बिना डर के जी पाएं। जागरूक रह अपने निर्णय स्वयं ले पाएं। कोई उनका भाग्य विधाता ना बने। कोई निर्धारण करने के लिए ना बैठा हो कि हम बताएंगे कि तुम्हें कैसे जीना है। खेलों में, विज्ञान में, शिक्षा में लगातार नजर रखी जाए कि आगे बढ़ पा रही हैं कि नहीं बढ़ पा रही हैं। अपने बूते खेल पा रही हैं कि नहीं। उनकी जीत की राह में क्या बाधाएं आ रही हैं। शिक्षा है सबसे बड़ी चीज। शिक्षित हो गई एक बार महिला तो उसके बाद जरूरत ही नहीं पड़ती कि कोई और आकर के सहारा बीते। फिर कोई और होता कौन है उसके जीवन में हस्तक्षेप करने वाला? उसके पास शिक्षा है। वो अपनी जिंदगी खुद देख लेगी। शिक्षा तो छोड़ो हम तो उसे जन्म लेने का भी अधिकार नहीं देते हैं। हम तो जन्म भी कहां पाती है? हम जानते हैं भ्रूण हत्या की दर। अभी अब सेंसस होगा। आंकड़े आएंगे कि भारत में से कितनी करोड़ महिलाएं पुरुषों की अपेक्षा गायब है।
3 करोड़ भी हो सकती हैं, 5 करोड़ भी हो सकती हैं। भारत में पुरुषों और महिलाओं की संख्या में जो अंतर है वो देख लेना अभी जब जनगणना के आंकड़े आएंगे। नहीं तो 2011 के तो उपलब्ध है उनको ही देख लो। जमीन से उठेगी तब ना आसमान तक पहुंचेगी। जमीन से उसको उठने नहीं दे रहे और आसमान पर उसको आरक्षण दे रहे हो। ये कौन सी बात है? संसद में भी जाकर के बैठना काम ही है। फुल टाइम काम है। एफएलपीआर जानते ही हो। फीमेल लेबर पार्टिसिपेशन रेट वो भारत में लगातार गिर रहा है। वर्क प्लेस पे महिलाओं का अनुपात आज उतना भी नहीं जितना आज से 25 साल पहले हुआ करता था। उतना भी नहीं है। तो तुमको ये विडंबना नहीं दिखाई दे रही है। कंट्राडिक्शन ये त्रासदी नहीं दिखाई दे रही है। कि ये वही समाज है जो महिलाओं को घर से बाहर निकल के काम भी नहीं करने दे रहा। हम 25 साल पहले भी महिलाओं के प्रति जितने उदार हुआ करते थे हम आज उससे भी कम उदार हो गए हैं और दूसरी ओर हम कह रहे हैं कि हम महिलाओं को ये दूसरी वर्क प्लेस जिसका नाम पार्लियामेंट है वहां उनको आरक्षण दे रहे हैं।
मां-बाप आज का जो मां-बाप हैं वो 25 साल पहले के मां-बाप यानी पिछली पीढ़ी की तुलना में कम उत्सुक है कि उनकी लड़की कहीं काम करे। वो कह रहे हैं कहीं बहू बन जाए किसी बड़े घर की, किसी अच्छे घर की। तो एक और तो तुम चाह नहीं रहे कि तुम्हारी लड़की कहीं जाकर काम करे और दूसरी ओर तुम कह रहे हो कि मैं पार्लियामेंट में उसको रिजर्वेशन दे रहा हूं। वहां पर काम करें। निश्चित रूप से इसमें कुछ ना कुछ तो पाखंड चल ही रहा है ना। इसमें कुछ नहीं होने वाला है। नेपोटिज्म को ही और बढ़ावा मिलने वाला है। वो जो 67% पुरुष बैठे होंगे ना उन्हीं से संबंधित वो 33% महिलाएं बैठी होंगी कुछ अपवादों को छोड़कर के। और नजारा दृश्य बस ऐसा हो जाएगा कि वाह ऐसा लगेगा कि देखो हम कितने ज्यादा विकसित हो गए हैं और हम कितने उदारवादी हो गए हैं। हम कितने प्रगतिशील हो गए हैं। भीतर हमारे महिलाओं के लिए कितनी समता और सम्मान है।
ये देखो इतनी महिलाएं दिखाई दे रही हैं। वो वो देखो तुम महिला होकर भी महिला विरोधी हो सकते हो। यह बात समझना। इतना ही नहीं है कि महिला होकर महिला विरोधी हो सकते हो। तुम फेमिनिस्ट होकर भी मिसोजेनिस्ट हो सकते हो। यह अच्छे से समझ लो। वास्तविक महिला सशक्तिकरण बिल्कुल अलग बात है। वो दूसरी बात है। बिल्कुल। उसके लिए बहुत भीतर तक पहुंचना पड़ता है और देखना पड़ता है कि इस महिला को भीतरी तौर पर रोगी और दुर्बल बना किसने दिया। वह काम ना तो संसद में आरक्षण से होता है और ना फेमिनिज्म जैसी किसी विचारधारा से होता है। विचारधाराएं बहुत बाहरी चीज होती हैं। वो मनुष्य के उस भीतरी केंद्र तक पहुंच ही नहीं पाती जहां उसका सबसे गहरा जख्म है। हर महिला जख्मी है। और उसको पता भी नहीं है कि वह कितना बड़ा जख्म अपने भीतर लेकर के जी रही है। आप बाहर बाहर से चीजें करना चाहते हो। महिला के जख्म बाहरी उतने नहीं रहे हैं। अभी भी बहुत बाहरी जख्म है और उन बाहरी जख्मों का इलाज भी होना चाहिए। बिल्कुल लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा है ना जो महिला का जख्म है वो भीतर ही है। वो सब बातें जो समाज उसके बारे में कहता था वो नजर जिससे पुरुष उसको देखता था। वो बातें और वह नजर महिला के भीतर अब घुस के बैठ गई है और वहां से उसको खाई जा रही है। इलाज वहां होना चाहिए। हम मुझे आरक्षण से कोई समस्या नहीं है।
आरक्षण बहुत अच्छी बात है। लेकिन आरक्षण और बाकी बहुत सारी बातें अगर आंखों में धूल झोंकने जैसी हो जाए। अपनी आंखों में धूल झोंकने जैसी तो फिर बेईमानी हो जाती है और घातक बेईमानी हो जाती है देश के साथ महिला ही नहीं पुरुष के साथ भी सबके साथ गड़बड़ हो जाती है तो सत्ता और राजनीतिक पार्टियां फिर महिला आरक्षण की बात बार-बार ले क्यों आती है? उनको उनको क्या मिल रहा है आंसर? वोट कोई भी राजनैतिक पार्टी और क्या चाहती है? वोट देखो कोई भी राजनीतिक पार्टी हो यहां से लेकर वहां तक और हिंदुस्तान से लेकर अमेरिका तक वह कुछ भी कर रही हो कुछ भी तो कभी यह सवाल मत पूछना कि क्या यह बात क्या यह कदम इसकी विचारधारा से मेल खाता है? ये सवाल ही गलत है पूछना। सवाल असली बस एक होता है कि क्या यह काम करके इसका वोट बैंक वोटर बेस बढ़ता है।
बढ़ता है तो वो काम करेगी। दुनिया की कोई पार्टी हो यही काम करेगी। भाई बड़ा अच्छा लगता है ना कि देखो हमने महिलाओं के लिए यह किया। महिलाएं आकर के वोट देंगी और याद रखना महिलाओं का जो टर्न आउट है इक्शंस में वो लगातार बढ़ता जा रहा है। वो बढ़ता जा रहा है। तो कई कई कारण है। उसके अलावा ये एक पुरानी मांग भी थी। दिखने में बड़ा अजीब लगता है कि संसद में सिर्फ 1215% महिलाएं हैं। जबकि दुनिया में अब बहुत सारी संसदें ऐसी हो गई हैं जिसमें 30 40 50 से भी ज्यादा प्रतिशत महिलाएं बैठी हुई हैं। दिखने में भी लगता था तो बहुत सारे कारण हैं। उन कारणों से अब आप महिलाओं को आरक्षण दे देंगे और उसको तो अक्रॉस द बोर्ड एक्सेप्टेंस है। सारी ही पॉलिटिकल पार्टीज उसको एक्सेप्ट कर रही हैं और सपोर्ट कर रही हैं। और समाज में भी उस चीज को लेकर के एक व्यापक समर्थन ही है। यह जो समाज में और सब राजनीतिक दलों में उसका समर्थन है, मैं उसको लेकर के थोड़ा सा आशंकित हूं। ये जो सीटें बढ़ने वाली है महिलाओं के लिए इन पर कुछ नहीं है। नेताजी की बेटी आकर बैठने वाली है।
असली सशक्तिकरण कहां से शुरू होगा?
हम हम बड़े फीमेल फ्रेंडली लोग हैं। हमें ऐसा दिखाना भी है और ऐसा दिखाते हुए अच्छा लगता है कि नहीं नहीं हम पिछड़े हुए नहीं है। हम अशिक्षित नहीं है। हमारा कोई रिग्रेसिव समाज नहीं है। हम मॉडर्न लोग हैं और हम हम महिलाओं को बराबरी देना जानते हैं। हमें ऐसा दिखाना भी है और घर में महिला का दमन भी करना है। रिश्तों में महिला का दमन भी करना है। साइकोलॉजिकली हमें उसके ऊपर चढ़कर भी बैठना है। तो कुल मिला के यही दोनों काम है जो साथ-साथ हो रहे हैं। बाहर बाहर ऐसे दिखाओ जैसे कि हमने उसको बड़ा सम्मान दे रखा है। उसको ऐसे उठा दो, एलिवेट कर दो और घर के भीतर उसको दबा कर रखो। हम यह तक हो सकता है कि वो घर वहां वहां मंच पर उसको तुमने चढ़ा दिया है।
नेता बना के वहां से वहां से वो भाषण दे रही है। वो मंच पर खड़ी हुई है। तुमने उसको नेता बना के चढ़ा दिया है। क्योंकि उसके पिता और भाई और पति तीनों पॉलिटिक्स में थे। तो तीनों ने अब उसको भी पॉलिटिक्स में डाल दिया। फिर रिजर्वेशन आ गया है। इतनी सीटें अब महिलाओं के लिए हो गई। तो अब इसको घर की बहू को या बेटी को इसको भी जल्दी से खड़ा करो पॉलिटिक्स में। तो तुमने उसको वहां पॉलिटिक्स में खड़ा कर दिया और वो वहां पर खड़ी हुई है और वो मंच से भाषण दे रही है और तभी कोई नालायक कैमरामैन कैमरा उसके पीछे ले जाता है और दिखाई देता है कि यहां उसकी पीठ पर मार खाने के निशान है। लोग अगवाड़ा देख रहे हैं बस उसका वो मंच से खड़ी होकर के भाषण दे रहा है और ऐसा लग रहा है कितनी कुशल नेत्री है। कितना अद्भुत भाषण दे रही है। क्या इसकी ऊंची आवाज है।
क्या स्वतंत्र इसकी चेतना है। क्या भाषण दे रही है। हम्। और कैमरा यहां पीछे की तरफ जाए तो हो सकता है कि दिखाई दे कि यहां पर पिटाई के निशान है। आज ही पति ने उसको मारा है। ज़रूरी नहीं है कि शरीर पर ही निशान हो। ज्यादा गहरे जख्म यहां होते हैं भीतर। और वो जख्म भारत ही नहीं दुनिया की 99% महिलाओं की छातियों पर हैं। बहुत पुराना शोषणकारी इतिहास है। लेकिन उसका इलाज फेमिनिज्म नहीं है। यह भी बता ही देता हूं। उसका इलाज तो अध्यात्म है। स्वयं को जानना। महिला जब तक अपने आप को अपने कपड़ों, अपने मेकअप, अपनी आइडेंटिटीज, अपने शरीर से गहरे जाकर नहीं जानेगी। कोहम हु एम आई? यह प्रश्न जब तक उसके लिए प्रासंगिक नहीं होगा, तब तक वह किसी ना किसी तरह की गुलामी करेगी।

