Crude Oil Price Drop 2026: मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच अचानक सीजफायर ने वैश्विक तेल बाजार को झकझोर कर रख दिया है। अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्ते के युद्धविराम के ऐलान के बाद कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त गिरावट दर्ज की गई है। बीते सप्ताह क्रूड ऑयल में 13 फीसदी से ज्यादा की गिरावट आई, जो साल 2020 के बाद सबसे बड़ी साप्ताहिक गिरावट मानी जा रही है।
ब्रेंट क्रूड की कीमतें गिरकर करीब 95 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई हैं, जबकि डब्ल्यूटीआई भी लगभग 96 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना हुआ है। हालांकि, यह गिरावट जितनी बड़ी दिख रही है, उतनी राहत देने वाली नहीं है, क्योंकि मौजूदा कीमतें अभी भी युद्ध से पहले के स्तर से लगभग 30 फीसदी ज्यादा हैं।
सीजफायर पर टिकी दुनिया की नजर
अब बाजार की नजर इस बात पर टिकी है कि यह सीजफायर कितना टिकाऊ साबित होगा। अगर शांति लंबे समय तक बनी रहती है, तो ऊर्जा आपूर्ति की सबसे अहम कड़ी ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ से तेल की आवाजाही सामान्य हो सकती है। फिलहाल इस जलमार्ग पर गतिविधियां सीमित हैं और मुख्य रूप से ईरान से जुड़े जहाज ही आवाजाही कर पा रहे हैं। ऐसे में वैश्विक सप्लाई चेन पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाई है।
तेल बाजार में बेचैनी
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि बाजार की यह गिरावट अस्थायी हो सकती है। रैपिडन एनर्जी ग्रुप के प्रमुख बॉब मैकनैली के अनुसार, निवेशक मौजूदा हालात को जरूरत से ज्यादा सकारात्मक मान रहे हैं। उनका कहना है कि बाजार ‘उम्मीद’ के भरोसे चल रहा है, जबकि जमीनी हकीकत अब भी अनिश्चित बनी हुई है। अगर हालात बिगड़े, तो कीमतों में फिर से उछाल आ सकता है।
क्या ईरान को मिलती रहेगी राहत?
एक और बड़ा सवाल यह है कि क्या अमेरिका ईरान और रूसी तेल से जुड़े प्रतिबंधों में दी जा रही छूट को आगे बढ़ाएगा। फिलहाल यह छूट खत्म होने के करीब है, और एशियाई देशों ने इसे जारी रखने के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया है। बताया जा रहा है कि आने वाले दिनों में अमेरिकी नेतृत्व ईरान के साथ बातचीत करेगा, जो इस पूरे समीकरण को प्रभावित कर सकता है।
हमलों का असर
सीजफायर के बावजूद क्षेत्र में पूरी तरह शांति नहीं है। हाल के हमलों ने ऊर्जा ढांचे को नुकसान पहुंचाया है। सऊदी अरब ने भी माना है कि उसकी अहम पाइपलाइन से तेल की सप्लाई प्रभावित हुई है, जिससे बाजार में अनिश्चितता और बढ़ गई है।
तेल संकट से निपटने के लिए देश उठा रहे कदम
मध्य-पूर्व पर निर्भर कई देश अब अपने तेल भंडार का इस्तेमाल करने लगे हैं। जापान ने अपने रणनीतिक भंडार से तेल जारी करने का फैसला किया है, जबकि चीन ने भी अपनी रिफाइनरियों को स्टॉक इस्तेमाल करने की अनुमति दे दी है। भारत में भी ईंधन आपूर्ति को संतुलित रखने के लिए कंपनियां सतर्क हो गई हैं और कुछ जगहों पर बिक्री पर नियंत्रण जैसे कदम उठाए जा रहे हैं।
जुबानी जंग जारी
राजनीतिक बयानबाजी अब भी जारी है। अमेरिका ने ईरान पर तीखे आरोप लगाए हैं, वहीं ईरान ने भी साफ कर दिया है कि किसी भी बातचीत से पहले कुछ शर्तें पूरी करनी होंगी। इस बीच, अगर कूटनीतिक प्रयास विफल होते हैं, तो सैन्य कार्रवाई की आशंका भी बनी हुई है, जिससे तेल बाजार फिर से उथल-पुथल का शिकार हो सकता है।
राहत या भ्रम?
तेल की कीमतों में आई यह गिरावट फिलहाल राहत जैसी दिख रही है, लेकिन इसके पीछे अनिश्चितता का बड़ा साया है। सीजफायर अगर टिकता है तो बाजार स्थिर हो सकता है, लेकिन जरा सी चूक फिर से कीमतों में आग लगा सकती है।
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