Maharashtra Muslim reservation: महाराष्ट्र की महायुति सरकार ने राज्य में लागू मुस्लिम आरक्षण से जुड़े सभी पुराने सरकारी सर्कुलर और आदेश रद्द कर दिए हैं। सरकार के इस फैसले के बाद शिक्षा और नौकरियों में धार्मिक आधार पर दिए जा रहे विशेष प्रावधान प्रभावहीन हो गए हैं। फैसले को राज्य की आरक्षण नीति में बड़ा बदलाव माना जा रहा है और इसके राजनीतिक असर भी दूर तक देखने को मिल सकते हैं।
क्या था मुस्लिम आरक्षण
महाराष्ट्र में मुस्लिम समुदाय के कुछ सामाजिक-शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को पहले “सोशल एंड एजुकेशनली बैकवर्ड क्लास” (SEBC) श्रेणी में रखते हुए शिक्षा संस्थानों में सीमित प्रतिशत आरक्षण का लाभ दिया गया था। यह व्यवस्था अलग-अलग समय पर जारी सरकारी परिपत्रों (सर्कुलर) और अधिसूचनाओं के जरिए लागू की गई थी, जिनका मकसद शिक्षा में पिछड़े वर्गों की भागीदारी बढ़ाना बताया गया था।
किस सरकार ने लागू किया था आरक्षण?
महाराष्ट्र में मुस्लिम आरक्षण पहली बार 2014 में कांग्रेस-एनसीपी (यूपीए समर्थित) सरकार के दौरान लागू किया गया था। उस समय राज्य के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण थे। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कैबिनेट ने फैसला लेकर मुस्लिम समुदाय के सामाजिक-शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को शिक्षा क्षेत्र में आरक्षण देने की घोषणा की थी। सरकार ने मुस्लिम समुदाय को शिक्षा संस्थानों में 5% आरक्षण देने का प्रावधान किया था।
आरक्षण देने की वजह क्या थी?
सच्चर कमेटी रिपोर्ट
केंद्र सरकार की सच्चर कमेटी (2006) ने पाया था कि देश में मुस्लिम समुदाय शिक्षा, सरकारी नौकरियों और आर्थिक स्थिति में कई जगह दलित-पिछड़े वर्गों के बराबर या उनसे भी पीछे है। महाराष्ट्र में भी इसी तरह की स्थिति बताई गई थी।
राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की सिफारिश
महाराष्ट्र के पिछड़ा वर्ग आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि मुस्लिम समाज के कुछ पेशागत समूह (जैसे कारीगर, बुनकर, कसाई, दर्जी आदि) सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हैं, इसलिए उन्हें शैक्षणिक अवसरों में विशेष सहायता मिलनी चाहिए।
शिक्षा में कम भागीदारी
सरकारी आंकड़ों के अनुसार प्रोफेशनल कॉलेजों और उच्च शिक्षा में मुस्लिम छात्रों की भागीदारी बहुत कम थी। आरक्षण का उद्देश्य कॉलेजों में उनका प्रवेश बढ़ाना बताया गया।
बाद में क्या हुआ?
इस फैसले को अदालत में चुनौती दी गई। बॉम्बे हाईकोर्ट ने शिक्षा में आरक्षण को सीमित रूप में अनुमति दी। लेकिन सरकारी नौकरियों में आरक्षण पर रोक लगा दी थी। अदालत ने कहा कि केवल धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि ठोस सामाजिक पिछड़ेपन के आंकड़ों के आधार पर ही आरक्षण दिया जा सकता है।
सरकार ने क्यों लिया फैसला
सरकार का कहना है कि आरक्षण धर्म के आधार पर नहीं बल्कि सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के ठोस आंकड़ों के आधार पर होना चाहिए। अधिकारियों के मुताबिक कई पुराने सर्कुलर कानूनी रूप से चुनौती झेल रहे थे और अदालतों में उनकी वैधता पर सवाल उठे थे। इसी कारण सरकार ने स्पष्ट नीति अपनाते हुए सभी ऐसे आदेश निरस्त कर दिए ताकि भविष्य में कानूनी विवाद से बचा जा सके और आरक्षण व्यवस्था एक समान नियमों पर चले।
किन सर्कुलर पर पड़ा असर
रद्द किए गए आदेशों में वे सभी प्रशासनिक निर्देश शामिल हैं जिनके जरिए अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय के कुछ उपवर्गों को शैक्षणिक संस्थानों में विशेष सीटें या प्राथमिकता मिलती थी। अब राज्य में प्रवेश प्रक्रिया सामान्य आरक्षण ढांचे—जैसे ओबीसी, एससी, एसटी, ईडब्ल्यूएस आदि के अनुसार ही लागू होगी। जो समुदाय पहले से अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) सूची में शामिल हैं, उन्हें पहले की तरह उसी श्रेणी के तहत लाभ मिलता रहेगा।
छात्रों और संस्थानों पर प्रभाव
इस निर्णय का सबसे सीधा असर पेशेवर कॉलेजों और सरकारी सहायता प्राप्त शैक्षणिक संस्थानों की प्रवेश प्रक्रिया पर पड़ेगा। नई एडमिशन प्रक्रिया सामान्य मेरिट और मौजूदा आरक्षण श्रेणियों पर आधारित होगी। पहले जारी विशेष कोटा लागू नहीं रहेगा। पहले से दाखिला ले चुके छात्रों पर तत्काल प्रभाव नहीं पड़ेगा। हालांकि अंतिम दिशा-निर्देश संबंधित विभागों की अधिसूचना के बाद स्पष्ट होंगे।
राजनीतिक प्रतिक्रिया
फैसले के बाद राज्य की राजनीति गरमा गई है। सत्तापक्ष का कहना है कि यह कदम संविधान के अनुरूप है और आरक्षण को धार्मिक पहचान के बजाय सामाजिक पिछड़ेपन से जोड़ने के लिए उठाया गया है। वहीं विपक्षी दलों ने इसे चुनावी साल से पहले ध्रुवीकरण की राजनीति बताते हुए सरकार पर अल्पसंख्यक विरोधी रुख अपनाने का आरोप लगाया है। कई नेताओं ने इसे अदालत में चुनौती देने की बात भी कही है।
आगे क्या करेगी सरकार
सरकार अब नई गाइडलाइन जारी कर विभागों को स्पष्ट निर्देश देगी। शिक्षा विभाग और तकनीकी शिक्षा निदेशालय को प्रवेश नियमों में संशोधन करने को कहा जा सकता है। संभावना है कि इस मुद्दे पर राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर बहस जारी रहेगी, खासकर तब जब राज्य में चुनावी माहौल बन रहा है।

