होम = Breaking = ‘गुनाह से बचो, तौबा करो’… बुर्का में मुस्लिम महिलाओं ने उठाई कांवड़, भड़के बरेली के मौलाना

‘गुनाह से बचो, तौबा करो’… बुर्का में मुस्लिम महिलाओं ने उठाई कांवड़, भड़के बरेली के मौलाना

Muslim Women Kanwar Yatra: उत्तर प्रदेश के संभल से जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से चर्चा में है, जिसमें दो मुस्लिम महिलाएं बुर्का पहने कांवड़ लेकर जाती दिखाई दे रही हैं। बताया जा रहा है कि वे शिव मंदिर में जल चढ़ाने के उद्देश्य से कांवड़ यात्रा में शामिल हुई थीं। इस वीडियो के सामने आते ही सोशल मीडिया पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं कुछ लोग इसे आपसी सद्भाव का प्रतीक बता रहे हैं, तो कुछ धार्मिक परंपराओं के संदर्भ में सवाल उठा रहे हैं।

सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

धर्म और व्यक्तिगत आस्था से जुड़े मुद्दे कई बार सार्वजनिक विमर्श का विषय बन जाते हैं। इसी क्रम में यह वीडियो भी चर्चा का केंद्र बन गया है। कई यूजर्स ने इसे गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल बताया, वहीं अन्य लोगों ने धार्मिक सीमाओं और परंपराओं को लेकर अपनी आपत्तियां दर्ज कराई हैं।

ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के अध्यक्ष का बयान

वीडियो वायरल होने के बाद बरेली से मौलाना शहाबुद्दीन रजबी का बयान सामने आया है। उन्होंने कहा कि बुर्का पहनकर महिलाओं के कांवड़ यात्रा में शामिल होने का मामला सोशल मीडिया पर बहस का विषय बना हुआ है और लोग शरियत के अनुसार इसकी वैधता के बारे में जानना चाहते हैं।

मौलाना रजबी ने स्पष्ट किया कि इस्लामिक शिक्षाओं के मुताबिक कोई भी मुसलमान चाहे पुरुष हो या महिला दूसरे धर्म के धार्मिक अनुष्ठानों या पर्वों को नहीं अपना सकता। उनके अनुसार, किसी अन्य समुदाय की धार्मिक पहचान या प्रतीकों को अपनाना उचित नहीं माना गया है।

‘समुदाय की छवि पर असर’ की बात

मौलाना ने कहा कि कांवड़ यात्रा या जलाभिषेक जैसे आयोजनों में भाग लेना मुसलमानों के लिए अनुचित और धार्मिक रूप से वर्जित है। उन्होंने संबंधित महिलाओं और समाज के अन्य लोगों से अपील की कि वे ऐसे कदम उठाने से बचें, जिनसे समुदाय की छवि प्रभावित हो सकती है। उनका कहना था कि यदि किसी से भूल हुई है तो उसे स्वीकार कर भविष्य में ऐसे कार्यों से दूरी बनानी चाहिए।

सौहार्द बनाम धार्मिक मर्यादा

इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि व्यक्तिगत आस्था और धार्मिक मर्यादाओं के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। जहां एक वर्ग इसे सामाजिक सौहार्द का संकेत मान रहा है, वहीं दूसरा पक्ष धार्मिक नियमों के पालन पर जोर दे रहा है।

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